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Wednesday, February 28, 2007

ख़याल रखना भूल जाते हैं


ऐसा क्यूँ होता है?
हम बन जाते हैं
उनकी 'उलझन' का कारण
जो होते हैं हमारे सबसे करीब ;
क्या हैं हम लापरवाह
या बदनसीब?
या हम करते हैं
रिश्तों से बेईमानी;
या फिर रिश्तों को अहमियत
ही नहीं देते हम।
ये सारे ही सवाल हैं बहुत अहम,
बहुत खास;

और इसीलिए
हम चाहते हैं इनके जबाब।
लेकिन ये बात कि
हम रिश्तों को अहमियत ही नहीं देते,
सही नहीं है बल्कि गलत है।
तो क्या हम बदनसीब हैं,
लेकिन बदनसीबी का रोना, रोना
तो नामर्दों का काम है।
हाँ, लापरवाही वाली बात शायद
हो सकती है कुछ हद तक सही;
क्यूँकि पूरी ज़िंदगी
रिश्तों का ही तो ताना-बाना है।
लेकिन क्या वह ताना-बाना
इतना उलझा हुआ होता है कि
हम उसी में उलझ करके रह जायँ
और लापरवाह हो जायँ।
शायद, ऐसा हो भी।
लेकिन, मेरे हिसाब से तो ऐसा होना नहीं चाहिए।
लगभग हर समय
हम रिश्तों को ही तो
ठीक करने में जुटे रहते हैं।

अपने करीबियों का खयाल रखते हैं;
बल्कि बहुत खयाल रखते हैं।
लेकिन,
शायद गलती यहीं पर हो जाती है;
क्यूँकि
हम कुछ ज़्यादा ही खयाल रखना चाहते हैं।
शायद, इतना ज़्यादा कि
उनके खयालों का भी
खयाल रखना भूल जाते हैं।
लेकिन क्या ऐसा ही होता है?
हाँ, होता क्यूँ नहीं, ज़रूर ही होता है।
क्या हम अपने-अपने करीबियों
के भले का खयाल रखते हुए
उनके विचारों-भावनाओं की परवाह करते हैं?
शायद नहीं।

क्योंकि हम सोचते हैं कि
हम उनके लिए जो भी चीज़ अच्छी समझते हैं,
सिर्फ़ वही चीज़ उनके लिए अच्छी है
और दूसरी चीज़ नहीं।
हम भूल जाते हैं कि
वह हम पर आश्रित होते हुए भी
अपना एक स्वतंत्र अस्तित्व रखते हैं।
अनजाने में हम उसपर
अपने आप को थोपकर
उसके अस्तित्व को ही मिटाने लगते हैं।
अब बात बिल्कुल सीधी है।

क्यों कोई भी अपने अस्तित्व को
मिटते हुए देखकर चुप बैठा रहेगा?
यहीं से नींव पड़ जाती है
परस्पर संघर्ष की,
आपसी कलह की, मनमुटाव की।
हम अपने को रिश्तों के प्रति
समर्पित, ईमानदार और सजग तो कहते हैं
लेकिन रहते नहीं हैं।
लेकिन हमारी ज़िंदगी में हम क्या कहते हैं?
वह तो महत्व रखता ही है।
लेकिन उससे भी कहीं ज़्यादा
अहमियत इस बात की होती है
कि हम क्या करते हैं
और कैसे करते हैं?


हर इक गुल खूबसूरत है,
सभी पर हक़ तुम्हारा है।
ये अब तो तेरी मर्ज़ी है,
मिटा दे या महकने दे।।



कवि- पंकज तिवारी

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6 कविताप्रेमियों का कहना है :

ranju का कहना है कि -

क्यूँकि पूरी ज़िंदगी
रिश्तों का ही तो ताना-बाना है।
लेकिन क्या वह ताना-बाना
इतना उलझा हुआ होता है कि
हम उसी में उलझ करके रह जायँ
और लापरवाह हो जायँ।
शायद, ऐसा हो भी।
लेकिन, मेरे हिसाब से तो ऐसा होना नहीं चाहिए।
लगभग हर समय
हम रिश्तों को ही तो
ठीक करने में जुटे रहते हैं।


बहुत ख़ूब ....बहुत ही सही लफ़्ज़ो में ढाला है आपने ..

mahashakti का कहना है कि -

सुन्‍दर कविता

आपने सरलतम शब्‍दों के साथ अच्‍छी कविता

ajay का कहना है कि -

बात तो आपने सही कही है पंकज जी। गद्यगीत में आपका यह प्रयास भी सराहनीय है।

मोहिन्दर कुमार का कहना है कि -

सुन्दर भावों से भरी कविता.... बधाई

ग़रिमा का कहना है कि -

क्यों कोई भी अपने अस्तित्व को
मिटते हुए देखकर चुप बैठा रहेगा?
यहीं से नींव पड़ जाती है
परस्पर संघर्ष की,
आपसी कलह की, मनमुटाव की।

सन्दर विचार पर एक कडी और भी है
वो ये कि

हम अपना ही अस्तित्व खो जाते हैं, फिर अस्तित्व विहिन होने के बाद कोई नहीं पुछ्ता वो रिश्ते जो कभी हमे सर-आँखो पर रखते थे, वही कतरा के निकल जाते हैं।

कुछ खयाल उभर आये हैं आशा है आपको बुरा न लगा होगा। :)

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

पंकज जी अच्छी रचना है बधाई..आपकी पिछली कविता का सार भी आपने एक "शेर" में किया था, इस बार भी अंत "शेर" से..लगता है इसे अपनी पहचान बना रहे हैं इसे आप...

हर इक गुल खूबसूरत है,
सभी पर हक़ तुम्हारा है।
ये अब तो तेरी मर्ज़ी है,
मिटा दे या महकने दे।।

*** राजीव रंजन प्रसाद

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