फटाफट (25 नई पोस्ट):

Friday, April 29, 2011

मार्च माह की यूनिप्रतियोगिता के परिणाम




   मार्च माह की यूनिप्रतियोगिता के परिणाम ले कर हम उपस्थित हैं। हमारे निर्णायकों के अतिशय व्यस्तता के चलते परिणामों की घोषणा मे इस बार काफ़ी बिलम्ब हुआ जिसके लिये हम पाठकों और प्रतिभागियों से क्षमा माँगते हैं और उनके धैर्य के लिये हार्दिक आभारी हैं। मार्च माह 2011 की प्रतियोगिता हमारी मासिक यूनिकवि और यूनिपाठक प्रतियोगिता का 51वाँ संस्करण थी। इस बार प्रतियोगिता मे कुल 38 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया जिनमे कई नये नाम भी शामिल थे। सभी रचनाएं विगत माहों की तरह ही 2 चरणों मे आँकी गयीं। पहले चरण के तीन निर्णायकों के द्वारा दिये अंकों के आधार पर 18 रचनाओं को दूसरे चरण के लिये भेजा गया। दूसरे चरण मे दो निर्णायकों ने बची हुई कविताओं को परखा। इस बार कई अच्छी कविताओं के आने से निर्णायकों का काम आसान नही था और शीर्ष की कविताओं के बीच अंतर भी काफ़ी कम रहा। दोनों चरण के कुल अंकों के आधार पर कविताओं का वरीयता क्रम निर्धारित किया गया। मार्च 2011 की प्रतियोगिता के यूनिकवि बनने का श्रेय दर्पण साह को मिला है जिनकी कविता ’लोकतंत्र दरअसल’ को निर्णायकों ने यूनिकविता चुना है।

यूनिकवि: दर्पण साह

    23 सितम्बर 1981 को पिथौरागढ़(कुमायूँ), उत्तराँचल में जन्मे दर्पण शाह 'दर्शन' को साहित्य में रूचि अपने परिवार से विरासत में मिली। विज्ञान और होटल मैनेजमेंट के छात्र होते हुए भी ये हमेशा से ही साहित्य रसिक रहे। बचपन से ही इन्हें सीखने की लालसा को हमेशा एक विद्वान् कहलाने से ऊपर रखना सिखलाया गया। कहानी-लेखन के अतिरिक्त कविता-लेखन, ग़ज़ल-नज़्म लेखन इनकी मूल विधाओं में शामिल है। दर्शन मूलतः साहित्य के बने-बनाए ढर्रे पर चलने के बजाय प्रयोगधर्मी साहित्य के सृजन में यकीन रखते हैं। खाली समय में दिल को छू लेने वाला संगीत सुनना दर्शन जी का पसंदीदा शगल है। सम्प्रति एमेडियस इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, दिल्ली में तकनीकी-सलाह प्रभारी दर्पण हिंद-युग्म के प्रकाशन ’संभावना डॉट कॉम’ का हिस्सा भी रह चुके हैं।
दूरभाष: 09899120246

यूनिकविता: लोकतंत्र दरअसल...

गुस्से की तलाश में
जब मैं निकलूंगा राजपथ,
बस वहाँ पर
बेरोजगार 'जन' के
कांपते हुए कंधे मिलेंगे मुझे
"कंधे जो कल तक झुक जायेंगे"
ये नहीं बताऊंगा मैं आपको !
(बोलने का अधिकार- लोकतंत्र के नाम पर / चुप रहने की आदत- देशभक्ति की खातिर)
अपेक्षाओं के भविष्य में
बहुत हद तक  संभव है कि
कल वो 'जन' इंडिया गेट के बीचों बीच खड़ा हो जाएगा,
फाड़ के उड़ा देगा अपने सर्टिफिकेट
अपने शरीर में मिट्टी-तेल छिड़क के जला लेगा अपने आप को;
या बस ४ दिन से लगातार इस्तेमाल किये गए
कुंद पड़े ब्लेड से
लोकतंत्र की कोई नस काटने की कोशिश करेगा।
या अगर ज़िहादी हुआ तो
बम भी फोड़ सकता है !
पर भाइयों-बहनों,
श्रोताओं-दर्शकों,
डरने की कोई बात नहीं.
क्यूंकि,
लोकतंत्र वास्तव में तसल्ली का ऐसा खुशफ़हमी षड़यंत्र है
जिसमें हर बच जाने वाले को
ये शुक्र है कि उन्हें कुछ नहीं हुआ
मरने तक !

