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Thursday, November 29, 2007

25 कवियों ने पहने मुखौटे







काव्य-पल्लवन सामूहिक कविता-लेखन




विषय - मुखौटे

विषय-चयन - श्रवण सिंह

पेंटिंग - स्मिता तिवारी

अंक - नौ

माह - नवम्बर 2007





"मुखौटा" बच्चों के लिये एक खेल का साधन परन्तु जैसे जैसे आयु बढती है और जीवन में व्यवहारिकता आने लगती है वैसे वैसे मनुष्य का चरित्र सहज न रह कर मुखौटों का मोहताज हो जाता है.. बात बात पर एक नया चेहरा. सभी रचनाकारों ने अपने विचारों को कविता में ढाल कर श्रोताओं के लिये परोसा है.. आशा है आप सब को पसन्द आयेगा और आपकी प्रतिक्रियायें हमें प्राप्त होंगी.

इस बार का विषय श्री श्रवण सिंह द्वारा सुझाया गया एवम् इस विषय पर काव्यपल्लवन के लिये कुल 25 रचनायें प्राप्त हुईं. एक रचनाकार ने अपना नाम नहीं दिया. सभी रचनाकारों से अनुरोध है कि काव्य-पल्लवन के लिये आप जो भी रचनायें भेजना चाहते हैं उन्हें सिर्फ़ kavyapallavan@gmail.com पर ही भेजें जिससे उनका प्रकाशन सुनिश्चित किया जा सके. अन्य पते पर भेजी गई रचनायें प्रकाशन के दौरान छूट सकती हैं. साथ ही सुनिश्च्चित करें कि आपने अपना नाम भी रचना के साथ दिया है. कई बार ईमेल किसी और आई डी से होती है और रचनाकार का नाम भिन्न होता है वहां भी भ्रम की स्थिति हो जाती है. बहुत सी रचनायें निर्धारित तिथि के काफ़ी देर बाद प्राप्त होती हैं एंव प्रकाशन के दौरान छूट सकती है इसलिये यथासम्भव अपनी रचनायें समय से भेजने का कष्ट करें.



