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हवा चलने लगी है चाल अब बैसाखियों वाली


ऊँड़स ली तू ने जब साड़ी में गुच्छी चाभियों वाली
हुई ये जिंदगी इक चाय ताजी चुस्कियों वाली

कहाँ वो लुत्फ़ शहरों में भला डामर की सड़कों पर
मजा देती है जो घाटी कोई पगडंडियों वाली

जिन्हें झुकना नहीं आया, शजर वो टूट कर बिखरे
हवाओं ने झलक दिखलायी जब भी आँधियों वाली

भरे-पूरे से घर में तब से ही तन्हा हुआ हूँ मैं
गुमी है पोटली जब से पुरानी चिट्ठियों वाली

बरस बीते गली छोड़े, मगर है याद वो अब भी
जो इक दीवार थी कोने में नीली खिड़कियों वाली

खिली-सी धूप में भी बज उठी बरसात की रुन-झुन
उड़ी जब ओढ़नी वो छोटी-छोटी घंटियों वाली

दुआओं का हमारे हाल होता है सदा ऐसा
कि जैसे लापता फाइल हो कोई अर्जियों वाली

लड़ा तूफ़ान से वो खुश्क पत्ता इस तरह दिन भर
हवा चलने लगी है चाल अब बैसाखियों वाली

बहुत दिन हो चुके रंगीनियों में शह्‍र की ’गौतम’
चलो चल कर चखें फिर धूल वो रणभूमियों वाली

{4 X मुफ़ाईलुन}

-गौतम राजरिशी

शह‍र का कोना-कोना सिसकता मिला


राह में चाँद उस रोज चलता मिला
दिल का मौसम चमकता, दमकता मिला

देखना छुप के जो देख इक दिन लिया
फिर वो जब भी मिला तो झिझकता मिला

जाने कैसी तपिश है तेरे जिस्म में
जो भी नजदीक आया पिघलता मिला

रूठ कर तुम गये छोड़ जब से मुझे
शह‍र का कोना-कोना सिसकता मिला

किस अदा से ये कातिल ने खंजर लिया
कत्ल होने को दिल खुद मचलता मिला

चोट मुझको लगी थी मगर जाने क्यों
रात भर करवटें वो बदलता मिला

टूटती बारिशें उस पे यादें तेरी
छू के देखा तो हर दर्द रिसता मिला

बहर- 4 X फ़ायलुन

ग़ज़लगो- मेजर गौतम राजरिशी

घर में इक सत्संग हुआ है


जो भी अपने संग हुआ है
दुनिया का ये ढ़ंग हुआ है

तू आया जब मुझसे मिलने
चांद जरा नव-रंग हुआ है

देख जमीनी भगवानों को
ऊपर वाला दंग हुआ है

डोर जुड़ी तुझसे ये कैसी
ये मन एक पतंग हुआ है

कुर्सी की लत पड़ते ही अब
हाकिम और दबंग हुआ है

मेहमान बना है तू जब से
घर में इक सत्संग हुआ है

तेरी एक नजर से हिरदय
इक बजता मिरदंग हुआ है

{बहर= 4 X फ़ेलुन}

यूनिकवि- मेजर गौतम राजरिशी

ये सूखे पत्ते मौसम का तगादा क्या करे


ये कद-काठी के मेले हैं, लबादा क्या करे
डरे फर्जी, चले टेढ़ा तो प्यादा क्या करे

आते-आते ही आयेगी कि हरियाली तो अब
ये सूखे पत्ते मौसम का तगादा क्या करे

सिंहासन खाली कर दो अब कि जनता आती है
सुने जो नाद कवि का, शाहजादा क्या करे

करे जिद ननकु फिर से घुड़सवारी की, मगर
ये बूढ़ी पीठ झुक ना पाये, दादा क्या करे

बने हों बटखरे ही खोट लेकर जब यहाँ
तो कोई तौलने में कम-जियादा क्या करे

कड़ी है धूप राहों में ये सुनकर ही भला
गिरे खा गश, वो मंजिल का इरादा क्या करे

गंवाये नींद गालिब और न सोये उम्र भर
तो इसमें ख्वाबों वाला फिर वो वादा क्या करे

बहरे हजज मुसमन महजूफ
१२२२-१२२२-१२२२-१२


यूनिकवि- गौतम राजऋषि