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Sunday, April 11, 2010

हमेशा गाँव ही खुद को शहर में ढाल लेते हैं


मार्च माह की चौथी कविता एक ग़ज़ल है जिसे लिखा है रवीन्द्र शर्मा 'रवि' ने। रवि की ग़ज़लें हिन्द-युग्म के पाठक बहुत पसंद करते हैं। रवि एक बार हिन्द-युग्म के यूनिकवि भी रह चुके हैं।

पुरस्कृत ग़ज़ल

गरीबी में भी बच्चे यूँ उड़ाने पाल लेते हैं
ज़रा सी डाल झुक जाए तो झूला डाल लेते हैं

जहाँ में लोग जो ईमान की फसलों पे जिंदा हैं
बड़ी मुश्किल से दो वक्तों की रोटी दाल लेते हैं

शहर ने आज तक भी गाँव से जीना नहीं सीखा
हमेशा गाँव ही खुद को शहर में ढाल लेते हैं

परिंदों को मोहब्बत के कफस में कैद कर लीजे
न जाने लोग उनके वास्ते क्यों जाल लेते हैं

अभी नज़रों में वो बरसों पुराना ख्वाब रक्खा है
कोई भी कीमती सी चीज़ हो संभाल लेते हैं

ये मुमकिन है खुदा को याद करना भूल जाते हों
तुम्हारा नाम लेकिन हर घडी हर हाल लेते हैं

हमें दे दो हमारी ज़िन्दगी के वो पुराने दिन
'रवि' हम तो अभी तक भी पुराना माल लेते हैं


पुरस्कार- विचार और संस्कृति की मासिक पत्रिका 'समयांतर' की ओर से पुस्तक/पुस्तकें।

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14 कविताप्रेमियों का कहना है :

Prem Chand Sahajwala का कहना है कि -

परिंदों को मोहब्बत के कफस में कैद कर लीजे
न जाने लोग उनके वास्ते क्यों जाल लेते हैं

इस गज़ल का यह शेर सब से नायाब है. रविन्द्र जी की गज़लों की पहचान यह कि वे बेहद निश्छलता से लिखते हैं.

शारदा अरोरा का कहना है कि -

पसन्द आई आपकी ये ग़ज़ल , खास कर ये पंक्तियाँ
जहाँ में लोग जो ईमान की फसलों पे जिंदा हैं
बड़ी मुश्किल से दो वक्तों की रोटी दाल लेते हैं
शहर ने आज तक भी गाँव से जीना नहीं सीखा
हमेशा गाँव ही खुद को शहर में ढाल लेते हैं
अभी नज़रों में वो बरसों पुराना ख्वाब रक्खा है
कोई भी कीमती सी चीज़ हो संभाल लेते हैं

रवीन्द्र शर्मा का कहना है कि -

धन्यवाद सहजवाला जी . आपकी प्रेरणा और प्रेम सदा मेरे साथ रहे हैं .

दीपक 'मशाल' का कहना है कि -

ये मुमकिन है खुदा को याद करना भूल जाते हों
तुम्हारा नाम लेकिन हर घडी हर हाल लेते हैं
भाई मुझे तो सिर्फ इस शेर में ज्यादा नयापन नहीं लगा वर्ना बाकी पूरी ग़ज़ल ही नायब है.. आभार.

वन्दना का कहना है कि -

परिंदों को मोहब्बत के कफस में कैद कर लीजे
न जाने लोग उनके वास्ते क्यों जाल लेते है
गज़ब की प्रस्तुति……………………।एक से बढकर एक शानदार शेर्………………………॥पूरी गज़ल नायाब है।

M VERMA का कहना है कि -

ये मुमकिन है खुदा को याद करना भूल जाते हों
तुम्हारा नाम लेकिन हर घडी हर हाल लेते हैं
बहुत सुन्दर गज़ल. बेहतरीन

बेचैन आत्मा का कहना है कि -

वाह! आनंद आ गया पढ़कर । अभी कमेंट करने के मूड में बिलकुल नहीं था मगर अपने आप को रोक नहीं सका।
--बधाई।

Srijan का कहना है कि -

गरीबी में भी बच्चे यूँ उड़ाने पाल लेते हैं
ज़रा सी डाल झुक जाए तो झूला डाल लेते हैं

बेहद निश्छल, अच्छी गजल...बधाई।

विमल कुमार हेडा का कहना है कि -

अभी नज़रों में वो बरसों पुराना ख्वाब रक्खा है
कोई भी कीमती सी चीज़ हो संभाल लेते हैं
पूरी की पूरी गजल बहुत अच्छी है पढ़कर आनंद आया, रविंदरशर्मा जी को बहुत बहुत बधाई धन्यवाद
विमल कुमार हेडा

himani का कहना है कि -

jo log iman ki faslon par jinda hai mushkil se do vaqt ki roti daal lete hai
chote chote saral shabdon ne behad gehri baton ko bya kar diya hai
bahut khub sir

himani का कहना है कि -

jo log iman ki faslon par jinda hai mushkil se do vaqt ki roti daal lete hai
chote chote saral shabdon ne behad gehri baton ko bya kar diya hai
bahut khub sir

sumita का कहना है कि -

एक शेर की तारीफ़ करुं और दूसरी छोड दूं, तो यह बेईमानी होगी,क्योकि हर शेर मे अपनी ही कुछ बात सी लगती है. यानि उसे जी हम रहे है और आप हमारे शब्दो को पिरो रहे है....बहुत-बहुत हार्दिक बधाई रवि जी!!शैलेश जी सही कहते है कि आपकी गज़लो का हम सभी को इन्तजार रहता है.

स्वप्निल कुमार 'आतिश' का कहना है कि -

zabardast ravi ji./...behad umda..waqt ka zayza leti hui......

अपूर्व का कहना है कि -

इस ग़ज़ल से कोई एक मिसरा उठाना उतना ही मुश्किल है जितना कि इसे पढ़ने के बाद खयालों के पन्ने पलट पाना..आपकी हर ग़ज़ल ्पिछली को मात देती हुई सी होती है..कि डर लगने लगता है कि अब आगे क्या आयेगा...
खैर इस शेर की तारीफ़ किये बिना नही रह सकता
परिंदों को मोहब्बत के कफस में कैद कर लीजे
न जाने लोग उनके वास्ते क्यों जाल लेते हैं

सोचता हूँ कि अगर कभी गांधी जी गज़ल लिखते तो यह शेर उन्होने ही कहा होता...!
और मतला तो...देर तक जेहन मे बजता रहता है..आकाशवाणी की तरह!!
सलाम है आपकी कलम को!

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