क्रांति की तलाश में
जब में निकलूंगा मलाड,
एक भूखा, अलाव तापता
'गण' मिलेगा मुझको.
कल के 'मुम्बई मिरर' के पृष्ठ १० में
विज्ञापनों से खाली बची जगह के बीच
उस अनाम 'कोई' की
कभी न पढ़ी जाने वाली 'कोई एक और' खबर होगी.
ये नहीं जान पायेंगे आप.
क्यूंकि,
आपके व्यस्त कार्यक्रम में
सीढियां चढ़ना ज़्यादा ज़रूरी है
(वो सीढियां बन के ही आपके नीचे कुचल के मारा गया था)
(ये) जानना कम
और समझना बिल्कुल नहीं।
फिर भी एक उम्मीद से फ़िर जाऊँगा चर्च गेट
कि शायद कोई जुलुस
उसके सरोकारों की अगुआई कर रहा होगा।
जुलुस जिसमें
'कमल', 'हाथ' या 'हंसिया' के झंडे नहीं होंगे,
बस मशालें होंगी,
उस अलाव से ज़्यादा 'दीप्त'
बहरहाल,
उस खबर के सामने एक विज्ञापन पे तो ध्यान गया होगा न आपका?
'व्हेन डिड यू फील सिल्क लेटली ?'
सच बताइए
व्हेन डिड यू फील रिवोल्यूशन लेटली?
डिड यू एवर ?
आई डोन्ट थिंक सो,
क्यूंकि,
अफ़सोस कि लोकतंत्र में
उसी तरह अलग हैं मायने
भ्रष्टाचार और हत्या के
जैसे क्रांति और देशद्रोह के।

युवतम-राष्ट्र का 'विजयी-पौरुष-उत्साह' तलाशने जब मैं निकलूंगा लहुराबीर
समर्पण (हार नहीं) की ग्लानि-जनित लज्जा के कारण
'वी शैल ओवरकम' का 'सतरंगी-उम्मीदी-स्त्रैण-दुपट्टा' ओढ़े
सहमा 'मन' मिलेगा मुझे.
तथापि,
ग़ालिब से इत्तफाक रखने के बावजूद,
मैं मणिकर्णिका घाट रोज़ राख कुरेदने जाऊँगा,
कि शायद राख हुए उत्तेजना के स्थूल शरीर में,
आत्माभिमानी मन का कुछ बचा हिस्सा
पक्षपात के अनुभव का इँधन पाकर ही सही
जल उठे कभी।
किन्तु हाँ !
लोकतंत्र,
हर पाँच साल में बांटी जाने वाली
कच्ची शराब में प्रयुक्त ऐसी 'शर्करा' है
जिसका 'चुनाव-परिणाम'
किसी भी पंचवर्षीय योजना के
'वसा' से ज़्यादा 'इंस्टेंट' है !

लोकतंत्र दरअसल...
...२४ तीलियों वाला रैखिक-वृत्त है...
'फॉर दी' से शुरू होकर वाया 'बाय दी', 'टू दी' नामक गंतव्य तक पहुँचता हुआ...
...जन गण मन !

एक कथन जो प्रश्न भी है:
राष्ट्र के चौंसठ-साला इतिहास के विश्लेषण के बाद
सफल लोकतंत्र के ऊपर गर्वानुभूति तर्कसंगत है.

लोकतंत्र,
..."जो हुआ बेशक वो बुरा हुआ"
और,
"जो होगा वो यकीनन अच्छा ही होगा"
के बीच का ऐसा देशभक्त-सेतु है,
जिसका
'सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण' होने के कारण
चित्र खींचना मना है।
अस्तु,
विश्लेषण भी !
नहीं तो मैं आपको ज़रूर बताता कि...
क्रांतियों की अपेक्षा
लोकतंत्र (मैं इसे षड़यंत्र कहता) की सफलता का प्रतिशत
सदैव अधिक ही होना है भाई !
क्यूंकि 'लोकतंत्र' वस्तुतः
क्रांति की तरह
यू. पी. या बिहार बोर्ड का पढ़ा नहीं,
किसी 'ए-रेटेड' बी-स्कूल में एजुकेटेड है.

लोकतंत्र,
दरअसल ऐसा 'आशीर्वाद' है
जो कांग्रेसियों द्वारा
'राजशाही-की-गालियों' के 'पर्यायवाची'
और भाजपाईयों द्वारा,
'दिव्य-भगवा-श्राप' के 'समानार्थक'
प्रयुक्त होता आया है।

लोकतंत्र,
राष्ट्र-ध्वज का ऐसा नवीनतम-सामाजिक संस्करण है
जिसके सामयिक-साम्प्रदायिक रंगों में
'काफ़्का ऑन द शोर' सा अद्भुत शिल्प है.
'हिन्दू-भगवा' और 'मुस्लिम-हरा' सगे भाई हैं जहाँ...
...'बाप की जायजाद के बंटवारे' वास्ते !

