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गोरी


यौवन-रस छलकावत गोरी, डगमग पग धरके।
खींचत अपनी ओर सजन को, नेह डोर धरके।।

मारत है प्रिय! दृष्टि दुधारी, उभय घात करके,
बरषावत है नयन-पुष्प पुनि, नयन-कलश भरके।
हरषावत विकराल दामिनी, दन्त-पंक्ति चमके,
अधर लालिमा बिच पुनि विद्युत, छिपत जतन करके।

गौर वर्ण अरु श्याम केश ज्यों रात्रि-दिवस मिलके,
शुभ्र पृष्ठ केशावृत्त ज्यों, सावन-घन आ धमके।
वाणी सरस, सहज, मधुमय असि सुन्दर हिय हरषे,
समझ न आवत मृदुल वचन या अमृत-घट छलके।

देखत हूँ मैं छवि तुम्हारी नैनन भरि-भरिके,
तुमसे चित्त हटत नहिं, हारयों लाख जतन करके।
कोमल बदन सहज जीवन की आभा मन भरके,
तुम बिन हिय स्थान रिक्त है, भरो कृपा करके।

यौवन-रस छलकावत गोरी, डगमग पग धरके।
खींचत अपनी ओर सजन को, नेह डोर धरके।।


कवि- पंकज तिवारी


शब्दार्थ-

नेह- प्रेम,
बरषावत- बरसात करती है,
पुनि- सुन्दर, पवित्र,
हरषावत- प्रसन्न होना, हँसना, रोमांचित होना,
दामिनी- बिजली,
बिच- बीच,
शुभ्र- श्वेत, सफ़ेद, उज्जवल,
पृष्ठ- पीठ,
केशावृत्त- बालों से आवृत्त, बालों से भरा,
हिय- हृदय,

ख़याल रखना भूल जाते हैं


ऐसा क्यूँ होता है?
हम बन जाते हैं
उनकी 'उलझन' का कारण
जो होते हैं हमारे सबसे करीब ;
क्या हैं हम लापरवाह
या बदनसीब?
या हम करते हैं
रिश्तों से बेईमानी;
या फिर रिश्तों को अहमियत
ही नहीं देते हम।
ये सारे ही सवाल हैं बहुत अहम,
बहुत खास;

और इसीलिए
हम चाहते हैं इनके जबाब।
लेकिन ये बात कि
हम रिश्तों को अहमियत ही नहीं देते,
सही नहीं है बल्कि गलत है।
तो क्या हम बदनसीब हैं,
लेकिन बदनसीबी का रोना, रोना
तो नामर्दों का काम है।
हाँ, लापरवाही वाली बात शायद
हो सकती है कुछ हद तक सही;
क्यूँकि पूरी ज़िंदगी
रिश्तों का ही तो ताना-बाना है।
लेकिन क्या वह ताना-बाना
इतना उलझा हुआ होता है कि
हम उसी में उलझ करके रह जायँ
और लापरवाह हो जायँ।
शायद, ऐसा हो भी।
लेकिन, मेरे हिसाब से तो ऐसा होना नहीं चाहिए।
लगभग हर समय
हम रिश्तों को ही तो
ठीक करने में जुटे रहते हैं।

अपने करीबियों का खयाल रखते हैं;
बल्कि बहुत खयाल रखते हैं।
लेकिन,
शायद गलती यहीं पर हो जाती है;
क्यूँकि
हम कुछ ज़्यादा ही खयाल रखना चाहते हैं।
शायद, इतना ज़्यादा कि
उनके खयालों का भी
खयाल रखना भूल जाते हैं।
लेकिन क्या ऐसा ही होता है?
हाँ, होता क्यूँ नहीं, ज़रूर ही होता है।
क्या हम अपने-अपने करीबियों
के भले का खयाल रखते हुए
उनके विचारों-भावनाओं की परवाह करते हैं?
शायद नहीं।

क्योंकि हम सोचते हैं कि
हम उनके लिए जो भी चीज़ अच्छी समझते हैं,
सिर्फ़ वही चीज़ उनके लिए अच्छी है
और दूसरी चीज़ नहीं।
हम भूल जाते हैं कि
वह हम पर आश्रित होते हुए भी
अपना एक स्वतंत्र अस्तित्व रखते हैं।
अनजाने में हम उसपर
अपने आप को थोपकर
उसके अस्तित्व को ही मिटाने लगते हैं।
अब बात बिल्कुल सीधी है।

क्यों कोई भी अपने अस्तित्व को
मिटते हुए देखकर चुप बैठा रहेगा?
यहीं से नींव पड़ जाती है
परस्पर संघर्ष की,
आपसी कलह की, मनमुटाव की।
हम अपने को रिश्तों के प्रति
समर्पित, ईमानदार और सजग तो कहते हैं
लेकिन रहते नहीं हैं।
लेकिन हमारी ज़िंदगी में हम क्या कहते हैं?
वह तो महत्व रखता ही है।
लेकिन उससे भी कहीं ज़्यादा
अहमियत इस बात की होती है
कि हम क्या करते हैं
और कैसे करते हैं?