*** प्रतिभागी ***
| शोभा महेन्द्रू | आलौक कुमार सिंह "साहिल" | सुजीत कुमार सुमन | सौमेश्वर पांडेया | रंजना भाटिया |
| श्रीकान्त मिश्र 'कान्त' | शैलेश जमलोकी | देव मेहरा | प्रगति सक्सैना | सजीव सारथी | हरिहर झा |
| मोहिन्दर कुमार | विश्व दीपक 'तन्हा' | अनुराधा श्रीवास्तव | साधना दुग्गड | रविकांत पाण्डेय |
| सतीश वाघमारे | अवनीश तिवारी | निखिल आनंद गिरि | प्रो सी॑ बी श्रीवास्तव विदग्ध |
| बी राघव | महेश चंद्र गुप्त 'ख़लिश' | अवनीन्द्र विनोद | अभिषेक पाटनी | डॉ. नंदन |

~~~अपने विचार, अपनी टिप्पणी दीजिए~~~





दुनिया के बाजार में
जहाँ कहीं भी जाओगे
हर तरफ, हर किसी को
मुखौटे में ही पाओगे ।
यहाँ खुले आम मुखौटे बिकते हैं
और इन्हीं को पहन कर
सब कितने अच्छे लगते हैं

विश्वास नहीं होता --?
आओ मिलवाऊँ
ये तुम्हारा पुत्र है
नितान्त शरीफ, आज्ञाकारी
मातृ-पितृ भक्त
हो गये ना तृप्त ?
लो मैने इसका
मुखौटा उतार दिया

अरे भागते क्यों हो--
ये आँखें क्यों हैं लाल
क्या दिख गया इनमें
सुअर का बाल ?

आओ मिलो -
ये तुम्हारी पत्नी है
लगती है ना अपनी ?
प्यारी सी, भोली सी,
पतिव्रता नारी है पर-
मुखौटे के पीछे की छवि
भी कभी निहारी है ?

ये तुम्हारा मित्र है
परम प्रिय
गले लगाता है तो
दिल बाग-बाग
हो जाता है
क्या तुम्हें पता है
घर में सेंध वही लगाता है
ये तो दोस्ती का मुखौटा है
जो प्यार टपकाता है
और दोस्तों को भरमाता है

मुखौटे और भी हैं
जो हम सब
समय और आवश्यकता
के अनुरूप पहन लेते हैं
इनके बिना सूरत
बहुत कुरूप सी लगती है

मुखौटा तुमने भी पहना है
और मैने भी
सच तुम्हें भी पता है
और मुझे भी
फिर शिकायत व्यर्थ है
जो है और जो हो रहा है
उसके मात्र साक्षी बन जाओ
मुखौटे में छिपी घृणा, ईर्ष्या
को मत देखो
बस---
प्यारी मीठी- मीठी बातों का
लुत्फ उठाओ ।

- शोभा महेन्द्रू




देखा पहली बार मुखौटा
सत्ता के गलियारे में
लगा हुआ था यही मुखौटा
भारत के बंटवारे में
कुछ को हिन्दू
कुछ को मुसलिम
कुछ को अंग्रेज़ बनाया था
मानव का था एक ही चेहरा
दस इसने करवाया था.

अब भी मिल जाते हैं मुखौटे
जब भी गौर लगा देखो
चमड़ी के सा बन बैठा है
चाहे इसे हटा देखो
यहाँ मुखौटा, वहाँ मुखौटा
सभी वशीभूत मुखौटे के
सर्वव्यापत है यही मुखौटा
नहीं तरीके बचने के

कभी बाबरी, कभी अयोध्या
ये हैं रूप मुखौटे के
इसी मुखौटे ने उड़वाये
मानवता के परखचे
चाहे अक्षरधाम
गौधरा किसने दंश नहीं झेले
इसने दिये हैं कष्ट हमें सब
फ़िर भी प्यारे हमको यह

सेतूसमुन्दरम अमरनाथ या फ़िर
हो मुद्दा नंदी का
हो ये निठारी या कांची
है ये सब खेल मुखौटे का

हाये ये मुखौटा, उफ़ ये मुखौटा
छोडो जी भी अब ये मुखौटा
सब कष्टों का कारक है
एक निगोड़ा यही मुखौटा.

- आलौक कुमार सिंह "साहिल"




चेहरों को पढ़ने का
आता है हुनर हमें
आप लाख मुखौटे
बदल लीजिये

आपकी आंखें ही हैं
दुश्मन बनी
अपनी आंखों से ही
संभल लीजिये

ये माना है मुश्किल
उल्फ़त की राहें
कदम दो कदम साथ
चल लीजिये

हैं मगरूर आप ये
माना मगर
मोम बनके कभी तो
पिघल लीजिये

है तड़पाना आसान
जग में किसी को
सोच के अपने नेह का
कमाल कीजिये

दिल आईना है यूं तो
सुमन का
देख के इसमे खुद ही
संवर लीजिये

- सुजीत कुमार सुमन




ऐ मुखौटे वाले मुझको ऐसे-इतने मुखौटे तू दे दे |
जिन्हें पहनने के बाद कोई हिंदू-सिख या मुसलमान न रहे |
ताकि कहीं-कोई मजहबी झगड़ा-फसाद या जेहाद न रहे |
क्योंकि मुखोटे वाले मैं उस शहर की कल्पना में हूँ,
जहाँ हर कोई खुश है - सानंद है और
चारों ओर रंगे - अमन है और खुशहाली ही खुशहाली है |
सब के चेहरे हैं चमकते हुए - मानों सितारे दमकते हुए |
झोली में सब सुख ही सुख, ग़मों की ख़ुद बदहाली है|
ऐ मुखौटे वाले मुझको ऐसे-इतने मुखौटे तू दे दे |
कि जिन्हें पहनने के बाद कोई हिंदू-सिख या मुसलमान न रहे |

- सौमेश्वर पांडेया




एक चेहरे पर और चेहरा क्यों सजाए
जो कर गुज़रना है हम क्यों ना कर जाए

कम नही है हम किसी बात से अब यह जान लो
फिर क्यों अबला का मुखौटा ख़ुद को पहनाये

दिल में भरा है जब एक झरना प्यार का
क्यों वक़्त की आँधियों से हम डगमगाए

मत समझो हमको नाज़ुक कली सा तुम
अपनी बुद्धि से अब हम सितारों को भी छू आए

क्यों छिपाये ख़ुद को हर वक़्त पर्दे में हम
अब जो हैं हम बस वही चेहरा सबको दिखाए

मुखोटा लगाए राम के भेष में छिपा है रावण
अपनी हिम्मत से ही आज ख़ुद को हम बचाए

- रंजना भाटिया




घण्टनाद ..
शंखध्वनि.. आरती
एक कतार
दो कतार….
११०१ की कतार..
११००१ की कतार
विशिष्ट कतार….
वी वी आई पी कतार
एक कुण्ड ….
दो .. तीन….
…. एक्कीसवां कुण्ड
गीले वस्त्र
गर्भगृह परिक्रमा
विग्रह दर्शन
धक्कामुक्की
रेलमपेला….
पंक्तिबद्ध यौवन
नयनबन्द …
सम्पूर्ण समर्पण
टटोलती दृष्टि,
परम्परागत पुजारी
हुंह …. !
एक मुखौटा

अजान
एक शोर
फिर कतार
वजू तकरीर
हंसते चेहरे
नये कपड़े
रंगबिरंगी टोपी
खिलखिलाते बच्चे
सेवैयां
ईदी और बच्चियां
गले मिलते लोग
हंसी खुशी,
और बस …
एक विस्फोट
हाहाकार …
बिखरा खून
चीथड़े अंग
कौम खतरे में, जिहाद
आह… !
फिर एक मुखौटा

नीरव .. शान्ति
गूंज घण्टे की
सेवा.. प्रेम सन्देश
भाईचारा.. श्वेत वस्त्र
कन्फेशन …
प्रभु लेता है …
सारे पाप अपने ऊपर
और तुम पापमुक्त ..
भावनात्मक शोषण,
फिर एक नया पाप
झूलता पालना .. धर्मप्रसार
यह भी …. !
बस एक मुखौटा

मुखौटे अभी और भी हैं
मुखौटे ही मुखौटे …
इन्हें उतारने के प्रयास में
स्वयं को पहचानने के प्रयास में
हां नोंचने लगा हूं
मैं अपना चेहरा,

- श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'




राज को बस राज रखे, वो मुखौटा चेहरे का|
देखने का नजरिया बदल दे, वो मुखौटा चेहरे का

अभी इसके हैं, किसी और के न हो जाएं
वेशभूषा से बदलते, वो मुखौटा चेहरे का

समय के रंगो को भी, हमने बदलते देखा है
हजारो बदलते है पल मै, वो मुखौटा चेहरे का

सारे स्वार्थ सिद्ध उसके, कर जो पाए बार बार
पहन लेता है ये इंसान, वो मुखौटा चेहरे का

ये दिखावा जैसा होगा, सोच भी कर देगा वैसी
तर्क एक से बढकर दिलाये, वो मुखौटा चेहरे का

- शैलेश जमलोकी




जहाँ भी देखता हूँ
एक अनचाही हँसी
किसी खोटे सिक्के की
खोखली चमक लगती है!

हमारा ही अंहकार
सच का प्रतिकार
रोज़ करता है;
परन्तु,
हमें मुखौटे पहनने की
आदत पड़ गई है!

सच तो यह है
मध्यमवर्गीय ही नहीं
सम्पन्नता की चमक भी
कई तरह क रंगों में
मुखौटे पहने है!

हम सब
एक-दूसरे को जानते हैं
पहचानते हैं मुखौटों को
कहने का सहस कौन जुटाए?
कौन सच माने!
क्योंकि
हम सब मिलकर
मुखौटों को पहने हैं!

बेबाक बात कहने का
साहस नहीं
जीना हम जानते नहीं
यही सोच कर हम
मुखौटे रोज़ बदलते हैं

- देव मेहरा




मुझे याद है अपना वह सफर
जिसमें वो हमसफ़र मुझे मिला था..
बस के उस शोर और भीड़-भाड़ में भी
दिल को किसी दिल से संकेत मिला था ..

मैंने अपने बारे में बेहिचक बताया,
जब उसने मेरा नाम पूछा था..
सुना जब , हंस के यह कहा की
अरे ! मैंने तो ज़िंदगी सोचा था ..

मैंने भी उससे परिचय माँगा था
वह जाने क्यों मुकरने लगा था
मेरे खफा होने पर फिर
मुझे देख मुस्कुराने लगा था ..?

बातचीत का सिलसिला ऐसा शुरू हुआ
मुझे वह सफर मंजिल सा लगने लगा
हम एक दूसरे से कितना मिलते थे .
उससे आँखें हटाना मुश्किल सा लगने लगा

कितना जादू था उसकी बातों में ..
और तहजीब ऐसी जो सबको लुभा रही थी
मैं उसके बगल मैं बैठी
अपनी किस्मत पे इतरा रही थी ..

एक रोते बच्चे को उसने गोद में बैठाया
हर एक कोशिश कर उसको शांत कराया
खांसते हुए एक बाबा को अपनी बोतल से
सारा पानी पिला कितना पुण्य कमाया ..

बस जैसे जैसे चलती जा रही थी
मैं उस अनजाने की होती जा रही थी
एक फ़ैसला मन में कुछ कर लिया था
किसी जज्बे की हिमायती हुयी जा रही थी

मेरा सफर अब खत्म हो चुका था ..
उतरी इस खयाल से की ज़रूर
पीछे से कोई आवाज़ आएगी ..
पता चाहता हूँ आपका ..कहेगा ,
..कि मुझे आपकी याद बहुत आएगी

मेरा अंदाजा ग़लत था ..
मैं थकी चाल से चलने लगी थी
धूल उड़ा कर मेरे चेहरे पे
वह बस अब बोझिल होने लगी थी

रात उसी के ख्यालों में बीती
आँखें सुबह उठी तो गीली थी
उसका चेहरा याद आ रहा था ..
दिल उसकी तरफ़ भागा जा रहा था .

फिर एक ख़बर पढ़ी
अखबार पर जब नज़र पढ़ी
कल एक बस में विस्फोट हुआ
मेरी आखों में जैसे अँधेरा छाया !
कल बैठे कई मित्र बने थे
