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Friday, February 29, 2008

प्रश्‍नोत्‍तर खंड 3 जब विद्यार्थी प्रश्‍न ना पूछ रहे हों तो दो बातें हो सकती है एक या तो उनको सब कुछ समझ में आ रहा है दो कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है


प्रश्‍नोत्‍तर खंड :3 अभी प्रश्‍न नहीं आ रहे हैं इसलिये हमारा प्रश्‍नोत्‍तर खंड कुछ सार्थक नहीं हो पा रहा है । मैं अपनी बात बताऊं कि मैं दो तीन कम्‍प्‍यूटर की पत्रिकाएं लेता हूं और उनमें केवल प्रश्‍नोत्‍तर वाले पृष्‍ठ ही देखता हूं क्‍योंकि वहां पर ही वो होता है जो मुझे चाहिये । खैर अभी आगे हमें हो सकता है एक समृद्ध प्रश्‍नोत्‍तर खंड मिले क्‍योंकि आगे आने वाले समय में विद्यार्थी सीख जाऐंगें ।

     नीरज गोस्वामी पंकज जी बहुत बढ़िया जानकारी. आप को सुबह सुबह       यहाँ    देख के तबियत खुश हो गयी, लगता है की गम के बादलों को चीर के आप के आँगन में सूरज निकल आया है फ़िर से. नीरज

उत्‍तर :- नीरज जी ग़म के बादल मितने ही घने हों वे सूरज को ज्‍यादा देर तक छुपा कर रख भी नहीं सकते क्‍योंकि सूरज के पास उजाला है । उजाले को कुछ देर तक ढंका जा सकता है पर हमेशा के लिये नहीं छुपाया जा सकता । आपको धन्‍यवाद

राजीव रंजन प्रसाद सुबीर जी,
श्री मोहन राय जी को युग्म-परिवार की ओर से भी विनम्र श्रद्धांजलि। संभव हो तो उसकी कुछ रचनायें युग्म के पाठकों को भी पढने का अवसर प्रदान करें।
अब शिष्यों की परीक्षा लेने का वक्त भी आ गया है...।

उत्‍तर :- आपकी संवेदनाओं के लिये आभार मैं आने वाली कक्षाओं में उनकी ही कुछ ग़ज़लों को उदाहरण के रूप में लेने का प्रयास करूंगा । और हां परीक्षाओं की तो चिन्‍ता ही मत करेंगें । मैं बहुत ही कठोर शिक्षक हूं जब परीक्षाऐं होंगी तो आपको भी पता लग ही जाएगा ।

sahil पंकज सर,बहुत ही अच्छी जानकारी दी आपने,और मोहन जी के प्रति हम श्रद्धा के फूल अर्पित करते हैं,भगवन उनकी आत्मा को शान्ति दे,
आलोक सिंह "साहिल"

