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Wednesday, May 13, 2009

थोड़ा सूरज धकेल कर गिरा दो समंदर में


प्रतियोगिता की दूसरी कविता को प्रदीप वर्मा ने लिखा है। प्रदीप पिछले तीन महीने से लगातार इस प्रतियोगिता में हिस्सा ले रहे हैं।

पुरस्कृत कविता- समय की नदी

प्रदीप वर्मा की अन्य रचनाएँ

तुम हमेशा ही

प्रेम प्रतिध्वनि

समय की नदी
दिन रात किनारे
बहते पल
दिन, माह, और बरस
चढ़ता सूरज
पकती धूप
पेड़ों की छाँव में
सुस्ताते नजारे
गर्म हवा
तपती सड़क
पेड़ों की साखों से
गिरते सूखे पत्ते
सुनसान गली
उदास मकान
तरसती आँखें
बेरंग बातें
चले आओ अब तो
थोड़ा सूरज धकेल कर
गिरा दो समंदर में
खींच लाओ थोड़ा
बादल का घना आँचल
और बरसा दो
थोड़ा प्रेम
कि सूखी धरती की
आत्मा तृप्त
होना चाहती है


प्रथम चरण मिला स्थान- तीसरा


द्वितीय चरण मिला स्थान- दूसरा


पुरस्कार- अनुराग शर्मा तथा अन्य 5 कवियों के कविता-संग्रह 'पतझड़ सावन बसंत बहार' की एक प्रति।

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5 कविताप्रेमियों का कहना है :

निर्मला कपिला का कहना है कि -

बहुत ही भावमय सुन्दर रचना है बधाई

neelam का कहना है कि -

प्रकृति के साथ मानवीय भावों का खूसूरत सम्मिश्रण कविता और अच्छी हो सकती थी |
badhaai sweekaaren

रश्मि प्रभा... का कहना है कि -

बादल का घना आँचल
और बरसा दो
थोड़ा प्रेम
कि सूखी धरती की
आत्मा तृप्त
होना चाहती है......खूबसूरत एहसास

अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -

सुन्दर अभिव्यक्ति |
बहुत कुछ हाइकू से मिलाती जुलती |

बधाई|

अवनीश तिवारी

manu का कहना है कि -

अच्छा लिखा है,,,
बधाई,,,

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