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गोरी


यौवन-रस छलकावत गोरी, डगमग पग धरके।
खींचत अपनी ओर सजन को, नेह डोर धरके।।

मारत है प्रिय! दृष्टि दुधारी, उभय घात करके,
बरषावत है नयन-पुष्प पुनि, नयन-कलश भरके।
हरषावत विकराल दामिनी, दन्त-पंक्ति चमके,
अधर लालिमा बिच पुनि विद्युत, छिपत जतन करके।

गौर वर्ण अरु श्याम केश ज्यों रात्रि-दिवस मिलके,
शुभ्र पृष्ठ केशावृत्त ज्यों, सावन-घन आ धमके।
वाणी सरस, सहज, मधुमय असि सुन्दर हिय हरषे,
समझ न आवत मृदुल वचन या अमृत-घट छलके।

देखत हूँ मैं छवि तुम्हारी नैनन भरि-भरिके,
तुमसे चित्त हटत नहिं, हारयों लाख जतन करके।
कोमल बदन सहज जीवन की आभा मन भरके,
तुम बिन हिय स्थान रिक्त है, भरो कृपा करके।

यौवन-रस छलकावत गोरी, डगमग पग धरके।
खींचत अपनी ओर सजन को, नेह डोर धरके।।


कवि- पंकज तिवारी


शब्दार्थ-

नेह- प्रेम,
बरषावत- बरसात करती है,
पुनि- सुन्दर, पवित्र,
हरषावत- प्रसन्न होना, हँसना, रोमांचित होना,
दामिनी- बिजली,
बिच- बीच,
शुभ्र- श्वेत, सफ़ेद, उज्जवल,
पृष्ठ- पीठ,
केशावृत्त- बालों से आवृत्त, बालों से भरा,
हिय- हृदय,