हर इक गुल खूबसूरत है,
सभी पर हक़ तुम्हारा है।
ये अब तो तेरी मर्ज़ी है,
मिटा दे या महकने दे।।



कवि- पंकज तिवारी

आज फूल उदास है


अगर फूल कहे कि मैं उदास हूँ,
तो कौन मानेगा?
लेकिन यक़ीन जानिये,
आज फूल उदास है।
पर, जो उदास हो, वह फूल ही किस बात का?
ज़रूर कुछ ख़ास बात होगी।
आज फूल अपने दिल की बात
किसी से कहना चाह रहा है।
पर सुनेगा कौन?

अगर कोई सुनने वाला न हो तो
क्या कोई अपने दिल की बात ही नहीं कहता?
आज कोई सुने, न सुने
उसको तो अपनी बात कहना ही है।
दरअसल उसे एक सवाल पूछना है।
शायद 'आप' से या शायद अपने आप से।
उसे सवाल उतना ही ज़रूरी लगता है
जितना कि उसका फूल होना।
ऐसा नहीं है कि वह प्रकृति के झँझावातों से
लड़ते-लड़ते थक गया है।
उसमें अभी भी वो ताब है कि
वह लड़ सकता है तूफानों से।
झेल सकता है भयंकर गर्मी, कठिन सर्दी, मुश्किल बारिश।
वह कर सकता है, सामना तमाम तरह के अभावों का
चाहे वह पानी का हो,
ख़ाद का हो
या कोई और।

पर बहुत असमंजस में हैं वह
आज खड़ा है वह एक दोराहे पर।
उसे करना है एक बड़ा फैसला
जो बदल सकता है उसके जीवन की धारा।
जिस दोराहे पर वह खड़ा है
उसके एक ओर है
वह बाग़वाँ जिसने उसे तैयार किया
और तैयार करने में उसने अपना काफी कुछ,
बल्कि लगभग सब कुछ ही तो दाँव पर लगा दिया।
दिन-रात देखभाल की।
ख़ाद दिया।
पानी दिया।
निराई-गुड़ाई की।
मतलब, वह सब कुछ जो वह फूल के वास्ते कर सकता था,
किया।

तो दूसरे छोर पर हैं दुनिया के लोग।
बाग के बाहर की दुनिया के लोग।
जो उस फूल को बड़ी उम्मीदों से देख रहे हैं।
लेकिन, दुनिया का फूल पर क्या हक़ बनता है?
उसे तैयार तो माली ने किया।
माली ही ने तो उसके लिए अपना खून-पसीना
एक किया।

लेकिन दुनिया का भी हक़ क्यों नहीं बनता फूल पर?
आख़िर जिस माली ने उसे तैयार किया
वह भी रहता तो दुनिया में ही है।
इसी हवा में साँस लेता है।
इसी आकाश तले सोता है।
इसी धरती का अन्न खाता है।
आख़िर वह माली
जिसने फूल को तैयार किया,
किसी न किसी रूप में दुनिया का कर्ज़दार है।
उस माली पर भी तो दुनिया का हक़ हुआ।
तो फिर,
फूल पर क्यों नहीं?


"कैसे कहेगा बाग़वाँ ग़ुल सिर्फ है मेरा।
आख़िर में उसका बाग़ कोई टापू तो नहीं है।।"




कवि- पंकज तिवारी

ख्वाबों में कई बार


उल्फ़त है तुमसे मुझको बेझिझक ऐ मेरे यार,

बेमुरउव्वत भी हुआ हूँ, तेरे साथ कई बार।


माना है दोष मेरा, मगर आपका भी है,

तड़पाया है मुझको मज़े से, तुमने कई बार।


तेरे सिवा कहीं भी ठहरती नहीं नज़र,

आज़माकर अपने आप को, देखा है कई बार।


वैसे तो हारना मेरे मिजाज़ में नहीं

बदला है अपने रूख को, तेरे चलते भी कई बार।


बनते हो हमसे भोले, हम मान लें कैसे?

तुमने है की शरारत, ख्वाबों में कई बार।


वैसे तो आदमी शरीफ़ मैं भी कम नहीं,

मचली है तबीयत, तेरी सोहबत में कई बार।


उल्फ़त है तुमसे मुझको बेझिझक ऐ मेरे यार,

बेमुरउव्वत भी हुआ हूँ, तेरे साथ कई बार।


कवि- पंकज तिवारी

ग़मज़दा क्यूँ है


दिल मेरा आज ग़मज़दा क्यूँ है
जिसको देखो वही ख़फ़ा क्यूँ है।

हम समझते हैं जिसे जानेज़िगर, जानेमन
मन का दुश्मन वही बना क्यूँ है।

हजारों ख्वाहिशें कुर्बान हैं जिसपर मेरी
जान करके भी बुत बना क्यूँ है।

जख़्म देता है जो दिल को मेरे तड़पाके
दिल का मालिक वही बना क्यूँ है।

मैंने अश्कों को बड़ी मुश्किलों से रोका है
फिर भी दिल उसका तलबग़ार बना क्यूँ है।

दिल मेरा आज ग़मज़दा क्यूँ है
जिसको देखो वही ख़फ़ा क्यूँ है।


कवि- पंकज तिवारी