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Sunday, August 30, 2009

आतंकवादी कोख में नहीं पलते


मई महीने की प्रतियोगिता में संगीठा सेठी की कविता 'मानव के अश्रु स्रोत' जजों द्वारा अनुशंसित हुई थी। जुलाई महीने की प्रतियोगिता में भी इनकी एक कविता को जजों ने काफ़ी पसंद किया।

कविता- आतंक किसी कोख में नहीं पलता

कौन कहता है
भ्रूण हत्या पाप है?
चल जाता पता
गर माँ को
कि पल रहा है
कोख में आतंक...
तो कर देती वो
खुद ही
उस भ्रूण की हत्या...
बताओ क्या तुम
ठहरा पाते
उसे दोषी?
कह दो
उन वैज्ञानिकों से....
किये हैं ईजाद
जिन्होंने
भ्रूण जानने के
उपकरण.....
ईजाद करें अब
कोख में पलने वाले
आतंकवादी भ्रूण...
पर कहाँ?
आतंक
किसी कोख में
नहीं पलता।
माँ तो क्या
माँ के
साए से भी
दूर.......
ईर्ष्या-द्वेष की
धरती पर.....
जहां
ममता नहीं
घृणा बरसती है...
हाँ ! आतंक
किसी कोख में नहीं पलता


प्रथम चरण मिला स्थान- पच्चीसवाँ


द्वितीय चरण मिला स्थान- सोलहवाँ

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9 कविताप्रेमियों का कहना है :

Suman का कहना है कि -

nice

अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -

bahut accha

Avaneesh

विनोद कुमार पांडेय का कहना है कि -

बेहद सुंदर विचार से भरा आपकी कविता एक संदेश देती है...
बधाई...

Manju Gupta का कहना है कि -

मार्मिक रचना ने गागर में सागर भर दिया .बधाई .

Shamikh Faraz का कहना है कि -

बहुत ही शानदार कविता. लेकिन मुझे लगता है कि शब्दों पर थोडा और ध्यान देना चाहिए था. यह पंक्तियाँ अच्छी लगीं.

घृणा बरसती है...
हाँ ! आतंक
किसी कोख में नहीं पलता

वाणी गीत का कहना है कि -

सच आतंक किसी कोख में नहीं पलता ..पालती हैं परिस्थितियां ..!!
बहुत मार्मिक रचना ..!!

Deepali Sangwan का कहना है कि -

bahut shaandar kavita.
badhai

kavi kulwant का कहना है कि -

haardik badhayee...

sada का कहना है कि -

गहराई लिये हुये बहुत ही सुन्‍दर भावों से युक्‍त रचना के लिये बधाई

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