आज .. सब खत्म हो चुके थे

हुलिया जो उसका उस कागज़ पे ज़िक्र हुआ था
यही जाना कि मेरा शख्स एक ' मानव -बम ' था
ले गया अपने संग कितने प्राणों को ..
अब जाना .. क्यों मुझे ज़िंदगी पुकारा था ..

उसने अपना यह बदनुमा और ज़ुल्मी पहलू
मेरी नज़रों से किस तरह बचा रखा था
मैं आज मातम करूं तो कैसे उन बिखरे फूलों पर ..
कि ..मैंने तो उस मुखौटे से प्यार किया था ...

बच के रहिएगा आप भी ऐसे किसी मुखौटे से
जो संग चले आपके .. पर मकसद एक न हों ..
आपके ज़हन पर छा जाए एक बादल कि तरह
पर उसके मनसूबे और इरादे नेक ना हों ..

आप भी न वह पछतावा करें जो मैंने कभी किया था ..
जुबान से न कभी यह निकले
कि ..मैंने तो उस मुखौटे से प्यार किया था ...

- प्रगति सक्सैना




पहचान लेता है चेहरे में, छुपा चेहरा, मुखौटा,
मुश्तैद है, तपाक से बदल देता है चेहरा, मुखौटा।

कहकहों में छुपा लेता है, अश्कों का समुन्दर,
होशियार है, ढांप देता है सच का चेहरा, मुखौटा।

बड़े-छोटे लोगों से, मिलने के आदाब जुदा होते हैं,
समझता है खूब, वक्त-ओ-हालात का चेहरा, मुखौटा।

देखता है क्यों हैरान होकर, आइना मुझे रोज,
ढूँढ़ता है, मुखौटों के शहर में एक चेहरा, मुखौटा।

- सजीव सारथी




नादान बच्चे
पहन कर मुखौटा
डराते फिरते है
नहीं जानते वे
उनके डराने की प्रवृत्ति भी
एक तरह से भीतर का घमंड है
वे मेरी तरह विनम्र होना नहीं जानते
अब मुझे ही देखिये
मैं एक आदर्श पिता
आदर्श पति और पुत्र
मेरे भीतर कुछ बाहर कुछ
ऐसा कभी नहीं होता
क्योंकि मैं मुखौटों को
हाथ नहीं लगाता
मैं तो सुक्ष्म स्तर पर भी
मुखौटों के विरूद्ध हूं
इतना कि
विचार स्वतंत्रता की ऐसी ध्वजा फहराता
कि बिल्कुल पूर्वाग्रह से मुक्त हो कर
बनता हूं कभी संघी
कभी कम्यूनिस्ट के साथ
भले ही फायदा देख कर ;
चल जाता इसलिये
अपना सिक्का खोटा नहीं
और मेरे विचार कोई मुखौटा नहीं
इस मुखौटे से बँधा मेरे पीछे कोई
धागा नहीं
और चमड़ी के भीतर मैंने
ट्रांसप्लांट करवाया एक मुखौटा
और उसके ऊपर दूसरा
बुरी तरह
चिपक गया हो पड़े-पड़े
ऐसा भी नहीं
क्यों कि उसे बदलना हो तो झंझट
बैठे बिठाये ;
नहीं, मुझे सख्त नफरत है
मुखौटों से
दूर बैठे नादान बच्चे
न जाने
क्यों खेलते हैं
मुखौटों से ।

- हरिहर झा




डार्विन का "विकास सिद्धान्त" बतलाता है
जो शारीरिक बदलाव जीवन के लिये
महत्वपूर्ण व आवश्यक हैं
उन्हें प्रकृति द्वारा
आने वाली नसलों के लिये
अपने आप सहेजा जाता है
शायद ये "मुखौटा"
मैंने अपने पूर्वजों से पाया है
क्योंकि इसे मैने स्वंय नहीं बनाया है

जैसे सर्दी के लिये रजाई लिहाफ़
मैले तकिये के लिये साफ़ गिलाफ़
साधारण चेहरे को उत्कर्ष बनाते प्रसाधन
बुराइयों को छुपाते बल और धन
क्या हुआ अगर ओढ़ लेता हूं "मुखौटा"
यदा कदा मैं भी
अनजाने लोगों का प्यार सत्कार
अपनों के दिल में उठती दीवार
और गले मिल भोंकते जो कटार
उन सब के दिलों का मर्म जानने के लिये
क्या है ऐसे में मेरा धर्म जानने के लिये


जैसे को तैसा
या
नेकी कर कुएँ में डाल
निर्णय करने में
मुखौटा बड़ा काम आता है
अपनी छुपा कर
औरों के दिल की थाह पाता है...
इसीलिये इसे छोड़ नहीं पाता हूं
कुछ पाने की चाह का मूल्य
अपनी पहचान गंवा कर चुकाता हूं
हां, यदा-कदा मैं भी मुखौटा लगाता हूं

- मोहिन्दर कुमार




उसने दशहरे के मेले में रावण का मुखौटा खरीदा......राम के तीर-कमान खरीदे.... और अच्छाई पर बुराई की विजय करा दी.....राम फिर से विजयी हुए, रावण फिर से मारा गया...... लेकिन इस बार रावण की नहीं एक मुखौटे की मौत हुई थी। उसने उस मुखौटे को मार दिया था, जिसने उसे जीते जी मारा था। उसकी दास्तां उसी के शब्दों में---

मेरा दोस्त, मेरा हमदम,
मुझसे जब खेलता था।
मुझे आईना बना कर,
आँसू उड़ेलता था॥

पत्थर पर चीड़ा देकर,
एक मुश्त लूटता था।
अश्को को बीड़ा देकर-
कई पुश्त लूटता था॥

फिर दर्द दबा देता,
इतनी हीं दवा देता।
थोड़े आग डाल देता,
थोड़ी-सी हवा देता॥

कुछ दिनों मे......

आसमां से लुढ़का
एक टूटा ख्वाब मैं था।
अश्कों में डूबता
एक आफताब मैं था॥

फिर एक दिन......

कुहरे हटा कर मैंने
जब उसकी ओर देखा।
बदली हुई निगाहें,
बदला हर एक ठौर देखा॥

कुरबत में मेरे हँसता
एक बहुरूपिया खड़ा था,
अश्कों का चूना लेकर
चेहरे-सा बन पड़ा था।

वह सच था, झूठ था या
था मैं हीं एक खोटा!
पर, लुट गया वो मैं था,
जो जीता वो मुखौटा!!

उस दिन वह लुट गया था। पर आज उसने मुखौटे से बदला ले लिया था।
लोग कहते हैं कि उस दिन उसने आत्म-हत्या कर ली..... नज़र-नज़र का फेर है।


- विश्व दीपक 'तन्हा'




मुखौटे जब सरक जाते हैं,
तो असली चेहरे सामने आ ही जाते है
कल नेता जी ने आम सभा में बडी-बडी बातें बनायी
अपने जनसेवक होने की दुहाई भी दी
घर आते ही अपने सेवक को
हरामी की उपाधि से नवाजा
लतियाया,गरियाया
अगले दिन नारी-शाला में नारियों के दुखों में
शरीक होने का विश्वास दिलाया
कई महत्वपूर्ण योजानाओं पर बात भी करी-
कई फोटो भी खिचवायें
रात उन्हीं में से एक को चर्चा करवाने बुलवाया
दिन में घर आते ही बहू के घर
दहेज कम देने का उलहाना भिजवाया
ये नेता कम अभिनेता ज्यादा हैं-
वक्त के साथ मुखौटे बदलते हैं
तरह-तरह के रुप धर कर लोगों को ठगते हैं।
जनता बेचारी हर बार झांसे में आती है
"कुछ तो बदलेगा "
मन ही मन खुद को समझाती है
नित नये आश्वासान , नित नये ख्वाब
ख्वाबों के टूटने की घनीभूत होती पीडा
बस बहुत हो चुका-
अब और नहीं
-खुद को सक्षम बनाना है
अरमानों के बीज हकीकत की ज़मीं पर लहलहाये
आओ कुछ ऐसा कर दिखायें
कुछ और नये मुखौटे चस्पां होने से पहले हटा दें

- अनुराधा श्रीवास्तव




वे दिन भी क्या दिन थे
जब चारों ओर खुशहाली थी
भोले-भाले लोग यहॉ पर
सुख-दुख के सब साथी थे
मेहमाँ हमारे होते भगवान
संयुक्त परिवार में हम रहते थे
त्यौहार इस तरह मनाते
हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई
सब को गले लगाते थे
तरह-तरह के पहन मुखौटे
राम लीला रास लीला रचाते
लोगों को खूब हँसाते थे

वो दिन भी क्या दिन थे
जब शेर और बकरी यहाँ पर
एक घाट पर पानी पीते थे
बड़े मजे से हम जीते थे
चैन की नीद हम सोते थे
अब तो सब लगता सपना है
लगता नहीं कोई अपना है
रंग बदलती इस दुनिया में
सब कुछ इतना बदल गया है
सबने पहन रखा मुखौटा है
चेहरे पर नहीं कोई मुखौटा
चेहरा ही एक मुखौटा है

जब तक ढँका
तभी तक अच्छा
तभी तक इंसा रहता है
खुल जाने पर यही मुखौटा
बयाँ बहुत कुछ करता है
हँसने हँसाने वाला यही मुखौटा
दानवीर धर्मवीर देशभक्त
कहलाने वाला यही मुखौटा
सब को चारो खाने
चित कर देता है
बस धोखा ही धोखा है
सबका कारण यही मुखौटा है

आज तो आपको
जिधर भी नज़र डालेंगे
बहरूपिये ही बहरूपिये ही
नजर आयेंगें
इस कलयुग में
अब शायद ही
मानव नज़र आयेंगे

- साधना दुग्गड




सजल आँखें...
चेहरे पर संताप..
वो टूटे-फूटे शब्दों में
कोशिश करती है कुछ कहने की.....
मैं पास पहुँचता हूँ...
कानों में उतरती है
वो दर्द भरी आवाज़...
मैं धरती हूँ..अखंड धरती...
कुछ विक्षिप्त तोड़ना चाहते हैं मुझे...
थोप रहे हैं वे कुछ मुखौटे....
अलग-अलग कौम के...मजहब के..
दम घुटता है मेरा.....
नींद खुलती है
और दोस्त मुझे समझाते हैं
कि सपने सच नहीं होते.....

- रविकांत पाण्डेय




आपके विषय में नहीं जानता,
पर मेरे पास हैं बहुत से
सालों से हूँ इन्हें पहनता
ये हो गए हैं अब अपने से

जब से होश सम्हाला है,
इन्हीं के बलपर गुजारा है
जब भी दुविधा में पैर डाला है
इसी सुविधा का सहारा है !

रोज इन्हें साथ ले निकलता हूँ,
जाने कब कौन काम आए !
समय परख के ओढ़ता हूँ,
जिससे भी काम बन जाए.

झाँक भीतर आजकल मैं
पानी है जहाँ बहुत गेहरा
अपने ही मुखौटों की भीड़ में,
खोजूँ अपना असली चेहेरा

इनके प्रयोग में हूँ माहिर,
भई, बरसों की तपस्या है,
न हो जाऊं खुद से ही जाहिर
बस, यही इक समस्या है !


- सतीश वाघमारे




रोज सवेरे अपने चहरे पर वह ,
मुखौटा चढ़ाता हूँ,
और इस अनोखी दुनिया में जीने के लिए,
अपने कदम बढ़ाता हूँ,
तरह-तरह के अभिनय कर,
अपना काम बनाता हूँ,
ले सहारा ईमानदारी - बेमानी का,
झूठा स्वांग रचाता हूँ,
मुखौटे के आड़ मे अपने-पराये का,
भेद नहीं मैं कर पाता हूँ,
जब-जहाँ-जैसे भी हो बस,
स्वार्थ सिद्ध करते जाता हूँ,
लौट शाम जब घर अपने,
मुखौटा वह गिराता हूँ,
दूर फ़ेंक उस मुखौटे को,