लोकतंत्र,
'सूचना के अधिकार' के साथ
'पद और गोपनीयता की शपथ'
और ''किसान' के साथ
'भुखमरी' का
सर्वविदित-विरोधाभास है।

लोकतंत्र
जो चंद रोज़ पहले तक
विश्व बैंक और अमेरिका की कठपुतली थी !
अब अपना वास्तविक-आर्थिक-मूल्य जान लेने के बाद
माफ़ करना, पर
'स्विस-बैंक' और 'लाल फीताशाही' की 'पेज़ थ्री' रखैल है !

लोकतंत्र,
दरअसल,
काटे जा चुके
'स्वर्णिम अतीत के जंगल' से,
'योजनाओं के नियोजित उद्यान' तक वाले
राष्ट्रीय राजमार्ग में लगा
'कार्य प्रगति पर है'
का सूचना-पट्ट है!
_________________________________________________________
पुरस्कार और सम्मान: हिंद-युग्म की ओर से पुस्तकें तथा प्रशस्तिपत्र। प्रशस्ति-पत्र वार्षिक समारोह में प्रतिष्ठित साहित्यकारों की उपस्थिति मे प्रदान किया जायेगा। समयांतर में कविता प्रकाशित होने की सम्भावना।

    इसके अतिरिक्त मार्च माह के शीर्ष 10 के अन्य कवि जिनकी कविताएं हम यहाँ प्रकाशित करेंगे और जिन्हे हिंद-युग्म की ओर से पुस्तकें दी जायेगी, उनका क्रम निम्नवत है-

धर्मेंद्र कुमार सिंह
दीपक चौरसिया ’मशाल’
राकेश जाज्वल्य
संगीता सेठी
मुकेश कुमार तिवारी
अखिलेश श्रीवास्तव
अनिता निहलानी
मनोज गुप्ता ’मनु’
रितेश पांडेय

उपर्युक्त सभी कवियों से अनुरोध है कि कृपया वे अपनी रचनाएँ 18 मई 2011 तक अन्यत्र न तो प्रकाशित करें और न ही करवायें।

     हम उन कवियों का भी धन्यवाद करना चाहेंगे, जिन्होंने इस प्रतियोगिता में भाग लेकर इसे सफल बनाया। और यह गुजारिश भी करेंगे कि परिणामों को सकारात्मक लेते हुए प्रतियोगिता में बारम्बार भाग लें। प्रतियोगिता मे भाग लेने वाले शेष कवियों के नाम निम्नांकित हैं (शीर्ष 18 के अन्य प्रतिभागियों के नाम अलग रंग से लिखित हैं)

सुवर्णा शेखर दीक्षित
कौशल किशोर
बृह्मनाथ त्रिपाठी
स्नेह सोनकर ’पीयुष’
कैलाश जोशी
नवीन चतुर्वेदी
डॉ अनिल चड्डा
निशा त्रिपाठी
शील निगम
प्रदीप वर्मा
मृत्युंजय साधक
सनी कुमार
केशवेंद्र कुमार
गंगेश कुमार ठाकुर
संदीप गौर
विवेक कुमार पाठक अंजान
मनोहर विजय
दीपाली मिश्रा
राजेश पंकज
सुरेंद्र अग्निहोत्री
सीमा स्मृति मलहोत्रा
आकर्षण गिरि
जोमयिर जिनि
आनंद राज आर्य
अभिषेक आर्य चौधरी
शशि आर्य
यानुचार्या मौर्य

यूनिपाठक सम्मान: मार्च माह की रचनाओं पर आयी टिप्पणियों गुणवत्ता के आधार पर डॉ अरुणा कपूर हमारी इस माह की यूनिपाठिका हैं। आशा है कि आगे भी उनकी गंभीर और रचनात्मक प्रतिक्रियाओं का लाभ हमारे कवियों को मिलता रहेगा। डॉ अरुणा को यूनिपाठिका के तौर पर हिंद-युग्म की ओर से पुस्तकें और प्रशस्तिपत्र दिया जायेगा।


आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)

17 कविताप्रेमियों का कहना है :

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) का कहना है कि -

शानदार दर्पण की धारदार कविता... ढेरो बधाईयां दर्पण!

manu का कहना है कि -

LOVE...



kyaa kahein.....!

