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Friday, May 06, 2011

हम करते ही नहीं हैं प्रार्थनाएँ


संगीता सेठी यूनिप्रतियोगिता की सबसे नियमित कवियत्रियों मे से हैं, जिनकी प्रविष्टियाँ लगभग हर माह प्रतियोगिता मे शामिल होती हैं और शीर्ष मे स्थान भी बनाती हैं। इससे पहले उनकी एक कविता दिसंबर प्रतियोगिता मे बारहवें स्थान पर रही थी। प्रस्तुत कविता ने मार्च माह मे पाँचवां स्थान प्राप्त किया है।

पुरस्कृत कविता: हम करते ही नहीं हैं प्रार्थनाएँ

हम करते ही नहीं हैं प्रार्थनाएँ
कि हमारे पड़ौस का
बीमार बच्चा
हो जाए चंगा
चहकता चिड़ियों सा
और खेलने लगे
आँगन में अपने,
ताकि हमारे आँगन भी
उसके चहकने की आवाज़ें
आने लगें छन कर
और हमारे आँगन का बच्चा
उचक कर देखने लगे
पडौस की दीवार के उस पार।

हम करते ही नहीं है प्रार्थनाएँ
कि इस वर्ष बरसें बादल
किसानों की उन फसलों पर,
जो देख रही हैं बाट
भरपूर पैदावार के लिए,
ताकि धुँए भरे हमारे शहर में
पहुँचे तादाद में पैदावार
और हमारे जेब पर ना पड़े मार
और हम भरवा सकें
अपने वाहनों में पेट्रोल
और धुँआ करने के लिए।

हम करते ही नहीं है प्रार्थनाएँ
कि टूटे ना एक भी सितारा
इस आकाश की ओढनी से,
लबालब रहे आकाश की ओढनी
सितारों से
ताकि ढकी रहे धरती
उस ओढनी की छाँव से
कि एक भी उल्कापिण्ड
धरती की छाती पर
गिर कर ना करे विलाप।

हम करते ही नहीं है प्रार्थनाएँ
देश के उस पार भी
आबो-हवा चलती रहे
ठण्डी और सुखद
कि सरहद पर बची रहे गोलियाँ,
ताकि एक भी चिंगारी
हमारी या उनकी सरहद पर
घास के एक भी टुकड़े को
जला ना सके।

हम करते ही नहीं है प्रार्थनाएँ
कि धरती पर जीने वाले
हर एक इंसान को
मुहैय्या हो रोटी कपड़ा और मकान.
ताकि खाते वक्त रोटी,
पहनते वक्त कपड़े
और ओढते वक्त चादरें
नहीं आए हमारे सामने
उन लाचार लोगों की सूरतें,
कि हम एक भी निवाला
निगल ना सकें हलक से।

हम जानते ही नहीं है प्रार्थना
की शक्ति को
वरना वो ताकत
सिमट जाती है
आत्मबल बन कर
फिर क्या ज़ुर्रत
कि पड़ौस का बच्चा
चंगा ना हो,
फसलों पर
ना बरसें बादल,
टूटे ना सितारे कभी,
बहती रहे हवाएँ
ठण्डी और सुखद
इस पार भी
उस पार भी,
और धरती पर जीने वाला
हर इंसान हो खुशहाल
कि दर्द का एक शूल भी
उसको छू ना पाए

दरअसल
हम करते ही नहीं है प्रार्थनाएँ
उन सब के लिए ।
______________________
पुरस्कार: हिंद-युग्म की ओर से पुस्तकें।

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6 कविताप्रेमियों का कहना है :

धर्मेन्द्र कुमार सिंह ‘सज्जन’ का कहना है कि -

आज कल तो लोग अपनों के लिए भी प्रार्थानाएँ नहीं करते ईर्ष्या के मारे। दूसरों के लिए करना तो बहुत दूर की बात है। बहुत ही सुंदर रचना, बधाई

दीपक 'मशाल' का कहना है कि -

सुन्दर सृजन.. संगीता जी को बधाई..

Hari Shanker Rarhi का कहना है कि -

कविता वाकई अच्छी बन पड़ी है और इसे सम्मानित करना न्यायसंगत है।

Atul Saxena का कहना है कि -

अति सुन्दर और भाव प्रवण कविता ,संगीता जी को बहुत बहुत बधाई !!!

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