अपने पर हंसते पाता हूँ,
जीवन-विवशता की सच्चाई का,
ये अनचाहा फल है,
कल कैसे मुखौटा न चढाउ ,
क्या इसका कोई हल है ?

- अवनीश तिवारी




कौड़ियों के भाव बिका, जब से अंतःकरण,
अनगिन मुखौटे हैं, सैकड़ों हैं आवरण...
मदमस्त होकर जो झूमती हैं पीढियां,
लड़खड़ा न जाएँ कहीं सभ्यताओं के चरण...
ठिठका-सा चाँद है, गुम भी, खामोश भी,
जुगनुओं को रात ने दी है जब से शरण...
गुमशुदा-सा फिरता हूँ, अपनों के शहर में,
आइनों ने कर लिया, मेरा ही अपहरण....
मौन की देहरी जब तुमने भी लाँघ दी,
टूट गए रिश्तों के सारे समीकरण...
पीड़ा के शब्द-शब्द मीत को समर्पित हों,
आंसुओं की लय में हो, गुंजित जीवन-मरण...
माँ ने तो सिखलाया जीने का ककहरा,
दुनिया से सीखे हैं, नित नए व्याकरण...

- निखिल आनंद गिरि




नया युग है , पुराने का हो गया अवसान है !
मुखौटों का चलन है हर साध्य अब आसान है !!

बात के पक्के व निज सिद्धांत के सच्चे हैं कम !
क्या पता क्यों , आदमी ने खो दिया ईमान है !!

बदलता रहता मुखौटे , कई सुबह से शाम तक !
जानकर भी यह कि वह दो दिनों का मेहमान है !!

कपडों से चेहरे औ" बातें भी , बदल लेते हैं कई !
समझते हैं कि शायद, इससे ,उनको मिलता मान है !!

आये दिन उदण्डता , औ" चमक बढ़ती जा रही !
सद्‌गुणों से आदमी की , अब कहाँ पहचान है ?

सजावट है, दिखावट है , मिलावट है हर जगह !
शुद्ध सात्विक भाव का, मिलता न कोई सामान है !!

खरा सोना और सच्चे रत्न अब मिलते नहीं !
असली से ज्यादा , नकली ,माल का सम्मान है !!

ढ़ोंग , आडम्बर , दिखावे नित पुरस्कृत हो रहे !
तिरस्कृत , आहत ,निरादृत अब गुणी इंसान है !!

योग्यता और सद्‌गुणों की, अब परख होती नहीं !
मुखौटों से , आदमी की हो रही पहचान है !!

जिसके हैं जितने मुखौटे ,वह है उतना ही बड़ा !
मुखौटे जो रहता बदलता ,वह बना भगवान है !!

है "विदग्ध" समय की खूबी ,बुद्धि गई बीमार हो ,
पा रहे शैतान आदर , मुखौटों का मान है !!

- प्रो. सी॑ बी श्रीवास्तव विदग्ध




खबर सबको है पर,
नजर सबको है पर,
न जाने चले क्यूँ इन आखों को मीचे..
ये चेहरे बदलते हैं वोटों के पीछे
मुँहू खोटों की दुनिया मुखौटों के पीछे
मुँहूँ खोटों की दुनिया.........

छवि राम की में, छुपा वो दशानन
लगा कंस कृत्यों में, कृष्णा का आनन
दान के नाम पर हो रहा है गवन तो
कहीं पल्लवित कंटकों का चमन तो
कहीं गूदड़ों में दबे हैं गलीचे....
ये चेहरे बदलते हैं वोटों के पीछे
मुँहू खोटों की दुनिया मुखौटों के पीछे
मुँहूँ खोटों की दुनिया.........

गिराते हैं जो, उठाने के बहाने
भरोसे का चोला, पहना दगा ने
लो दंगा मिटाने को चलती कटारें
उजड़ते चमन की सियासी बहारें
फरेबी हँसी जबरन होठों को खींचे
ये चेहरे बदलते हैं वोटों के पीछे
मुँहू खोटों की दुनिया मुखौटों के पीछे
मुँहूँ खोटों की दुनिया.........

लायक नहीं कोई नायक यहाँ का
ये करते हैं सौदा खुद अपने जहाँ का
शिक्षाविदों की भी शिक्षा सही है
वेश्या सही है और भिक्षा सही है
कुर्सी के उपर पर मेजों के नीचे
ये चेहरे बदलते हैं वोटों के पीछे
मुँहू खोटों की दुनिया मुखौटों के पीछे
मुँहूँ खोटों की दुनिया.........

गरीबों की ईँटें तिजोरी में सजतीं
अबला की पायल नुच-नुच के बजतीं
खादी की जेबों को भरने के आदी
कानून का क्या, कलम जब घुमा दी
भले कोई भी हो बस नोटों से सींचे
ये चेहरे बदलते हैं वोटों के पीछे
मुँहू खोटों की दुनिया मुखौटों के पीछे
मुँहूँ खोटों की दुनिया.........

खुद अपनी अस्मत तो गिरवी रखे हैं
बची भी नहीं शेष, फिरभी रखे हैं
'राघव' गिनाकर कहे क्या किसी से
मुखौटे भी हैरान, खुद बेबसी से
अनर्थों का अम्बार स्वार्थों के पीछे
ये चेहरे बदलते हैं वोटों के पीछे
मुँहू खोटों की दुनिया मुखौटों के पीछे
खबर सबको है पर,
नजर सबको है पर,
न जाने चले क्यूँ इन आखों को मीचे..
ये चेहरे बदलते हैं वोटों के पीछे
मुँहू खोटों की दुनिया मुखौटों के पीछे
मुँहूँ खोटों की दुनिया.........

बी राघव




मैं क्या हूं मुझ को पता नहीं नित नये रूप मैं धरता हूँ
हर रोज़ नया मुखड़ा रंग कर मैं स्वांग नया नित करता हूं
मैं केवल एक मुखौटा हूं


दुनिया की आपा-धापी में खुद अपना आपा भूल गया
कोई मुझ को दे कर फूल गया, कोई मुझ को दे कर शूल गया
मेरा वज़ूद न ठुकरा दो मैं इसी बात से डरता हूं
मैं विजय-पराजय दोनों को स्वीकार सहज ही करता हूं
मैं केवल एक मुखौटा हूं


मैं देही हूं पर देह समझ खुद से ही अनजाना रहता
गर्मी-सर्दी, जल-वायु का नाहक प्रकोप मैं हूं सहता
देह का अस्तित्व नहीं कोई, लेता हूं जन्म और मरता हूं
जो समा रहा है कण-कण में बस ध्यान उसी का करता हूं
मैं केवल एक मुखौटा हूं

मुझ से गलती हो जाये तो तुम बैर नहीं करना मुझ से
इंसां हूं पैर फिसल जाये तो घृणा नहीं करना मुझ से
दुख देता हूं मैं और कभी औरों के दुखड़े हरता हूं
जैसे-तैसे इस दुनिया में मैं जीवन-यापन करता हूं
मैं केवल एक मुखौटा हूं.

- महेश चंद्र गुप्त 'ख़लिश'




अपहरण करता है
रिश्ते का भाई बनकर
मुखौटा,
बहन का चीरहरण करता है
मुखौटा,
दुष्कृत्य के बाद
उतर जाता है
जो भी वादा करता है
साफ-साफ मुकर जाता है ।
प्रेमी के मुखौटे ने
यहाँ जुल्म ढाया है,
मधुमिता, कविता और शशि ने
मुखौटों पर विश्वास का
फल पाया है,
अपना सब
कुछ गंवाया है
कहीं मुखौटा,
देशभक्त बनकर,
गद्दारी करता है,
कहीं, बिचौलिया बनकर
दुश्मन के साथ,
यारी करता है ।
मुखौटे की कोई जाति
या धर्म, नहीं होता है
अपने किए पर,
मुखौटे को, कोई शर्म नहीं है
अपना मनचाहा, शिकार पाकर
मुखौटा निखर जाता है
दोस्ती का विश्वास
पल भर में बिखर जाता है ।
मुखौटे आपस में,
मुखौटा-धर्म निभाते हैं
दोस्ती, ईमानदार, सच्चाई को
गाली खिलवाते हैं ।
आतंकवादी-विरोधी मुखौटे के पीछे
आतंकवादियों से अधिक
आतंकी,
आतंकवादी छुपे हैं
यही कारण है
आतंक उन्मूलन में हम,
वहीं के वहीं रुके हैं
लेकिन यह सच है
मुखौटा हकीकत को मिटा नहीं सकता
देर सबेर,
उतरता जरुर है
फिर भी,
मुखौटा लगाने वालों को
इस पर कितना गुरूर है ।
यहीं मुझे निदा फाजली याद आते हैं
जो यह फरमाते हैं-
हर आदमी में, होते हैं, दस-बीस आदमी ,
जिसको भी देखना हो, कई बार देखना ।

- अवनीन्द्र विनोद




व्यवस्था: एक मुखौटा

(1) एक मुखौटा
महज़ ओढ लिया गया है
एक ढोंग की तरह...
एक दिखावे के लिये
नहीं तो कुछ भी नहीं ऐसा
जो हो रहा है कहीं भी
न जाने फिर भी कैसे...
हर कुछ नज़र आता है
एक व्यवस्था के तहत !

(2) अख़बारों में
क्रम है पन्नों का
और बंटा हुआ है
ख़बरों का स्थान
पर क्या
घट रहीं हैं घटनाएँ
वैसे ही
जैसे छपती हैं या
छापी जा रही हैं
किसी व्यवस्था के तहत!

(3) परिवर्त्तन
संभव है सिर्फ दो स्थितियों में
पहली स्थिति --
जहाँ कोई व्यवस्था न हो

और दूसरी --
जहाँ एक व्यवस्था हो
अब कैसे परिवर्त्तन हो
उस स्थिति में
जब व्यवस्था महज़
एक खोल...
एक आवरण...
एक कवच
बन जाती हो
किसी परिवर्त्तन के विरूद्ध
भले ही अन्दर
हर कुछ अव्यवस्थित हो
हर व्यवस्था के तहत ?

(4) विद्रोही
दिग्भ्रमित हैं
और स्वप्रताडित भी
क्योंकि......
चाहते हैं करना
'विद्रोह'
व्यवस्था के विरूद्ध
(पर कमब्ख़त दिखे तब तो !)
एक मुखौटे को
खोद देने भर से
क्या-क्या हो जाएगा
किसी भी व्यवस्था के

तहत ???
(कुछ न हो सका तो..
विद्रोही बे-मौत मर जाएगा !)

(5) बदल रहीं हैं
परिभाषाएँ
मान्यताएँ
और
तमाम अवधारणाएँ
क्योंकि.....
विज्ञान अक्षम है
ढूँढने में
उन कारणों को
जो दिखती नहीं
किसी मुखौटे के पीछे
और अब
हर कोई समझने में लगा है
-- व्यवस्था को !!!

- अभिषेक पाटनी (पहले 'अनाम कवि')




मुखौटे कभी लुभाते थे, हँसाते थे
अपनी बनावट और सजधज से
और कभी इशारों ही इशारों में
कह देते थे- बड़ी-बड़ी बातें
समाज और संस्कृति की झलक
दिखाते थे
आदमी को तमीज सिखाते थे
आज आदमी पर भारी हैं
तरह-तरह के मुखौटे
विरोधी भूमिका निभा रहे हैं
बड़ी हुज्जत से इंसानियत को चिढा रहे हैं
आदमी को रोता देख चुपके-चुपके
मुखौटे ठहाके लगाते हैं
एक अदद जरुरत की तरह
मुखौटे चिपक गए हैं
सभ्य होते आदमी के चेहरे पर
छिप गई है असलियत
मुखौटे के पीछे
आदमी की पहचान खो गई है
और आदमी है कि
बेबस नज़र आता है
अब आदमी में नही बचा है
इतना भी संवेदन कि
वह कर सके प्रेम या घृणा
विरोध या समर्थन
वह बोल सके खुलकर
अपनो से
या रो ले अकेले में
वह नहीं जुटा पा रहा है
