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Wednesday, January 05, 2011

लकीरें


नवंबर माह की तेरहवें स्थान की कविता अनिल जीगर ’फ़राग़’ की है। हिंद-युग्म पर यह उनकी लंबे वक्त के बाद की वापसी है। इससे पहले इनकी पिछली कविता अक्टूबर 2009 पे प्रकाशित हुई थी।

कविता: लकीरें

यूँ ही काट-काट के रात भर
पीस-पीस के लगाया
हथेली पर
बुझती हुई रात का,
जलता हुआ चाँद।
एक टुकड़ा उल्काओं का
 गिरा आँगन में तभी
कोई सन्देशा
वहीं लॉन पर छपा पाया
चाँद हथेली से माँगा,
काइनात ने मुझसे

बड़ी मुश्किल से कुरेदा
 और लौटा दिया
इसी कोशिश में
चमड़ी भी उतर गई कहीं

कभी पीछे से देखना,
अगर जाओ तुम
मेरी हाथो की लकीरों के कोड़े
चाँद की पीठ पर पड़े हैं।


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10 कविताप्रेमियों का कहना है :

स्वप्निल तिवारी का कहना है कि -

aasmani prateekon se saji yah kavita nishchit taur pe bahut sundar hai ...badhai apko

शारदा अरोरा का कहना है कि -

kavita ne dil ko chhua , bas lakeeron ke kode samajh nahin aaye ..kya kavi lakeeron ki maar bataana chahta hai ya fir kuredne se udhdee huee chamdee ki badaulat kuchh bataana chahta hai ...khair marmsparshi hai ..

प्रवीण पाण्डेय का कहना है कि -

अद्भुत कल्पना, दर्द का प्रेषण चाँद तक।

नया सवेरा का कहना है कि -

... bahut khoob !!

himani का कहना है कि -

चाँद चांदनी और उफ़ ए मदहोश रात
और इस कविता में सिमटती ये कायनात
बेहतरीन

Minakshi Pant का कहना है कि -

bahut sundar kavita badhi dost

रंजना का कहना है कि -

अतिसुन्दर बिम्ब विधान...वाह !!!

भावों को इतनी सुन्दर अभिव्यक्ति दी है आपने कि मन मुग्ध हो गया..

बहुत ही सुन्दर रचना...

आकर्षण गिरि का कहना है कि -

कभी पीछे से देखना,
अगर जाओ तुम
मेरी हाथो की लकीरों के कोड़े
चाँद की पीठ पर पड़े हैं।

दिल को छूने वाली पंक्तियां... इन पंक्तियों के लिेए मेरी ओर से हार्दिक बधाई...
- आकर्षण

‘सज्जन’ धर्मेन्द्र का कहना है कि -

सुंदर कविता के लिए बधाई

सदा का कहना है कि -

भावमय करते हुये शब्‍द ।

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