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Wednesday, February 07, 2007

ख्वाबों में कई बार


उल्फ़त है तुमसे मुझको बेझिझक ऐ मेरे यार,

बेमुरउव्वत भी हुआ हूँ, तेरे साथ कई बार।


माना है दोष मेरा, मगर आपका भी है,

तड़पाया है मुझको मज़े से, तुमने कई बार।


तेरे सिवा कहीं भी ठहरती नहीं नज़र,

आज़माकर अपने आप को, देखा है कई बार।


वैसे तो हारना मेरे मिजाज़ में नहीं

बदला है अपने रूख को, तेरे चलते भी कई बार।


बनते हो हमसे भोले, हम मान लें कैसे?

तुमने है की शरारत, ख्वाबों में कई बार।


वैसे तो आदमी शरीफ़ मैं भी कम नहीं,

मचली है तबीयत, तेरी सोहबत में कई बार।


उल्फ़त है तुमसे मुझको बेझिझक ऐ मेरे यार,

बेमुरउव्वत भी हुआ हूँ, तेरे साथ कई बार।


कवि- पंकज तिवारी

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7 कविताप्रेमियों का कहना है :

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

अच्छी रचना है| नये मिजाज लडके के मन की बात लगती है|

shrdh का कहना है कि -

बनते हो हमसे भोले, हम मान लें कैसे?

तुमने है की शरारत, ख्वाबों में कई बार।

bhaut bhaut achha likha hai pankaj ji

ye panktiyan jaise kcuh nathkath si lagi

aapko padhna achha laga

Anupama Chauhan का कहना है कि -

sundar rachna hai...hume pasand aai

गिरिराज जोशी "कविराज" का कहना है कि -

अच्छी रचना...

tanha kavi का कहना है कि -

achchha likha hai, pankaj bhai aapne.

mahashakti का कहना है कि -

अच्‍छी कविता है

आप भी मेर "ख्वाबों में कई बार" नजर आते है

alice asd का कहना है कि -

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