इतना भी साहस कि
सड़क पर निकल सके
अपना चेहरा लिए हुए
अपने व्यक्तित्व के साथ
मुखौटे के बिना

-डा. नंदन



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66 कविताप्रेमियों का कहना है :

Swarna Jyothi का कहना है कि -

मुखौटो पर कवितायें पढी अच्छी लगी हमने एक दिन किसी से पूछा था आप क्या करते हैं ? जवाब मिला हम पुजारी हैं । उनका जवाब सुनकर ये पँक्तियाँ लिखी थी कुछ कुछ आप के शीर्षक के अंतर्गत ही
ऐ बता ए पुजारी
तू है किस का पुजारी
भगवान मानवता या अच्छाई
हर चौराहा हर गली हर मोड पर
श्वान शिकारी और बन भिखारी भी
खडे हैं कफ़न ओढाने , अच्छाई पर हैं आमादा
ओढे हुए एक चोले पर एक और लाबादा
अब ऐ बता ऐ पुजारी
तू है किस का पुजारी

सभी कवितायें अच्छा व्यंग्य करती हुई हैं
एक साथ २५ कवितायें पढना सुखद अनुभूति है। आप सभी धन्यवाद के पात्र हैं

Anish का कहना है कि -

सब नही पढा अभी तक.
डा. नंदन - बहुत सुंदर है.
सही व्यथा को बताया है,.

Avaneesh तिवारी

Anish का कहना है कि -

अवनीन्द्र विनोद - कविता मी जीवंत उदाहरण देना भाया.
सुंदर रचना,
अवनीश तिवारी

Anish का कहना है कि -

रंजना भाटिया -
प्रेरणा अच्छी है.
अवनीश

Anish का कहना है कि -

निखिल आनंद गिरि
-
पीड़ा के शब्द-शब्द मीत को समर्पित हों,
आंसुओं की लय में हो, गुंजित जीवन-मरण...
माँ ने तो सिखलाया जीने का ककहरा,
दुनिया से सीखे हैं, नित नए व्याकरण...
बहुत ठीक

अवनीश तिवारी

Anish का कहना है कि -

सुजीत कुमार सुमन
-
बहुत सुंदर बना है.
बड़ा विनम्र सीख है.

अवनीश तिवारी

Anish का कहना है कि -

श्रीकान्त मिश्र 'कान्त'
-
मेरे लिए आप पर कहना मेरा सुभाग्य ही है.

हर बार की तरह शुद्ध शैली मी बहुत कुछ बताया है.

अवनीश तिवारी

Anish का कहना है कि -

अवनीश तिवारी -
हिंद युग्म पर मेरी पहली प्रकाशित रचना है.
वर्तनी की कमी रह गयी है लिखते समय.

बताये कैसा बना है ?
अवनीश तिवारी

Anish का कहना है कि -

शैलेश जमलोकी
-
ये दिखावा जैसा होगा, सोच भी कर देगा वैसी
तर्क एक से बढकर दिलाये, वो मुखोटा चेहरे का

बहुत खूब...

अवनीश तिवारी

Anish का कहना है कि -

सौमेश्वर पांडेया
-
समानता का संदेश देती आपकी रचना सुंदर है.
बधाई.


अवनीश तिवारी

तपन शर्मा का कहना है कि -

माफ़ी चाहता हूँ, कविताओं पर टिप्पणी बाद में करूँगा, पर फ़िलहाल हैरानी है कि इस बार एक भी चित्र नहीं है!!!
--तपन शर्मा

Anish का कहना है कि -

देव मेहरा
-
कडुवा सच कहा है.
सुंदर बात है.
अवनीश तिवारी

Anish का कहना है कि -

सजीव सारथी
-
देखता है क्यों हैरान होकर, आइना मुझे रोज,
ढूँढ़ता है, मुखौटों के शहर में एक चेहरा, मुखौटा।

वाह वाह.



अवनीश तिवारी

Anish का कहना है कि -

मोहिन्दर कुमार
-
जैसे को तैसा
या
नेकी कर कुएँ में डाल
निर्णय करने में
मुखौटा बड़ा काम आता है
अपनी छुपा कर
औरों के दिल की थाह पाता है...
इसीलिये इसे छोड़ नहीं पाता हूं
कुछ पाने की चाह का मूल्य
अपनी पहचान गंवा कर चुकाता हूं
हां, यदा-कदा मैं भी मुखौटा लगाता हूं
आज के जीवन मे हालत से सम्झुता करना भी एक उपाय है आगे पढ़ने का.
सही कहा है आपने.


अवनीश तिवारी

Anish का कहना है कि -

रविकांत पाण्डेय
-

मानवता पर प्रहार कराने वाले मुखौटों के सपने कभी सच न हो ऐसी कामना करते हुए -

अवनीश तिवारी

Anish का कहना है कि -

बी राघव

-

आज के नेताओं का सही चेहरा बताती यह पंक्तियाँ दमदार है -
गरीबों की ईँटें तिजोरी में सजतीं
अबला की पायल नुच-नुच के बजतीं
खादी की जेबों को भरने के आदी
कानून का क्या, कलम जब घुमा दी
भले कोई भी हो बस नोटों से सींचे
ये चेहरे बदलते हैं वोटों के पीछे
मुँहू खोटों की दुनिया मुखौटों के पीछे
मुँहूँ खोटों की दुनिया.........


अवनीश तिवारी

Rajesh का कहना है कि -

Shobhaji,
Yahi hai duniya ki sachhai. pati, patni, bhai, bahan, beta, beti, aur even premi aur premika bhi is duniya mein apne asali chehre per koi na koi "MUKHAUTA" lagaye ghoom rahe hai. Jab kabhi sachi surat samne aati hai to hadbadakar rah jate hai. Bahut umda rachna hai aapki. badhaiyan

Avanish Gautam का कहना है कि -

अनाम कवि मैं आपका नाम जानना चाहूँगा. सबसे अच्छी कविता लिखी है आपने. बधाई

Anish का कहना है कि -

बी राघव

-

आज के नेताओं का सही चेहरा बताती यह पंक्तियाँ दमदार है -
गरीबों की ईँटें तिजोरी में सजतीं
अबला की पायल नुच-नुच के बजतीं
खादी की जेबों को भरने के आदी
कानून का क्या, कलम जब घुमा दी
भले कोई भी हो बस नोटों से सींचे
ये चेहरे बदलते हैं वोटों के पीछे
मुँहू खोटों की दुनिया मुखौटों के पीछे
मुँहूँ खोटों की दुनिया.........


अवनीश तिवारी

Anish का कहना है कि -

प्रो. सी॑ बी श्रीवास्तव विदग्ध
- आपकी यह रचना या गीत मुझे बहुत भाई.
मैंने इसे २ बार पढा .
बधाई.
अवनीश तिवारी

सजीव सारथी का कहना है कि -

शोभा जी बहुत खूब
मुखौटे और भी हैं
जो हम सब
समय और आवश्यकता
के अनुरूप पहन लेते हैं
इनके बिना सूरत
बहुत कुरूप सी लगती है

कुछ यही अंदाज़ लिए श्रीकांत जी ने भी खूब कहा है
स्वयं को पहचानने के प्रयास में
हां नोंचने लगा हूं
मैं अपना चेहरा,

सजीव सारथी का कहना है कि -

प्रगति जी की कविता में नयापन है, घटना का कविता रूपांतरण और अच्छा हो सकता था

हरिहर जी आप जैसा होना चाहेगा हर सवेंदनशील आदमी -
अपना सिक्का खोटा नहीं
और मेरे विचार कोई मुखौटा नहीं
इस मुखौटे से बँधा मेरे पीछे कोई
धागा नहीं
और चमड़ी के भीतर मैंने
ट्रांसप्लांट करवाया एक मुखौटा
और उसके ऊपर दूसरा
बुरी तरह
चिपक गया हो पड़े-पड़े
ऐसा भी नहीं



anish जी मर्म को छुआ है आपने
स्वार्थ सिद्ध करते जाता हूँ,
लौट शाम जब घर अपने,
मुखौटा वह गिराता हूँ,
दूर फ़ेंक उस मुखौटे को,
अपने पर हंसते पाता हूँ,

सजीव सारथी का कहना है कि -

निखिल भाई खूब है -
माँ ने तो सिखलाया जीने का ककहरा,
दुनिया से सीखे हैं, नित नए व्याकरण...

मैं केवल एक मुखौटा हूं.
महेश जी यही हम सब की सच्चाई है

यह भी खूब है -
अख़बारों में
क्रम है पन्नों का
और बंटा हुआ है
ख़बरों का स्थान
पर क्या
घट रहीं हैं घटनाएँ
वैसे ही
जैसे छपती हैं या
छापी जा रही हैं
किसी व्यवस्था के तहत!

Shailesh Jamloki का कहना है कि -

- @सुजीत कुमार सुमन

आपकी कविता बहुत ही सुन्दर लगी.. अगर मै सोचु क्यों तो मुझे ये जबाब मिला
१) बहुत ही सरल शब्दों का प्रयोग किया गया है अपनी बातो को कहने के लिए ...
२) जो तथ्य सामने लाये है.. वो पहली बार पड़ने से ही दिल को छू गए
जो बात कमी सी लगी
1) आप कही शीर्षक भूल से गए.. और पहले पद के बाद कुछ शीर्षक से अलग से हो गए..
बाकी कविता काबिले तारीफ़ है.. बधाई स्वीकारें

Shailesh Jamloki का कहना है कि -

- @सजीव सारथी
सजीव जी आपकी कविता के क्या कहने..
लगता है आपकी और मेरी सोच कुछ समान है..इसीलिए थोडा सा मिलता जुलता रूप है कविता का
पर मुझे ये कहने मै कोई भी हिचक नहीं है की.. आपने मुझसे बहुत श्रेष्ट कविता की रचना की है..
अगर मै ये कहू क्यों अच्छी लग मुझे आपकी कविता तो ये कहूँगा
- मुखोटे से जुडे लगभग हर तथ्य को सामने रखा है
- उर्दू के शब्दों का बेहतरीन उपयोग किया है
- ग़ज़ल के सभी तत्वों को ध्यान मै रखा है
- चन्द पंक्तियों मै सब कुछ कह दिया है

आपकी कविता की हर लीन दिल पर असर करती है... अतः इस बेहतरीन पंकिय्तो के लिए बधाई स्वीकारें..
ये कविता मेरे लिए भी कुछ सिखा गयी है सच कहू तो,..,..

Shailesh Jamloki का कहना है कि -

- @रंजना भाटिया
रंजना जी बहुत ही अच्छी कविता है..
और आपके सोच को दर्शाती है..
मेरे कहने का मतलब है जब पहली बार पड़ा तो लगा ही नहीं की ये कोई औरत कह रही है
पर दो तीन बार पद कर समझ मै आया मतलब .. और फिर पता चला वाकई बहुत खूबसूरत है
बधाई हो.
औरतों के लिए अच्छी प्रेरणा है.. आपकी कविता सचमुच प्रेरित करती है...

Shailesh Jamloki का कहना है कि -

@बी राघव
मुँहू खोटों और मुखोतो का बहुत सुन्दर प्रयोग किया है.. और कविता पर बिलकुल सही बैठता है
बधाई

Shailesh Jamloki का कहना है कि -

-@ प्रगति सक्सैना
क्या संकल्पना की है बहुत उम्दा... और उनको शब्दों मै बहुत अछे से बंधा है...
क्या बात है...

Shailesh Jamloki का कहना है कि -

