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Sunday, April 26, 2009

खिलाड़ी दोस्त


इन दिनों मैं आपको युवा कवि हरेप्रकाश उपाध्याय के पहले कविता-संग्रह 'खिलाड़ी दोस्त तथा अन्य कविताएँ' से अपनी पसंद की कविताएँ पढ़वा रहा हूँ। 53 कविताओं में से लगभग 10 कविताएँ आप पढ़ चुके हैं। आज मैं इस संग्रह से जो कविता आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ, वह शीर्षक कविता है। और मेरे दृष्टिकोण में हरेप्रकाश के अनुभवों का व्यापक विस्तार है यह कविता।

'खिलाड़ी दोस्त'

खिलाड़ी दोस्तों के बारे में
बताने से पहले ही सावधान कर दूँ कि
मेरा इशारा ऐसे दोस्तों की तरफ़ नहीं है
जो ज़िन्दगी को ही एक खेल समझते हैं
बल्कि यह उन दोस्तों की बात है जो
खेल को ही ज़िन्दगी समझते हैं
जो कहीं भी खेलना शुरू कर देते हैं
जो अक़सर पारम्परिक मैदानों के बाहर
ग़ैर पारम्परिक खेल खेलते रहते हैं

वे दोस्त
खेल के बाहर भी खेलते रहते हैं खेल
जब भी जहाँ
मौक़ा मिलता है पदाने लगते हैं
पत्ते फेंकने लगते हैं
बुझौव्वल बुझाने लगते हैं
गोटी बिछाने लगते हैं
आँखों पर कसकर बाँध देते हैं रूमाल
और दुखती रग को दुखाने लगते हैं

वे दोस्त अच्छी तरह जानते हैं
दोस्ती में खेलना
सही तरह पैर फँसाना वे जानते हैं
जानते हैं वे कब
कहाँ से मारने पर रोक नहीं पाएगा गोल
जानते हैं कितनी देर दौड़ाएँगे
तो थककर गिर जाएगा दोस्त
वे हाथ मिलाते हुए अक़सर
हमारी भावनाएँ नहीं
हमारी ताक़त आँकते रहते हैं
अक़सर थके हुए दौर में
भूला हुआ गेम शुरू करते हैं दोस्त
वे आँसू नहीं मानते
तटस्थ वसूलते हैं क़ीमत
हमारे हारने की

सुख और ख़ुशी में भले भूल जाते हों
दुख में अकेला नहीं छोड़ते
आ जाते हैं डंडा सँभाले
उदासी और थकान में
शुरू करते हैं खेल
और नचा-नचा देते हैं

दोस्त अवसर देखते रहते हैं
काम आने का
और मुश्किल समय में अक़सर
ऐसे काम आते हैं कि भूल नहीं सकते हम

हमारे गहरे अभाव
टूटन और बर्बादी के दिनों में
जब दुश्मन उपेक्षा करते हैं हमारी
दोस्त आते हैं ख़ैरियत पूछने
और हास्य के शिल्प में पूछते हैं हाल
हमारे चेहरे की उड़ती हवाइयाँ देखकर
हताश नहीं होते
वे मूँछों में लिथड़ाती मुस्कान बिखेरते हैं

दोस्त हमें हारकर
बैठ नहीं जाने देते
वे हमें ललकारते हैं
चाहे जितने पस्त हों हम

उठाकर हमें मैदान में खड़ा कर देते हैं वे
और देखते रहते हैं हमारा दौड़ना
गिरना और हमारे घुटने का छिलना
ताली बजाते रहते हैं वे
मूँगफली खाते रहते हैं
और कहते हैं
धीरे-धीरे सीख जाओगे खेल

जो दोस्त खेल में पारंगत होते हैं
खेल से भागने पर कान उमेठ देते हैं
कहते हैं, कहाँ-कहाँ भागोगे
'भागकर जहाँ जाओगे
हमें वहीं पाओगे'

खेल में पारंगत दोस्त
खेल में अनाड़ी दोस्त से ही
अक़सर खेलते हैं खेल!


यह कविता इस संग्रह से मेरी अंतिम प्रस्तुति थी। इसका यह मतलब बिलकुल नहीं है कि मुझे इस संग्रह की 11 कविताएँ ही पसंद है। कहीं तो अंत करना था। इस संग्रह की चर्चा यहीं रोक रहा हूँ। हरे प्रकाश भी कहीं जा नहीं रहे। आगे उनकी नई कविताओं के साथ मैं हाज़िर होऊँगा।

अगले महीने किसी अन्य युवा कवि की कविताओं की चर्चा करूँगा, ताकि नवधर्मी रचनाकार अच्छा पढ़ सकें और उन्हें बहुत अच्छा लिखने की प्रेरणा मिले।

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4 कविताप्रेमियों का कहना है :

मुकेश कुमार तिवारी का कहना है कि -

शैलेष जी,

आभार! आभार!!

खिलाड़ी दोस्त की पहचान किसी खेल से ही नही बल्कि जीवननामा से है, जीवन के उन पहुलओं को बड़ी ही खूबसूरती और परिपक्वता से श्री हरेप्रकाश जी ने उघाड़ा है, की नंगा होता सच भी आंनद देता है चुभन के साथ।

निम्न पंक्तियों में तो जैसे पाठक को कोई ना कोई जरूर याद आ जाता है, दोस्त खेल खेलता हुआ या उकसाता हुआ खेल जारी रखने को :-

दोस्त हमें हारकर
बैठ नहीं जाने देते
वे हमें ललकारते हैं
चाहे जितने पस्त हों हम

उठाकर हमें मैदान में खड़ा कर देते हैं वे
और देखते रहते हैं हमारा दौड़ना
गिरना और हमारे घुटने का छिलना
ताली बजाते रहते हैं वे
मूँगफली खाते रहते हैं
और कहते हैं
धीरे-धीरे सीख जाओगे खेल

सादर, हरेप्रकाश जी / शैलेष जी को

मुकेश कुमार तिवारी

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' का कहना है कि -

किसी ज़माने में दोस्तों को पेश की गयी पंक्तियाँ आपकी कविता को पढ़कर याद हो आयीं.

दोस्त जब मेहरबां हुए हम पर.
दुश्मनी में न फिर कसर छोडी.

शिकवा न दुश्मनों से मुझको रहा 'सलिल'
हैरत है दोस्तों ने ही प्यार से मारा.

ए 'सलिल'! दिल को तू मजबूत करले.
आ रहे हैं दोस्त मिलने के लिए.

रश्मि प्रभा... का कहना है कि -

bahut achhi lagi

विनीत कुमार का कहना है कि -

तेजी से एक ऐसी संस्कृति पनप रही है जिसमें दर्द के बीच से प्लेजर पैदा करने की कोशिश की जाती है। पहले ये गांव मुर्गे या सांड को लड़ाकर पूरा कर लिया जाता था। अब सीधे अलग-अलग ब्रांड के छापे लगी टीशर्ट पहनाकर कराया जाता है। मुझे खेल के नाम पर सोना चौधरी याद आ रही है जिसने बहुत ही बेहतरीन उपन्यास लिखा है- पायदान..

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