&

kyun kahein.....??






बोलने का अधिकार- लोकतंत्र के नाम पर / चुप रहने की आदत- देशभक्ति की खातिर



:)

hamaari anmol smile...

manu का कहना है कि -

:):):)

manu का कहना है कि -

LOVE aGaiN...

:)

डिम्पल मल्होत्रा का कहना है कि -

बढ़िया अभिव्यक्ति बधाई

Rachana का कहना है कि -

aruna ji aur darpan ji ko bahut bahut badhai.
kavita ke roop me jan gan man ka khoob chitran kiya hai badhai
rachana

PD का कहना है कि -

congratulation dear :)

दीपक 'मशाल' का कहना है कि -

ओए होए..... मेरा यार बना है दूल्हा.. ऊप्स दूल्हा नहीं यूनिकवि.. चल कोई नहीं जल्द ही दूल्हा भी बन ही जाएगा.. लख-लख बधाइयां डियर.. कोई और कविता इसके आगे टिकने ही नहीं थी...

प्रिया का कहना है कि -

दर्पण को पढने के बाद आप इस लायक नहीं रहते की आप रिअक्ट करें...इन्हें पढने के बाद अक्सर एक वीरान सी ख़ामोशी होती है आस-पास.....और दिमाग या तो कुछ नहीं सोचता या फिर बहुत कुछ सोच जाता है.....लेकिन याद रहे...लोकतंत्र में लोग सिर्फ सोचते हैं, जैसा सोचते हैं वैसा करते नहीं ....मजबूरी का हवाला .....सच ये लोकतंत्र बड़ी मजबूर चीज़ है :-)

धर्मेन्द्र कुमार सिंह ‘सज्जन’ का कहना है कि -

इतनी लम्बी रचना है मगर पूरी तरह बाँधे रखती है। पाठक एक ही साँस में पूरी रचना को पढ़ जाता है। बहुत सुंदर रचना, हार्दिक बधाई दर्पण जी को रचना के लिए भी और प्रथम पुरस्कार के लिए भी।

रंजना का कहना है कि -

बस...निःशब्द कर दिया....

Disha का कहना है कि -

nisandeh srahneey kavitayein.
badhai

अपूर्व का कहना है कि -

दर्पण और अरुणा जी को ढेरो बधाइयाँ..कविता लोकतंत्र के बहाने देश की सामाजिक राजनैतिक व्यवस्था के बिगड़ चुके स्वरूप पर तल्ख सवाल उठाती है..और हमारे देश के जन-गण-मन की भावी दशा-दिशा के बारे मे नये सिरे से सोचने को मजबूर करती है..मगर वहीं मुझे कविता मे लोकतंत्र की अवधारणा संबंधी कुछ विरोधाभास भी नजर आते हैं..मुल्क की समस्याओं के जो सवाल कविता खड़े करती है..उनकी जड़ें हमारी सोच और हमारी कथनी-करनी के दोगलेपन की मिट्टी मे गहरे तक गड़ी हैं...
वैसे दर्पण जी को उनके ब्लॉग पर अकसर पढ़ना होता है,,मगर यहाँ हिंद-युग्म पर उन्हे पढ़ना अलग अनुभव रहा...बधाई

Navin C. Chaturvedi का कहना है कि -

प्रतियोगिता में भाग लेने वाले तथा पुरस्कृत होने वाले सभी रचानाधार्मियों को बहुत बहुत बधाई|

गौतम राजरिशी का कहना है कि -

...और आखिरकार दर्पण !

इस कविता को अगर नहीं चुना जाता तो शायद ईससे से ज्यादा अनुचित और कुछ नहीं होता| शेष, प्रिया और अपूर्व ने वो सब कह दिया है, जो मैं कहना चाहता था| आनेवाले दिनों में दर्पण के रचना -कर्म से हिन्दी साहित्य को बहुत उम्मीद है....

दिलीप कुमार का कहना है कि -

काफी अच्छा लगा जानकर की अब भी नौजवानों में कविताओं को ह्रदय से लिखने की इच्छा जागृत है. अनुजी को धन्यवाद जिसने मुझे ये लिंक प्रेषित किया है. संपादक-एडिटर को धन्यवाद जिसने इन्टरनेट पर ऐसी आशावादी धाराएं प्रवाह करने की कोशिश की है.

slither.io का कहना है कि -

Such a very useful article. Very interesting to read this article.I would like to thank you for the efforts you had made for writing this awesome article.
usps tracking

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)