- महेश चंद्र गुप्त 'ख़लिश'
आपकी सोच भी हमको खूब भाई.. बहुत अछे...

shobha का कहना है कि -

मुखौटा विषय पर लिखी समस्त रचनाएँ काबिले तारीफ़ हैं । विशेष रूप से मुझे कुछ रचनाएँ बहुत पसन्द आई।
श्रीकन्त जी नीरव .. शान्ति
गूंज घण्टे की
सेवा.. प्रेम सन्देश
भाईचारा.. श्वेत वस्त्र
कन्फेशन …
प्रभु लेता है …
सारे पाप अपने ऊपर
और तुम पापमुक्त ..
भावनात्मक शोषण,
सजीव सारथी जी
देखता है क्यों हैरान होकर, आइना मुझे रोज,
ढूँढ़ता है, मुखौटों के शहर में एक चेहरा, मुखौटा।

हरिहर झा
नादान बच्चे
पहन कर मुखौटा
डराते फिरते है
नहीं जानते वे
उनके डराने की प्रवृत्ति भी
एक तरह से भीतर का घमंड है
वे मेरी तरह विनम्र होना नहीं जानते

Shailesh Jamloki का कहना है कि -
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shobha का कहना है कि -

मोहिन्दर जी
जैसे को तैसा
या
नेकी कर कुएँ में डाल
निर्णय करने में
मुखौटा बड़ा काम आता है
अपनी छुपा कर
औरों के दिल की थाह पाता है...
इसीलिये इसे छोड़ नहीं पाता हूं
कुछ पाने की चाह का मूल्य
अपनी पहचान गंवा कर चुकाता हूं
हां, यदा-कदा मैं भी मुखौटा लगाता हूं
तनहा कवि
वह सच था, झूठ था या
था मैं हीं एक खोटा!
पर, लुट गया वो मैं था,
जो जीता वो मुखौटा!!
अनुराधा जी
मुखौटे जब सरक जाते हैं,
तो असली चेहरे सामने आ ही जाते है
कल नेता जी ने आम सभा में बडी-बडी बातें बनायी
अपने जनसेवक होने की दुहाई भी दी
घर आते ही अपने सेवक को
हरामी की उपाधि से नवाजा
अवनीश जी
रोज सवेरे अपने चहरे पर वह ,
मुखौटा चढ़ाता हूँ,
और इस अनोखी दुनिया में जीने के लिए,
अपने कदम बढ़ाता हूँ,
तरह-तरह के अभिनय कर,
अपना काम बनाता हूँ,
निखिल
गुमशुदा-सा फिरता हूँ, अपनों के शहर में,
आइनों ने कर लिया, मेरा ही अपहरण....
मौन की देहरी जब तुमने भी लाँघ दी,
महेश वसुमैं क्या हूं मुझ को पता नहीं नित नये रूप मैं धरता हूँ
हर रोज़ नया मुखड़ा रंग कर मैं स्वांग नया नित करता हूं
मैं केवल एक मुखौटा हूं
अनाम कवि
विद्रोही
दिग्भ्रमित हैं
और स्वप्रताडित भी
क्योंकि......
चाहते हैं करना
'विद्रोह'
व्यवस्था के विरूद्ध
(पर कमब्ख़त दिखे तब तो !)
एक मुखौटे को
खोद देने भर से
क्या-क्या हो जाएगा
किसी भी व्यवस्था के

shobha का कहना है कि -

नन्दन जी
बहुत सुन्दर
मुखौटे कभी लुभाते थे, हँसाते थे
अपनी बनावट और सजधज से
और कभी इशारों ही इशारों में
कह देते थे- बड़ी-बड़ी बातें
समाज और संस्कृति की झलक
दिखाते थे
आदमी को तमीज सिखाते थे
आज आदमी पर भारी हैं
तरह-तरह के मुखौटे
विरोधी भूमिका निभा रहे हैं

सचिन लुधियानवी का कहना है कि -

मारक, कुछ चुभती कुछ दुखती कुछ रुकती कुछ कहती कविताएं. रंजना भाटिया पूरी पढी. सुंदर ख्याल अपनी बात. शोभा महेन्द्रू, आलौक कुमार सिंह, सौमेश्वर पांडेया,शैलेश जमलोकी को पढा प्रभावित किया

Rajesh का कहना है कि -

मुखोटे शीर्षक पर लिखी गई सभी कवियों की रचनाएँ अच्छी हैं. प्रोफ़.श्री सी.बी.श्रीवास्तव"विदग्ध" की रचना सर्वश्रेष्ठ लगी. निम्नलिखित
कवियों की रचनाएँ भी मन को छूती हैं:-
१.श्री बी.राघव.
२.श्री निखिल आनंद गिरी
३.श्री श्रीकांत मिश्रा 'कान्त'
४. श्री मोहिंदर कुमार
५. श्री सुजीत कुमार सुमन
६. सुश्री शोभा महेन्द्रू
---राम चरण वर्मा "राजेश"

Rajesh का कहना है कि -

मुखोटे शीर्षक पर लिखी गई सभी कवियों की रचनाएँ अच्छी हैं. प्रोफ़.श्री सी.बी.श्रीवास्तव"विदग्ध" की रचना सर्वश्रेष्ठ लगी. निम्नलिखित
कवियों की रचनाएँ भी मन को छूती हैं:-
१.श्री बी.राघव.
२.श्री निखिल आनंद गिरी
३.श्री श्रीकांत मिश्रा 'कान्त'
४. श्री मोहिंदर कुमार
५. श्री सुजीत कुमार सुमन
६. सुश्री शोभा महेन्द्रू
---राम चरण वर्मा "राजेश"

Ram Charan Verma " Rajesh" का कहना है कि -

मुखोटे शीर्षक पर लिखी गई सभी कवियों की रचनाएँ अच्छी हैं. प्रोफ़.श्री सी.बी.श्रीवास्तव"विदग्ध" की रचना सर्वश्रेष्ठ लगी. निम्नलिखित
कवियों की रचनाएँ भी मन को छूती हैं:-
१.श्री बी.राघव.
२.श्री निखिल आनंद गिरी
३.श्री श्रीकांत मिश्रा 'कान्त'
४. श्री मोहिंदर कुमार
५. श्री सुजीत कुमार सुमन
६. सुश्री शोभा महेन्द्रू
---राम चरण वर्मा "राजेश"

रंजू का कहना है कि -

मुखोटा विषय ही बहुत सुंदर था और इस पर लिखने की अपार क्षमता भी थी सबसे बहुत अच्छा लिखा है ..
शोभा जी आपने एक सच्चाई अपनी इस कविता में लिखी है

मुखौटा तुमने भी पहना है
और मैने भी
सच तुम्हें भी पता है
और मुझे भी
फिर शिकायत व्यर्थ है

बहुत खूब बात कही है आपने मुझे आपका लिखा बेहद पसंद आया

देखा पहली बार मुखौटा
सत्ता के गलियारे में
लगा हुआ था यही मुखौटा
भारत के बंटवारे में

आलौक कुमार जी आपकी यह पंक्तियाँ बेहद पसंद आई !!

दिल आईना है यूं तो
सुमन का
देख के इसमे खुद ही
संवर लीजिये

सुजीत कुमार जी बहुत खूब!!


झोली में सब सुख ही सुख, ग़मों की ख़ुद बदहाली है|
ऐ मुखौटे वाले मुझको ऐसे-इतने मुखौटे तू दे दे |
कि जिन्हें पहनने के बाद कोई हिंदू-सिख या मुसलमान न रहे |
सौमेश्वर पांडेया जी बहुत सही बात कही है आपने

मुखौटे अभी और भी हैं
मुखौटे ही मुखौटे …
इन्हें उतारने के प्रयास में
स्वयं को पहचानने के प्रयास में
हां नोंचने लगा हूं
मैं अपना चेहरा,

श्रीकांत जी आपका लिखा हुआ बहुत ही सुंदर होता है यहाँ भी बेहद पसंद आया !!

सारे स्वार्थ सिद्ध उसके, कर जो पाए बार बार
पहन लेता है ये इंसान, वो मुखौटा चेहरे का

- शैलेश जी आपका लिखा भी बेहद पसन्द आया आपके लिखते रहे आपके में लिखने की अपार क्षमता है !!

हमारा ही अंहकार
सच का प्रतिकार
रोज़ करता है;
परन्तु,
हमें मुखौटे पहनने की
आदत पड़ गई है!

बहुत सुंदर देव मेहरा जी आपका लिकः बेहद पसंद आया !!

रंजू का कहना है कि -

बच के रहिएगा आप भी ऐसे किसी मुखौटे से
जो संग चले आपके .. पर मकसद एक न हों ..
आपके ज़हन पर छा जाए एक बादल कि तरह
पर उसके मनसूबे और इरादे नेक ना हों ..

एक सुंदर संदेश दिया है आपने इस कविता के मध्याम से - प्रगति जी !!

देखता है क्यों हैरान होकर, आइना मुझे रोज,
ढूँढ़ता है, मुखौटों के शहर में एक चेहरा, मुखौटा।

सजीव जी बहुत बहुत सुंदर लिखा है आपने !


अपना सिक्का खोटा नहीं
और मेरे विचार कोई मुखौटा नहीं
इस मुखौटे से बँधा मेरे पीछे कोई
धागा नहीं
आपका लिखा अच्छा लगाहरिहरजी
जैसे को तैसा
या
नेकी कर कुएँ में डाल
निर्णय करने में
मुखौटा बड़ा काम आता है

बहुत खूब मोहिंदर जी ..

वह सच था, झूठ था या
था मैं हीं एक खोटा!
पर, लुट गया वो मैं था,
जो जीता वो मुखौटा!!

सुंदर लिखा है दीपक आपने

अरमानों के बीज हकीकत की ज़मीं पर लहलहाये
आओ कुछ ऐसा कर दिखायें
कुछ और नये मुखौटे चस्पां होने से पहले हटा दें

अनुराधा जी यह पंक्तियाँ अच्छी लगी !


रंग बदलती इस दुनिया में
सब कुछ इतना बदल गया है
सबने पहन रखा मुखौटा है
चेहरे पर नहीं कोई मुखौटा
चेहरा ही एक मुखौटा है

साधना जी बहुत सही बात कही आपने

वो दर्द भरी आवाज़...
मैं धरती हूँ..अखंड धरती...
कुछ विक्षिप्त तोड़ना चाहते हैं मुझे...
थोप रहे हैं वे कुछ मुखौटे....

सुंदर और सही रविकांत जी

झाँक भीतर आजकल मैं
पानी है जहाँ बहुत गेहरा
अपने ही मुखौटों की भीड़ में,
खोजूँ अपना असली चेहेरा

यह भी एक सच लिखा है आपने सतीश जी अच्छा लगा आपका लिखा हुआ पढ़ना !!

जीवन-विवशता की सच्चाई का,
ये अनचाहा फल है,
कल कैसे मुखौटा न चढाउ ,
क्या इसका कोई हल है ?

सही और सुंदर अवनीश जी !

रंजू का कहना है कि -

कौड़ियों के भाव बिका, जब से अंतःकरण,
अनगिन मुखौटे हैं, सैकड़ों हैं आवरण...
मदमस्त होकर जो झूमती हैं पीढियां,
लड़खड़ा न जाएँ कहीं सभ्यताओं के चरण...

बहुत सुंदर लिखा है आपने निखिल ..

योग्यता और सद्‌गुणों की, अब परख होती नहीं !
मुखौटों से , आदमी की हो रही पहचान है !!

जिसके हैं जितने मुखौटे ,वह है उतना ही बड़ा !
मुखौटे जो रहता बदलता ,वह बना भगवान है !!

क्या बात लिखी है अपने सी बी श्रीवास्तव जी

मुँहू खोटों की दुनिया मुखौटों के पीछे
खबर सबको है पर,
नजर सबको है पर,
न जाने चले क्यूँ इन आखों को मीचे..

बहुत खूब राघव जी !!

मैं क्या हूं मुझ को पता नहीं नित नये रूप मैं धरता हूँ
हर रोज़ नया मुखड़ा रंग कर मैं स्वांग नया नित करता हूं
मैं केवल एक मुखौटा हूं

महेश जी यह पंक्तियां अच्छी लगी !!

मुखौटा लगाने वालों को
