फटाफट (25 नई पोस्ट):

कृपया निम्नलिखित लिंक देखें- Please see the following links

तीसरी संगीतबद्ध ग़ज़ल (हिन्द-युग्म का दसवाँ संगीतबद्ध गीत)


हिन्द-युग्म की पूरी टीम नई-नई आवाज़ों, नये-नये संगीतकारों को इस मंच से जोड़ने में लगी गुई है। हमने अब तक ९ नई आवाज़ों और ७ संगीतकारों को संगीतबद्धों गीतों के माध्यम से तराश भी लिया है। पिछले तीन महीने में हिन्द-युग्म के संगीत-क्षेत्र में हुए प्रयास गीतों के रूप में दृष्टिगोचर होते रहे हैं। अब तक आपलोगों ने ९ संगीतबद्धों को सुना। आपने सराहा भी और मार्गदर्शन भी दिया। हमें इस बात की खुशी है कि हम हर बार पिछली बार से बेहतर पेशकश ला पा रहे हैं। पिछले सप्ताह आपने आभा मिश्रा की आवाज़ में उन्हीं के द्वारा संगीतबद्ध निखिल आनंद गिरि की ग़ज़ल 'इन दिनों' को सुना। इस बार फिर आभा मिश्रा की ही आवाज़ और उन्हीं के द्वारा स्वरबद्ध निखिल आनंद गिरि की लिखी ग़ज़ल ' सुबह जीता हूँ' को हम आपकी नज़र कर रहे हैं।

हमें आपकी प्रतिक्रियाओं का बेसब्री से इंतज़ार रहेगा, ताकि हम अपने प्रयासों को सही दिशा दे सकें।

(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)





यदि आप इस गीत को उपर्युक्त प्लेयर से नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंकों से डाऊनलोड कर लें (ऑडियो फ़ाइल तीन अलग-अलग फ़ॉरमेट में है, अपनी सुविधानुसार कोई एक फ़ॉरमेट चुनें)

VBR MP3


64Kbps MP3


Ogg Vorbis




ग़ज़ल के शे'र-



युग्म के अब तक के स्वरबद्ध गीत आप यहाँ सुन सकते हैं -
सुबह की ताज़गी
वो नर्म सी...
ये ज़रूरी नही
तू है दिल के पास
एक झलक
बात ये क्या है जो
मुझे दर्द दे
सम्मोहन
इन दिनों

हिन्द-युग्म का दूसरा संगीतबद्ध गीत


अभी २३ दिनों पूर्व हमने अपना पहला संगीतबद्ध गीत ज़ारी किया था, और आज हम आपके समक्ष दूसरा गीत लेकर उपस्थित हैं। इस गीत की टीम पुरानी है, लेकिन आपको गीत सुनकर यह संतुष्टि ज़रूर मिलेगी कि आपकी प्रतिक्रियाओं का इन पर बहुत सार्थक प्रभाव पड़ा है।



ज्यादा भूमिका बनाने की ज़रूरत नहीं है। बस इतना बताना काफ़ी होगा कि पहले गीत को सुनने के बाद कई संगीतकारों व गायकों ने हमसे संपर्क साधा।



दूसरा गीत 'वो नर्म सी' भी पूरी तरह इंटरनेट-सेवा की मदद से बनाया गया है। न कोई स्टूडियो गया है, न कोई एक-दूसरे से मिला है। संगीत पर ऋषि एस॰ बालाजी ने वर्जिश की है तो आवाज़ पर सुबोध साठे ने। सजीव सारथी भी गीत के बोलों को इधर-उधर इस इंटरनेटीय-प्रयोगशाला में ही करते रहे हैं।



नीचे के प्लेयर से गीत सुनें-



कोई परेशानी आये तो यहाँ से डाऊनलोड कर लें।


गीत के बोल

वो नर्म-सी मदहोशी कहाँ है,
वो सब्ज़-सी सरगोशी कहाँ है,
मिलती नहीं, तेरी सदा,
बस सर्द-सी, खामोशी यहाँ है,

१.
फैली है चारसू, कैसी ये उदासी,
लगती है बद्‌दुआ-सी अब हवा भी,
टूटा साज़, रूठा राग,
ढूंढे वो सुर कहाँ है,
वो नर्म-सी....

२.