उत्‍तर :- आपकी संवेदना के लिये धन्‍यवाद ।

बरबाद देहलवी बहुत बहुत शुक्रिया सुबीर जी आप युं ही जानकारी देते रहिये बहुत फ़ायदा पहुंचता है नये गज़लकारों को।
श्री मोहन राय जी को श्रद्धांजलि। भगवान उनकी आत्मा को शान्ति प्रदान करे।
उत्‍तर :- बरबाद जी मेरा ऐसा मानना है कि बिना जानकारी दिये हम केवल आलोचना ही करते रहे तो हम मूर्ख हैं । कई सारे बड़े लोग हैं जो नए लोगों की हंसी उड़ाते हैं ये कह कर कि कैसी ग़ज़ल लिख रहे हैं ये लोग । मगर वे ही बड़े लोग उन नए लोगों को सिखाने का प्रयास नहीं करते । इससे उनकी दुकानदारी पर असर जो पड़ता है । खैर मैं तो एक छोटा सा प्रयास कर रहा हूं देखते हैं कहां तक पहुचता हूं ।
tanha kavi पंकन जी,
श्री मोहन राय जी को मेरी तरफ से भी अश्रुपूर्ण एवं विनम्र श्रद्धंजलि।
आज भी आपने बहुत हीं उपयोगी जानकारियाँ दी हैं। राजीव जी की तरह मैं भी कहूँगा कि अब आप शिष्यों की परीक्षा लेनी शुरू कर दें। तब हीं तो पता चलेगा कि क्लास में विद्यार्थी सीरियस हैं कि नहीं ।
-विश्व दीपक ’तन्हा’
उत्‍त्‍र :- आपकी संवेदनाओं के लिये धनयवाद । परीक्षाएं भी बाकायदा शुरू होंगी हीं लेकिन पहले हम एक अध्‍याय तो समाप्‍त कर लें काफिये का । अभी अधूरी हालत में परीक्षा लेना ठीक नहीं है क्‍योंकि अभी तो ज्ञान पूरा नहीं है । बस संभवत: एक कक्षा और है काफिये की उसके बाद तो परीक्षाओं का लम्‍बा दौर चलना है ।
mehek मोहन जी को हमारी तरफ़ से भी श्रद्धा सुमन अर्पित,काफिये की जानकारी के लिए शुक्रिया

उत्‍तर :-  संवेदनाओं के लिये आभार । काफिये की जानकारी आपको अच्‍छी लगी उसके लिये भी ।

hemjyotsanaसुन कर अफ़सोस हुआ । हमारी तरफ़ से भी श्रद्धा सुमन अर्पित हैं ।
अब आगे क्या पढाने वाले सर जी ?
उत्‍तर :- आगे क्‍या पढ़ाने वाले हैं ये जानने की उत्‍सुकता मत रखें तैयारी करें अभी जो पढ़ाया जा रहा है उसकी क्‍योंकि उस पर परीक्षाएं होने वाली हैं जो फेल होगा उसको आगे की कक्षा में बैठने की पात्रता नहीं होगी ।
सजीव सारथी सचमुच काफिये की गलतियाँ बहुत होती है, आपने सब कुछ इतनी बारीकी से समझाया है कि, पुराना लिखा हुआ सब ख़राब लगने लगा है, हाँ अच्छी बात यह है कि आगे जो लिखेंगे इसमे और शुद्धता आएगी,

उत्‍तर :- आपने आज जो बात लिखी है वह वही बात है जो मेरे उस्‍ताद कहा करते हैं । वे कहते हैं कि जब अपना पुराना लिखा हुआ खराब लगने लगे तो समझ लो कि आपकी कलम में निखार आ रहा है । और यदि ऐसा नहीं हो रहा है तो समझ लो कि सीखने की प्रक्रिया ठीक नहीं चल रही है । आपको ऐसा लग रहा है तो ये शुभ संकेत है । मैंने शायद किसी कक्षा में बताया था कि मैंने अपनी ग़ज़ल की चार डायरियां फाड़ दी थी ।

RAVI KANT अब काफिया तो कम से कम सुधर ही जायेगा।

उत्‍तर :- केवल काफिया नहीं हमें तो सब कुछ सुधारना है हम हिन्‍द युग्‍म के इस मंच पर एक नया इतिहास रचने निकले हैं । हिंदी और उर्दू में लिखी जाने वाली ग़ज़लों को व्‍याकरण के दोष से मुक्‍त कर नए आसमान तक पहुंचाने के लिये ।


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5 कविताप्रेमियों का कहना है :

मृत्युंजय का कहना है कि -

क्या मेरी कोशिश
ठीक है -
दिल के जख्मों को आज बयाँ होने दो
इन आसुओं को आज जुबाँ होने दो |
चले आओ किसी परवाज़ के लिए ,
मेरे बाजुओ को आसमां होने दो |
- मृत्युन्जय यकरंग

Yogi का कहना है कि -

गुरूजी आप वर्ड वेरिफिकेशन तो रखें हि, इस से स्पैम कमेंट्स में भारी कमी आएगी
क्यो की बहुत से स्पैम कमेंट्स भी आने लगे हैं..
धन्यवाद

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