इस पर कितना गुरूर है ।
यहीं मुझे निदा फाजली याद आते हैं
जो यह फरमाते हैं-
हर आदमी में, होते हैं, दस-बीस आदमी ,
जिसको भी देखना हो, कई बार देखना ।

सुंदर बात कही आपने अवनीन्द्र इस में निदा फाजली जी की यह पंक्तियाँ दिल को छूती है !!

विज्ञान अक्षम है
ढूँढने में
उन कारणों को
जो दिखती नहीं
किसी मुखौटे के पीछे
और अब
हर कोई समझने में लगा है
-- व्यवस्था को !!!

अनाम कवि जी आपकी मुखोटे के भाव बहुत सुंदर है सबसे अलग .बहुत अच्छी लगी मुझे यह !

और आदमी है कि
बेबस नज़र आता है

इतना भी साहस कि
सड़क पर निकल सके
अपना चेहरा लिए हुए
अपने व्यक्तित्व के साथ
मुखौटे के बिना

बहुत ही सुंदर और भाव पूर्ण लिखा है आपने नंदन जी

और अंत में जिन्होंने मेरे लिखे को पसंद किया उनका तहे दिल से शुक्रिया ..:)

pragati "pragsavee" का कहना है कि -

एक कवि की कल्पनाओं का कोई अंत नहीं है...यह आज समझ आया है..
मुखौटे पे लिखी हर कविता एक अलग ही अर्थ अपने में समाहित हुए है .
मुझे बहुत ज्ञान मिला इन सभी रचनाओं को पढ़के..
हिंदी युग्म को इस उपलब्धि पर बधाई .

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

मुखौटे पर ज्यादातर कवियों ने एक ही तरह की तस्वीर पेश की है। मुखौटों को मानव-व्यवहार से जोड़ा है।

१॰ शोभा जी ने व्यंग्य करने की शैली बढ़िया चुनी है।

२॰ साहिल ने आदमी के चेहरे की सही तस्वीर सामने तो रखी है, लेकिन कथ्य में नयापन नहीं है।

३॰ सुमन जी, अच्छा मुक्तक है (लेकिन पूरी पंक्तिया विषयानुकूल होती तो बहुत बढ़िया था)

४॰ सौमेश्वर पाण्डेया के विचार तो अच्छे हैं, लेकिन उनमे कविता जैसी बात कम है। (सपाट लेखन से बचें)

५॰ रंजना जी, आपकी कविताओं में हमेशा अभ्यास की कमी दिखती है। गेयता खंडित हो रही है।

६॰ श्रीकांत जी, पहली पाँत की सबसे बढ़िया रचना, बिलकुल नये तेवर, नये अंदाज में। बधाई।

७॰ शैलैश जी, आपका क्राफ़्ट अच्छा है, हाँ शिल्प नहीं है। शब्द-चुनाव पर बारम्बार अभ्यास करें।

८॰ देव जी, अतुकांत कविताओं में भी पूरा वाक्य लिखने से बचना चाहिए। वैसे आपकी बातें बढ़िया हैं।

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

९॰ प्रगति सक्सैना की कविता में बिलकुल नई तरह से बात जमाई गई है। आप बेहतर लेखन की ओर बढ़ रही हैं। बधाइयाँ।

१०॰ सजीव सारथी जी, बहुत बढ़िया, बहुत सुंदर। काफ़ी अच्छा लिख लेते हैं आप। कोई ग़ज़ल गाने वाला मिले तो उससे गवाया जा सकता है।

११॰ बड़ों और बच्चों का सूक्ष्मांतर बहुत खूबसूरती से बताया है हरिहर झा जी ने।

१२॰ मोहिन्दर जी , आपका पहला अंतरा तो बिलकुल सपाट है। मुखौटे की महिमा ही लिखनी थी तो थोड़ा और लिखते।

१३॰ तन्हा जी, आपका प्रयोग पसंद आया। आप अपनी विशेषता दिखा ही जाते हैं।

१४॰ अनुराधा जी, आपके संदेश पर सभी को ध्यान देना चाहिए। कम से कम युवाओं को अवश्य।

१५॰ साधना जी, अच्छी जानकारी है। लेकिन कविता बनने में अभी कसर है।

१६॰ रविकांत जी, बहुत प्रभावी नहीं है आपकी कविता।

१७॰ सतीश जी, समस्या का समाधान ही तो नहीं है, इसलिए अंतोगत्वा पश्चाताप एक समाधान बचता है। बढ़िया कविता है।

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

१८॰ हल तो नहीं है अवनीश भाई। हाँ लेकिन आप बेहतर लेखन की ओर बढ़ रहे हैं, यह अच्छी बात है,

१९॰ निखिल जी, बहुत प्रभावी लगी आपकी रचना। हर शे'र पसंद किया जा सकता है। खुद में पूरा। बधाई।

२०॰ विदग्ध जी, आपने औरों से हटकर भी लिखा है और अच्छा भी लिखा है। लगे रहिए।

२१॰ राघव जी, अच्छी कविताओं के क्रम में एक अच्छा गीत। इसको अपनी आवाज़ भी दे दीजिए।

२२॰ क्या बात है, जैसे-जैसे अंत की तरह बढ़ रहा हूँ, अच्छी कविताओं का तांता लग गया है। खलिश जी आपकी भी बहुत खूब।

२३॰ अवनीन्द्र जी, अच्छी कविता है।

२४॰ मुझे सबसे अधिक अच्छी अनाम जी ये काव्य-झलकियाँ लगीं। सुंदर कथ्य, ग़ज़ब का तेवर और अलग-अलग भाव। बहुत-बहुत बधाई।

२५॰ 'एक अदद जरुरत की तरह मुखौटे चिपक गए हैं' डा॰ नंदन की दार्शनिक कविता भी पसंद आई।

अंत में मैं हिन्द-युग्म के अनुभवी कवियों से निवेदन करूँगा कि वो भी काव्य-पल्लवन पर अपनी कलम चलाया करें। इससे वो भी सीख सकेंगे और नये भी सीख सकेंगे।

vivek ranjan shrivastava का कहना है कि -

अब तो चेहरों को सजाने लग गये हैं मुखौटे !

प्रो.सी.बी.श्रीवास्तव "विदग्ध"
सेवानिवृत प्राध्यापक प्रांतीय शिक्षण महाविद्यालय
C-6 , M.P.S.E.B. colony , Rampur ,
Jabalpur (M.P.)INDIA


मोबा. 9425484452
Email vivek1959@sify.com
blog http://pitashrikirachnaye.blogspot.com


अब तो चेहरों को सजाने लग गये हैं मुखौटे !
इसी से बहुतों को भाने लग गये हैं मुखौटे !

रूप की बदसूरती पूरी छिपा देते हैं ये
झूठ को सच बताने लग गये हैं मुखौटे !

अनेकों तो देखकर असली समझते हैं इन्हें
सफाई !सी दिखाने लग गये हैं मुखौटे !

क्षेत्र हो शिक्षा या आर्थिक धर्म या व्यवसाय का
हरएक में एक मोहिनी बन छा गये हैं मुखौटे !

इन्हीं का गुणगान विज्ञापन भी सारे कर रहे
नये जमाने को सहज ही भा गये हैं मुखौटे !

सचाई और सादगी लोगों को लगती है बुरी
बहुतों को अपने में भरमाने लग गये हैं मुखौटे !

समय के संग लोगों को रुचियों में अब बदलाव है
खरे खारे लग रहे सब मधुर खोटे मुखौटे !

बनावट औ दिखावट में उलझ गई है जिंदगी
हर जगह लगते रिझाते जगमगाते मुखौटे !

मुखौँटों का ये चलन पर ले कहाँ तक जायेगा
है विदग्ध विचारना ये क्यों हैं आखिर मुखौटे !

vinamra का कहना है कि -

मुखौटे

विवेक रंजन श्रीवास्तव

काव्य पल्लवन से नया नया जुडा.

पिताश्री को विषय बताया तो उन्होंने दो दिनो मे २ रचनायें लिख कर दे दी ! एक रचना काव्य पल्लवन में समाहित है ! उनकी ही दूसरी रचना ऊपर कमेंट में दे रहा हूं ! मेरा अपना भी चिंतन चला ! विचार नीचे हैं , इन्हें आप रचना माने तो मान सकते हैं !

काव्य पल्लवन बेहद रोमांचक अनुभव है !

अगले अंक हेतु मैं माँ विषय सुझाना चाहता हूँ ! माँ को लेकर प्रत्येक के अनुभव अलग हो सकते हैं पर माँ जो हम सबकी जीवन दायिनी है , उसके प्रति कृतज्ञता ज्ञापन का यह एक श्रेष्ठ स्वरूप हो सकता है ! हम उस संस्कृति के संवाहक हैं जहाँ नदियों को भी माँ के रूप में पूजा जाता है ! देवी माँ की उपासना की जाती है ! तो यदि हम माँ पर रचनायें लिखें तो कैसा रहे ?

मैं तो सुझाव देना चाहूँगा कि विषय पर पुराने प्रसिद्ध कवियों की रचनायें भी यदि पाठक कमेंट्स के अंर्तगत भेजें तो एक मंच पर स्तरीय साहित्य एकत्रित हो सकेगा !

मुखौटे

बचपन में
मेरे खिलौनों में शामिल थी एक रूसी गुड़िया
जिसके भीतर से निकल आती थी
एक के अंदर एक समाई हुई
हमशकल एक और गुड़िया
बस थोड़ी सी छोटी आकार में !

सातवीं
सबसे छोटी गुड़िया भी बिलकुल वैसी ही
जैसे बौनी हो गई हो
पहली सबसे बड़ी वाली गुड़िया
सब के सब एक से मुखौटौ में !

बचपन में माँ को और अब पत्नी को
जब भी देखता हूँ
प्याज छीलते हुये या
काटते हुये पत्ता गोभी
परत दर परत , मुखौटों सी हमशकल
बरबस ही मुझे याद आ जाती है
अपनी उस रूसी गुड़िया की !
बचपन जीवन भर याद रहता है !

मेरे बगीचे में प्रायः दिखता है
एक गिरगिटान
हर बार एक अलग पौधे पर ,
कभी मिट्टी तो कभी सूखे पत्तों पर
बिलकुल उस रंग के चेहरे में
जहाँ वह होता है
मानो लगा रखा हो उसने
अपने ही चेहरे का मुखौटा
हर बार एक अलग रँग का !

मेरा बेटा
लगा लेता है कभी कभी
रबर का कोई मास्क
और डराता है हमें ,या
हँसाता है कभी
जोकर का मुखौटा लगा कर !

मैँ जब कभी
शीशे के सामने
खड़े होकर
खुद को देखता हूँ तो
सोचता हूँ अपने ही बारे में
बिना कोई आकार बदले
मास्क लगाये
या रंग बदले ही
मैं नजर आता हूँ खुद को
अनगिन आकारों ,रंगो, में
अवसर के अनुरूप
कितने मुखौटे
लगा रखे हैं मैने !

विवेक रंजन श्रीवास्तव

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

विवेक रंजन जी,

४-५ दिनों में पाठकों से विषय आमंत्रित किये जायेंगे, आप उस समय अपने विषय जमा कीजिएगा। माँ विषय बहुत अच्छा है।

आपने तो मुखौटे पर बहुत प्यारी कविता लिखी है। आपने क्यों नहीं भेजा। अगली बार ज़रूर भेजिएगा।

Anonymous का कहना है कि -

वाह !!.. देख रहा हूँ यहाँ लोग बहुत ही प्रतिभा शाली हैं ।
बहुत अच्छा लगा .... यहाँ इतनी सारी कविताएं पढ़कर।

मेरी मंगल कामनाएं।

