आज हम प्रकाशित कर रहे हैं तीसरे पायदान की कविता। कवयित्री हैं रचना श्रीवास्तव, जिन्हें हम पहले भी कईं बार पढ़ चुके हैं। ये पहले भी प्रतियोगिता में प्रथम १० में स्थान बनाने में कामयाब रही हैं। जुलाई माह की प्रतियोगिता में आठवें नम्बर पर रहीं और अगस्त में १४वें। और इस बार इन्हें यूनिपाठिका का सम्मान तो मिला ही है। आइये इन्हें फिर पढ़ते हैं इस बार क्षणिकाओं में।
दुआ
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सूखे से तरसी आंखों ने
मांगी दुआ वर्षा की
पानी बरसा और बरसता ही चलागया
सब कुछ बहा गया
कुछ यूँ कबूल होती है
दुआ गरीबों की
बटवारा
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घर, धन, वृद्ध आश्रम के खर्चे
यहाँ तक कि कुत्ते भी बटें
पर पिता के त्याग ,प्यार
माँ के आँसू ,दूध ,और पीडा
का कुछ मोल न लगा
क्योंकि पुरानी,घिसी चीजों का
कुछ मोल नही होता
शोर
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चहुँ और है शोर बहुत
भीतर बाहा हर ओर
तभी सुनाई नही देती
हिमखंड के पिघलने की आवाज़
गाँव के सूखे कुंए की पुकार
धरती में नीचे जाते
जल स्तर की चीख
समीकरण
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माँ पिता पालते हैं
चार बच्चे खुशी से
पर चार बच्चों पे
माँ पिता भारी है
ये कलयुग का समीकरण है
विस्फोट
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दर्द चीखा
लहू बहा
शहर काँपा
दुनिया के नक्शे पे
भारत थरथराया
राम हुआ शर्मिंदा
रहीम ने सर झुकाया
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लाशों की भीड़ में
खड़ी
माँ भारती रो रही
चिता जलाऊँ किस के लिए
बनाऊँ कब्र किसकी
मानव मानवता
धर्म धार्मिकता
देश देशभक्ति
है कौन यहाँ
हुई हो न मौत जिसकी
प्रथम चरण के जजमेंट में मिले अंक- 8.5, 3.5, 5, 6, 4, 7.3
औसत अंक- 5.7166
स्थान- नौवाँ
द्वितीय चरण के जजमेंट में मिले अंक- 7, 6.8, 5.7166 (पिछले चरण का औसत)
औसत अंक- 6.50555
स्थान- तीसरा
पुरस्कार- कवि शशिकांत सदैव की ओर से उनकी काव्य-पस्तक 'औरत की कुछ अनकही'