गुनने लगी है रात, कितने फ़साने,
आने लगे हैं याद, गुजरे ज़माने,
टूटा साथ, छूटा हाथ,
टूटा ये दिल यहाँ है,
वो नर्म-सी ....

हिन्द-युग्म दिसम्बर २००७ के अंत तक ८ से १० गीतों (ग़ज़लों) का एक अल्बम पूरा करना चाहता है। यदि आप में से कोई आवाज़ देने या संगीत देने (या दोनों) में रुचि रखता हो तो sajeevsarathie@gmail.com पर संपर्क करे।

हिन्द-युग्म का पहला स्वरबद्ध गीत


हिन्द-युग्म शुरू से ही हर तरह की कला को हिन्दी-भाषा के माध्यम से प्रोत्साहित करने की वक़ालत करता रहा है। पिछले ३-४ महीनों में इस दिशा में प्रयास करते हुए हमने कविता से अलग कहानी, बाल-साहित्य आदि विधाओं पर काम करना शुरू किया। समीक्षा के लिए ज़गह बनाई, पेंटिंग का स्कोप सुनिश्चित किया, नये-नये चित्रकारों को जोड़ा। पॉडकास्ट को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए सुबोध साठे जैसे उभरते, प्रतिभाशाली आवाज़ से अलंकृत किया। सुबोध द्वारा गायी गई तुषार जोशी की कविता 'भूल गये हो' को आज तक ३०६७ श्रोताओं ने व इन्हीं कविता 'दिल अभी पास था' को २९२७ श्रोताओं ने डाऊनलोड करके सुना। इससे पूरे टीम का मनोबल बढ़ा। इसी क्रम में आज हम हिन्द-युग्म पर पूरी तरह से साज़ व आवाज़ द्वारा रिकार्ड किया हुआ गीत लेकर आये हैं। पिछले दोनों प्रयोग कविता पर किये गये थे, मगर इस बार गीत के बोल आवाज़ को ध्यान में रखकर लिखे गये। यह प्रयोग किसी व्यवसायिक स्टूडियो की देन नहीं है, वरन पूरी तरह सूचना की नई विधा इंटरनेट का प्रयोग करके इस गाने को अमली-ज़ामा पहनाया गया है। इस गीत के संगीतकार ऋषि एस॰ बालाजी हैदराबाद में बैठकर स्वरबद्ध कर रहे थे, वहीं गायक सुबोध साठे अपनी कमान नागपुर शहर से सम्हाले हुए थे। इस संकल्पना के जनक व गीतकार सजीव सारथी दिल्ली नगरी से शब्दों के साथ खेल रहे थे। संसाधन सीमित थे, फ़िर भी तीनों ने अपनी पूरी ऊर्जा लगाकर इसे सुमधुर बनाने का पूरा प्रयास किया है। शेष मूल्यांकन तो आप श्रोता करेंगे। यह तो इस गीत की मेकिंग थी।


टीम-परिचय

संगीतकार- ऋषि एस॰ बालाजी


गायक- सुबोध साठे




गीतकार- सजीव सारथी





गीत सुनने के लिए नीचे के प्लेयर पर क्लिक करें (गीत को पूरा बफ़र हो जाने दें



यदि आप इस गीत को उपर्युक्त प्लेयर से ठीक से नहीं सुन पा रहे हैं तो इस गीत को यहाँ से डाऊनलोड करें।

गीत के बोल

सुबह की ताज़गी हो,
शबनम की बूँद कोई,
फूलों की पंखुड़ी पर,
किरणों का प्यार लेकर,
जैसे बिखर रही हो,
तुम ही बिखर रही हो, ओ सनम.....

सुबह की ताज़गी हो....

१.
चंदा की चांदनी हो,
चांदी की नाव कोई,
बेखुद-सी इस हवा में,
जैसे लहर-लहर पे,
इतरा के चल रही हो.
तुम ही तो चल रही हो.... ओ सनम....

चंदा की चाँदनी हो....

२.
सरगम की बांसुरी हो,
मौसम की बात कोई,
महकी हुई फ़िज़ा में,
गीतों की मस्त धुन पर,
जैसे मचल रही हो,
तुम ही मचल रही हो..... ओ सनम..

सरगम की बांसुरी हो...

सुबहा की ताज़गी हो.....