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तीसरी संगीतबद्ध ग़ज़ल (हिन्द-युग्म का दसवाँ संगीतबद्ध गीत)


हिन्द-युग्म की पूरी टीम नई-नई आवाज़ों, नये-नये संगीतकारों को इस मंच से जोड़ने में लगी गुई है। हमने अब तक ९ नई आवाज़ों और ७ संगीतकारों को संगीतबद्धों गीतों के माध्यम से तराश भी लिया है। पिछले तीन महीने में हिन्द-युग्म के संगीत-क्षेत्र में हुए प्रयास गीतों के रूप में दृष्टिगोचर होते रहे हैं। अब तक आपलोगों ने ९ संगीतबद्धों को सुना। आपने सराहा भी और मार्गदर्शन भी दिया। हमें इस बात की खुशी है कि हम हर बार पिछली बार से बेहतर पेशकश ला पा रहे हैं। पिछले सप्ताह आपने आभा मिश्रा की आवाज़ में उन्हीं के द्वारा संगीतबद्ध निखिल आनंद गिरि की ग़ज़ल 'इन दिनों' को सुना। इस बार फिर आभा मिश्रा की ही आवाज़ और उन्हीं के द्वारा स्वरबद्ध निखिल आनंद गिरि की लिखी ग़ज़ल ' सुबह जीता हूँ' को हम आपकी नज़र कर रहे हैं।

हमें आपकी प्रतिक्रियाओं का बेसब्री से इंतज़ार रहेगा, ताकि हम अपने प्रयासों को सही दिशा दे सकें।

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यदि आप इस गीत को उपर्युक्त प्लेयर से नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंकों से डाऊनलोड कर लें (ऑडियो फ़ाइल तीन अलग-अलग फ़ॉरमेट में है, अपनी सुविधानुसार कोई एक फ़ॉरमेट चुनें)

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ग़ज़ल के शे'र-



युग्म के अब तक के स्वरबद्ध गीत आप यहाँ सुन सकते हैं -
सुबह की ताज़गी
वो नर्म सी...
ये ज़रूरी नही
तू है दिल के पास
एक झलक
बात ये क्या है जो
मुझे दर्द दे
सम्मोहन
इन दिनों

हिन्द-युग्म का 9 वाँ संगीतबद्ध गीत


हिन्द-युग्म के संगीत मंडली पूरे जोश में श्रोताओं के लिए नये-नये अंदाज़ के गीत तैयार कर रही है। अब तक सजीव सारथी ने सुबोध साठे, ऋषि एस॰ बालाजी, पेरूब, निरन कुमार, अमनदीप कौशल, जोगी सुरिंदर, ज्योति मुन्ना सोरेन आदि जैसे हीरे तलाशा। सुनीता यादव ने खुद के भीतर का गायिक और संगीतकारा को निखारा। शिवानी सिंह ने अपनी ग़ज़ल को रूपेश ऋषि की आवाज़ में और उन्हीं के संगीत में भिगोया और श्रोताओं का मनोरंजन किया।

इस बार निखिल आनंद गिरि ने संगीत के हीरे-जवाहरातों को तराशने का काम किया है। आज हम हिन्द-युग्म का ९वाँ संगीतबद्ध गीत आपकी नज़र कर रहे हैं। निखिल आनंद गिरि की ग़ज़ल 'इन दिनों' को अपनी आवाज़ दी है आभा मिश्रा ने। इस ग़ज़ल को संगीतबद्ध किया है खुद आभा मिश्रा ने। संगीत संयोजन आभा मिश्रा ने अवनीश कुमार के साथ मिलकर किया है। निखिल आनंद गिरि कितने कामयाब हुए हैं, ये तो आप श्रोता ही बतायेंगे।

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ग़ज़ल के शे'र-



युग्म के अब तक के स्वरबद्ध गीत आप यहाँ सुन सकते हैं -
सुबह की ताज़गी
वो नर्म सी...
ये ज़रूरी नही
तू है दिल के पास
एक झलक
बात ये क्या है जो
मुझे दर्द दे
सम्मोहन

हिन्द-युग्म का दूसरा संगीतबद्ध गीत


अभी २३ दिनों पूर्व हमने अपना पहला संगीतबद्ध गीत ज़ारी किया था, और आज हम आपके समक्ष दूसरा गीत लेकर उपस्थित हैं। इस गीत की टीम पुरानी है, लेकिन आपको गीत सुनकर यह संतुष्टि ज़रूर मिलेगी कि आपकी प्रतिक्रियाओं का इन पर बहुत सार्थक प्रभाव पड़ा है।



ज्यादा भूमिका बनाने की ज़रूरत नहीं है। बस इतना बताना काफ़ी होगा कि पहले गीत को सुनने के बाद कई संगीतकारों व गायकों ने हमसे संपर्क साधा।



दूसरा गीत 'वो नर्म सी' भी पूरी तरह इंटरनेट-सेवा की मदद से बनाया गया है। न कोई स्टूडियो गया है, न कोई एक-दूसरे से मिला है। संगीत पर ऋषि एस॰ बालाजी ने वर्जिश की है तो आवाज़ पर सुबोध साठे ने। सजीव सारथी भी गीत के बोलों को इधर-उधर इस इंटरनेटीय-प्रयोगशाला में ही करते रहे हैं।



नीचे के प्लेयर से गीत सुनें-



कोई परेशानी आये तो यहाँ से डाऊनलोड कर लें।


गीत के बोल

वो नर्म-सी मदहोशी कहाँ है,
वो सब्ज़-सी सरगोशी कहाँ है,
मिलती नहीं, तेरी सदा,
बस सर्द-सी, खामोशी यहाँ है,

१.
फैली है चारसू, कैसी ये उदासी,
लगती है बद्‌दुआ-सी अब हवा भी,
टूटा साज़, रूठा राग,
ढूंढे वो सुर कहाँ है,
वो नर्म-सी....

२.

गुनने लगी है रात, कितने फ़साने,
आने लगे हैं याद, गुजरे ज़माने,
टूटा साथ, छूटा हाथ,
टूटा ये दिल यहाँ है,
वो नर्म-सी ....

हिन्द-युग्म दिसम्बर २००७ के अंत तक ८ से १० गीतों (ग़ज़लों) का एक अल्बम पूरा करना चाहता है। यदि आप में से कोई आवाज़ देने या संगीत देने (या दोनों) में रुचि रखता हो तो sajeevsarathie@gmail.com पर संपर्क करे।