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Friday, February 29, 2008

'होली' पर कविता लिखिए, चित्र बनाइए और फ़ोटो खींचिए


२८ फ़रवरी २००८ को हमने काव्य-पल्लवन का १२वाँ अंक यानी वार्षिकांक प्रकाशित किया। यह हिन्द-युग्म के लिए बहुत गौरव की बात है कि काव्य-पल्लवन के माध्यम से नये-पुराने रचनाकारों को हम एक मंच पर खड़ा कर पाये हैं। हर उम्र, हर पीढ़ी के रचनाकारों ने इस काव्य-कार्यशाला का लाभ उठाया है।

चूँकि अभी का मौसम पाल्गुन (फागुन) के रंग में रंगा है, इसलिए हम इस बार के काव्य-पल्लवन के लिए बिना पाठकों से विषय मँगाए 'होली' विषय पर काव्य-पल्लवन करवाने जा रहे हैं। होली, रंग, होलिका, फाग आदि सभी सम-अर्थी विन्यास इस विषय के अंतर्गत सम्मिलित कर रहे हैं। 'होली' शब्द की व्यापकता को समझते हुए कवि कविताएँ लिख भेजें, पेंटर सुंदर चित्र बनायें, छायाकार अपने कैमरे का ज़ादू दिखाएँ।

मार्च माह का काव्य-पल्लवन यद्यपि २७ मार्च २००८ को प्रकाशित होना चाहिए लेकिन हम इस विशेष काव्य-पल्लवन को होली के अवसर पर एक सप्ताह पहले ही यानी २० मार्च २००८ को प्रकाशित करेंगे।


सभी कलाधर्मियों से निवेदन है कि अपनी कविता, अपनी पेंटिंग व फ़ोटोग्राफ आदि kavyapallavan@gmail.com पर १९ मार्च २००८ तक भेजें।


अप्रैल २००८ से काव्य-पल्लवन को हम नये स्वरूप व नये तरीके से पेश करना चाह रहे हैं। कृपया आप अपनी सलाह भी रचनाओं के साथ भेजें (कि हमें क्या-क्या जोड़ना चाहिए, काव्य-पल्लवन को पेश करने का नायाब अंदाज़ क्या हो?)। आपको ईमेल भेजने में परेशानी हो तो यहीं 'टिप्पणी' द्वारा अपने विचार रख सकते हैं।

विश्व पुस्तक मेला २००८ के बाद हिन्द-युग्म को बहुत से नये पाठक मिले हैं, जो निम्न सूत्रों से काव्य-पल्लवन के बारे में अधिक जान सकते हैं और पुराने अंक पढ़ सकते हैं। शायद एक ही विषय पर कविताओं की लम्बी फेहरिस्त उनमें काव्यात्मक ऊर्जा भरने का काम करे।

काव्य-पल्लवन क्या है?

अंक-१
अंक-२
अंक-३
अंक-४
अंक-५
अंक-६
अंक-७
अंक-८
अंक-९
अंक-१०
अंक-११
अंक-१२

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3 कविताप्रेमियों का कहना है :

sahil का कहना है कि -

बहुत ही अच्छी बात है,खुशी हुई जानकर की इसबार सब कुछ रंग गुलालों से सराबोर होगा,कोई बात नहीं सर जी,आज तक सबने अपने घर और खेत खलिहानों में होली खेली होगी अब अपने युग्म पर......बेहतर प्रयास
आलोक सिंह "साहिल"

देवेन्द्र कुमार मिश्रा का कहना है कि -

बेर लगे गदराने, आम लगे बौराने ।
कलियाँ खिल कर फूल बनी, भँबर लगे मडराने ,।।
मौसम आसकाना, चलन लगी पुरवाई।
गूँज उठी शहनाई, रितु मिलन की आई।।
बने मीठे पकवान, गुजियों के संग ।
देख होली हुरदंग, मन उठती उमंग ।।
प्रेमरंग से रंग दे चूनर, सजना होली आई ।
गूँज उठी-----------------------------

AnanD KumAr SIngH का कहना है कि -

I also want to submit my poems on this site.
What hav i to do for this?
Mai apni kavita is site par dalna chahta hun.
Kya karun?

facebook.com/k2011anand

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