~~~ रिपुदमन पचौरी

नंदन का कहना है कि -

काव्य पल्ल्वन में प्रकाशित सभी रचनाएँ अच्छी लगीं
सब पर अलग अलग टिप्प्णी करना कठिन है।
वर्तमान की विडंबना खुलकर सामने आई है
नंदन बचेली बस्तर्

श्रीकान्त मिश्र 'कान्त' का कहना है कि -

काव्यपल्लवन के नये अंक में निःसंदेह सभी लोगों ने लगभग जीवन के एक ही बिन्दु पर रचनाओं के माध्यम से ध्यानाकर्षण किया है इसके अतिरिक्त सारे रचनाकारों नें औसत शिल्प से लेकर बहुत ही स्तरीय कवितायें लिखी हैं फिर भी आदरणीय शोभा जी की रचना में व्यंग्य की धार बहुत ही पैनी लगी निखल की रचनाओं पर टिप्पणी करना उगते सूरज को उंगली दिखाना जैसा ही है साथ ही रंजना जी के भावपक्ष सहित निम्न पंक्तियों ने

देखता है क्यों हैरान होकर, आइना मुझे रोज, ढूँढ़ता है,
मुखौटों के शहर में एक चेहरा, मुखौटा। ए
सजीव जी

कुछ पाने की चाह का मूल्य
अपनी पहचान गंवा कर चुकाता हूं
हां, यदा-कदा मैं भी मुखौटा लगाता हूं
मोहिन्दर कुमार
जीवन-विवशता की सच्चाई का,
ये अनचाहा फल है,
कल कैसे मुखौटा न चढाउ ,
क्या इसका कोई हल है ?
अवनीश तिवारी
एवं भूपेंद्र राघव डा॰ नंदन के साथ अनाम कवि ने विशेष ध्यानाकर्षित किया

Bharati का कहना है कि -

बहुत अच्छा है अवनीश
-
भारती

अभिषेक पाटनी का कहना है कि -

achchhi rachanao ka anokha sangrah....aur us par wishay ek ...subhan allahh...wakai maza aa gaya...agar kavita kavita na ho kar deh yashti aadi se yukt hoti to aisa lagata mano sagee bahanein apne apne guno ke sath ek manch par utar aayee hon...adabhut...

Bhupendra Raghav का कहना है कि -

पच्चीस कवियो की कलमों ने
खींचा गजब मुखौटा..
निषंग घाव-प्रभाव दिलों तक
चाहे तुणीर छोटा..
श्रवण सिंह का विषय श्रवण कर
आज बहुत कुछ सीखा..
किसी के शर पर भाव लिखा तो
किसी पर व्यंग सरीखा..
कहीं दिखाई दिया मनुज का
असली लगता चेहरा..
कहीं सफर का बना फसाना
आत्म-कूप कहीं गहरा..
कभी खरे का रूप लिये
फिर रहा था सिक्का खोटा..
पच्चीस कवियो की कलमों ने
खींचा गजब मुखौटा..

सभी को मेरी तरफ से बहुत बहुत बधाई
अरे 'मुख़ौटा' नहीं है भाई.........

Bhupendra Raghav का कहना है कि -
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alok kumar का कहना है कि -

एक मंच से इतनी सारी कविताओं का मिलना बेहद सुखद रहा.समझ नहीं आता किन किन को बधाई दूँ.
खैर, सबसे अच्छी बात भारतवासी जी,रंजू जी और अन्य तमाम साथियों से बेहतरीन समीक्षाओं का मिलना रहा.
सच कहूँ तो मैं तो अपने इन साथियों की समीक्षा करने की अदा का कायल हो गया हूँ. किसी भी इन्सान के लिए समीक्षा कर्म बेहद कठिन होता है,परन्तु इनके लिए यह इतना सहज लगता है की विश्वास नही होता.
वैसे तो सभी कवियों को बधाई देना चाहूँगा पर विशेषकर अपने समीक्षक साथियों को मैं साधुवाद देना चाहूँगा.
और उम्मीद करता हूँ की वे अपनी पैनी निगाह को कमजोर नही पड़ने देंगे.
अलोक सिंह 'sahil"

alok kumar का कहना है कि -

ठिठका-सा चाँद है, गुम भी, खामोश भी,
जुगनुओं को रात ने दी है जब से शरण...
गुमशुदा-सा फिरता हूँ, अपनों के शहर में,
आइनों ने कर लिया, मेरा ही अपहरण....
मौन की देहरी जब तुमने भी लाँघ दी,
टूट गए रिश्तों के सारे समीकरण

वाह निखिल भाई! क्या खूब लिखी. भावनाओं का इतना कव्य्पूर्ण वर्णन निश्चित तौर काबिले तारीफ है.
सही mayane मी यही आपके पहचान को मुकम्मल बनती है.
बहुत बहुत साधुवाद.....
अलोक सिंह "साहिल"

निखिल आनन्द गिरि का कहना है कि -

नमस्कार,
इस बार काव्य-पल्लवन का अंक मजेदार था....सभी कवियों ने प्रभावित किया.....संयोजकों से निवेदन है कि रचनाओं को एक साथ प्रकाशित करने के बजाय सिलसिलेवार ढंग से प्रकाशित करने का प्रबंध करें.....तब हर एक कवि की रचना पर टिपण्णी करने में बनेगा....अभी किस पर लिखूं औ किस पर नही...
हाँ, विशेष बधाई उन्हें जिन्होंने पहली बार हमारे मंच पर उपस्थिति दर्ज कराई.....
श्रीकांत जी, आप मेरी तारीफ़ न किया करें, अच्छा नही लगता....मौन को कुछ कहने दें..ऐसी बड़ी-बड़ी बातें लिखेंगे तो मैं ज्यादा दूर कैसे जा पाउँगा...(बहुत-बहुत शुक्रिया....)
शैलेश जी, मुझे तो लगता है कि अब आपको भी समीक्षा का आधा जिम्मा बाँट लेना चाहिए...

निखिल आनंद गिरि

Satish का कहना है कि -

मेरे पहले प्रयासका स्वागत देख उत्साह बढ़ा, सभीका आभारी हूँ!

सतीश वाघमारे.

akbagaria का कहना है कि -

kavi raj bahoot mehanat ker rahe ho.
Ashok Bagaria

Someshwar का कहना है कि -

आप सभी सुधि पाठकों का मैं आभार मानता हूँ जिन्होंने मेरे इस छोटे से पर्यास को समय दिया और अपनी राय भी दी | यूँ ही उस दिन मैं नेट पर था और हिन्दयुग्म पर पहुँच गया और आप सब से परिचय हो गया और मैंने तुरंत मुखौटे पर जो मन में आया लिख दिया संचालकों ने इसे स्नेह देकर प्रकाशित किया मैं उन सबका भी आभारी हूँ | सभी रचनाकारों को उनके उत्कृष्ट प्रयासों के लिए बधाई |

एकबार फ़िर सभी सुधिजनों. का धन्यवाद |
सादर आपका

Alpana Verma का कहना है कि -

bahut hi anootha ank laga.
ek vishay par 25 kavitayen lagata hai ki ek kitab hi pad rahi hun---

main nikhil giri ji ki baat se sahmat hun ki kya hi achcha hota agar hum ko har rachna par ippani karne ka mauka mil pata--

-bahut hi badeeya raha yeh ank-25 vividh ruup mukhoton ke dekhne ko mile--
badhayee-
dhnyawaad--
Alpana verma

Poonam Agrawal का कहना है कि -

Behad khubsurat vishay,
anuthe mukhote....vo bhi ek nahi pure 25. Harek ka ek alag prayaas.Yeh ek ank nahi ek mukhote ke vibhinn rang hai.Her rang ki apni ek kahaani.

Gungunane ki baat kyaa ki
geeto ne sur ko badal liya.

Savarnaa chaha jab kabhi,
aine ne khud ko badal liya.

Muskuraane ke baat kya ki,
Mukhoto ne mukh ko badal liya.....


Sabhee kavi mitra badhai ke patra hai.Sadhanyavad...

सुनीता का कहना है कि -

सभी कवि एवं कवियात्रिओं को बधाई ! मैं आज ये ख़ास टिपण्णी स्मिता तिवारी जी के लिए लिख रही हूँ....आज तक जितनी भी तस्वीरें इन्होने बनाई सभी के सभी सराहनीय है...ज्ञान और कल्पना को संवेदना और बुद्धि से रंजित करती इनकी तस्वीरें कभी-कभी बोल पड़ती हैं .आप की चित्रकारी निस्दंदेह उत्कृष्ट है और प्रशंसनीय है .....
सुनीता यादव

Bhupendra Raghav का कहना है कि -

तरह तरह के भाव लिये जैसे सारी कवितायें है वैसे ही तरह तरफ के भाव लिये ये मुखौटे, बहुत बहुत बधाई स्मिता जी.. सभी भावों को बहुत अच्छे से उभारा है...
-नमस्कार
-राघव्

sahil का कहना है कि -

स्मिता जी इस बार आप कुछ देर से रहीं पर दुरुस्त रहीं.अब मुखौटे का मुखौटा कुछ बदला बदला सा है
धन्यवाद
अलोक सिंह "साहिल"

श्रीकान्त मिश्र 'कान्त' का कहना है कि -

स्मिता तिवारी जी

इस बार आपकी देर से उपस्थिति ने सभी को यह स्मरण कर दिया कि हिंद युग्म पर आपकी अनिवार्यता क्या है

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)