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Thursday, April 22, 2010

दीपक मशाल की अधूरी जीत


मार्च माह की यूनिकवि प्रतियोगिता की ग्यारहवीं कविता सित्मबर 2009 के यूनिकवि रह चुके दीपक चौरसिया 'मशाल' की है।

पुरस्कृत कविताः अधूरी जीत

तुम्हारे सच के लेबल लगी फाइलों में रखी
झूठी अर्जियों में से एक को
एक कस्बाई नेता की दलाली के जरिये
मेरे कुछ अपने लोग
हकीकत के थोड़ा करीब ले आये

आज बोलने पड़े कई झूठ मुझे
एक सच को सच साबित करने के वास्ते
वो झूठ जो तुम्हारे ही एक
कानून के घर में सेंध लगाने वाले विशेषज्ञ ने
लिख कर दिए थे मुझे

कतई नामुमकिन नहीं
कि कुछ भी अजीब सा ना लगे इसमें तुम्हें
क्योंकि तुम्हारे लिए हो चुका है ये
दाँत मांजने जैसा
पर मेरे लिए अभी भी अजीब
या शायद बहुत अजीब ही है ये
कि मेरे सच की कमाई
एक झूठ को झूठ साबित करने में लग गई

किसी ने कहा भी तो था पीछे से
कि 'कुछ खर्च हुआ तो हुआ
पर सच जीत ही गया आखिरकार'
और आज मैं एक बिन किये अपराध का
छोटा सा अपराधी बन
मुचलके पर रिहा हो रहा हूँ
अब बस इंतज़ार है
कल के अदालती चक्करों का..

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14 कविताप्रेमियों का कहना है :

amita का कहना है कि -

कि मेरे सच की कमाई
एक झूठ को झूठ साबित करने में लग गई
bahut sunder kavita hai............
badhai

Srijan का कहना है कि -

..कुछ भी अजीब सा ना लगे इसमें तुम्हें
क्योंकि तुम्हारे लिए हो चुका है ये
दाँत मांजने जैसा
पर मेरे लिए अभी भी अजीब
या शायद बहुत अजीब ही है ये
कि मेरे सच की कमाई
एक झूठ को झूठ साबित करने में लग गई

behatareen....badhai.

दीपक 'मशाल' का कहना है कि -

इस सम्मानित वेब साईट पर स्थान देने के लिए आपका आभार..

manu का कहना है कि -

is sammaanit web site par aapkaa swaagat hai deepak .....

महफूज़ अली का कहना है कि -

अरे! शीर्षक ने मुश्किल में डाल दिया.... था.... मेरे छोटे भाई की कविता बहुत अच्छी है... और अपने सम्मानित वेबसाईट पर जगह देनें के लिए आपका आभारी हूँ.....

Jitendra Dave का कहना है कि -

Realy A Mashaal. Badhaai Ho Deepakji ko.

Podcaster का कहना है कि -

बहुत सुंदर कल फ़ुरसत से फ़िर देखूंगा

'अदा' का कहना है कि -

दीपक,
इसे यहाँ भेजने से पहले तुमने मुझे सुनाई थी इसे और मुझे बहुत बहुत बहुत पसंद आई थी...उस दिन तुम्हारी आवाज़ में सुना था मैंने आज पढ़ कर बहुत ख़ुशी हुई...बहुत बहुत बधाई तुम्हें....

M VERMA का कहना है कि -

आज बोलने पड़े कई झूठ मुझे
एक सच को सच साबित करने के वास्ते

औ फिर यही तो सच है
बधाई

विनोद कुमार पांडेय का कहना है कि -

दीपक जी ये भी बेहतरीन ..बधाई .

विमल कुमार हेडा का कहना है कि -

आज के इस युग में सच को सच साबित करने में बहुत मुश्किल आती है
दीपक जी को सुन्दर रचना के लिए बहुत बहुत बधाई धन्यवाद
विमल कुमार हेडा

sumita का कहना है कि -

कि मेरे सच की कमाई
एक झूठ को झूठ साबित करने में लग गई
deepak ji bahut-bahut badhai aapako is prabhavshali rachana ke liye.

अपूर्व का कहना है कि -

अपनी कविता मे हमारे न्यायतंत्र की विकलांगता बहुत सधे शब्दों मे अभिव्यक्त की है दीपक जी ने..अपने सच के लिये एक अंतहीन लड़ाई लड़ते इस आम इंसान की छवि हमें अपने आस-पास ही कई चेहरों मे दिखती है..और उस लड़ाई का भवितव्य भी हमसे अंजाना नही है..मगर तंत्र के खिलाफ़ न्याय के लिये लड़ता इंसान अकेला हो कर भी अकेला नही होता यही कहूँगा..और इन पंक्तियों का अंडरकरेंट ...
कि मेरे सच की कमाई
एक झूठ को झूठ साबित करने में लग गई

निःसंदेह आपकी सबसे बेहतरीन कविताओं मे से एक..

akhilesh का कहना है कि -

deepak ji

accha likha hai, aapki uni kavi wali kavita : wo roj aatnakvad ...: sambhavna.com mein meri baar baar padi jane wali rachna hai.

kaash book release function mein aapse mulakaat ho pati..

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