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Tuesday, August 11, 2009

वह अपने कुरते का सीवन नहीं छुपा पाई


प्रतियोगिता के चौथे स्थान की कविता के रचयिता पृथ्वीपाल रावत को अपने बारे में बस इतना पता है कि ये दर्द जीते हैं और दर्द पीते हैं। और जब इनकी पीर हद से गुजर जाती है तो होंठों पर आकर कविता बन जाती है। 15 अक्टूबर 1980 को अल्मोड़ा, उत्तराखंड में जन्मे पृथ्वीपाल रावत अकेला मुसाफिर नाम से कविताएँ लिखते हैं। फिलहाल गुड़गाँव में अध्यापन कर रहे हैं।

पुरस्कृत कविता- सीवन

उसके कुरते की सीवन
जो उधड़ चुकी थी उसके यौवन से
जिसे वह उँगलियों से छुपाती थी
आज और उधड़ चुकी है!
उसने जोड़ना चाहा था
एक-एक भेला
उसे सीने के लिए
पर हर बार
पेट की आग
खा जाती थी
उसकी सिलाई के पैसे
और हमेशा की तरह
वह छुपाती थी उस उधड़न को
अपनी उँगलियों से!!
पर आज
उँगलियाँ बहुत लचर हैं
बेबस हैं
उसकी उधड़न छुपाने को
उसके पेट की तरह
क्योंकि
सीवन उधड़ चुकी है
उसकी अपनी ही उँगलियों से!!

*भेला- टुकड़ा-टुकड़ा, पैसा-पैसा


प्रथम चरण मिला स्थान- चौथा


द्वितीय चरण मिला स्थान- चौथा


पुरस्कार और सम्मान- सुशील कुमार की ओर से इनके पहले कविता-संग्रह 'कितनी रात उन घावों को सहा है' की एक प्रति।

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12 कविताप्रेमियों का कहना है :

Disha का कहना है कि -

बहुत ही मार्मिक वर्णन है
बढिया रचना

Manju Gupta का कहना है कि -

मार्मिक , सुंदर रचना गरीबी को दर्शाती है .बधाई

वाणी गीत का कहना है कि -

मार्मिक रचना ..!!

विनोद कुमार पांडेय का कहना है कि -

उसके कुरते की सीवन
जो उधड़ चुकी थी उसके यौवन से
जिसे वह उँगलियों से छुपाती थी
आज और उधड़ चुकी है!

मार्मिक रचना!!!

विनोद कुमार पांडेय का कहना है कि -

पृथ्वीपाल रावत जी,
बधाई..सुंदर कविता..

वजूद का कहना है कि -

उँगलियों के चक्र,
हाथ की रेखाएं.
सब कुछ तो है उसके पास -
बस, सीवन को छुपाती है,
रेखाओं को भी छुपाती है -
सब उधड चुकी हैं.
उसकी अपनी ही उँगलियों से..!!

बहुत उम्दा रचना....अति-यथार्थवादी..

rachana का कहना है कि -

पर हर बार
पेट की आग
खा जाती थी
उसकी सिलाई के पैसे
और हमेशा की तरह
वह छुपाती थी उस उधड़न को
अपनी उँगलियों से!!
pet ki aag hoti hi kuchh asi hai
रावत जी कितना मार्मिक लिखा है
सादर
रचना

sada का कहना है कि -

मार्मिक रचना,बधाई !

Shamikh Faraz का कहना है कि -

सच्चाई को छूती हुई सुन्दर कविता

उसके कुरते की सीवन
जो उधड़ चुकी थी उसके यौवन से
जिसे वह उँगलियों से छुपाती थी
आज और उधड़ चुकी है!
उसने जोड़ना चाहा था
एक-एक भेला
उसे सीने के लिए
पर हर बार
पेट की आग
खा जाती थी
उसकी सिलाई के पैसे
और हमेशा की तरह
वह छुपाती थी उस उधड़न को
अपनी उँगलियों से!!
पर आज
उँगलियाँ बहुत लचर हैं
बेबस हैं
उसकी उधड़न छुपाने को
उसके पेट की तरह
क्योंकि
सीवन उधड़ चुकी है
उसकी अपनी ही उँगलियों से!!

akhilesh का कहना है कि -

उसकी सिलाई के पैसे
और हमेशा की तरह
वह छुपाती थी उस उधड़न को
अपनी उँगलियों से!!
पर आज
उँगलियाँ बहुत लचर हैं
बेबस हैं
उसकी उधड़न छुपाने को
उसके पेट की तरह
क्योंकि
सीवन उधड़ चुकी है
उसकी अपनी ही उँगलियों से!!

accha likha hai sahab.badhayee.

saurabh का कहना है कि -

aaj kal hamare aas pass itni vyathaye hai ki hamari lekhni hamesha kuch aisa hi chitra darshati hai. Rachna waise achhi hai aur dil ko chhu leti hai.

Saurabh

GAURAV VASHISHT का कहना है कि -

garib ki marmik dasha
ka behtreen chitran...
"nangi kya nahaye aur kya nichode"

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