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Wednesday, November 28, 2007

मुझे क्या पता


तुम्हारा कहा बस किये जा रहा हूँ।
मुझे क्या पता क्यूँ जिये जा रहा हूँ।।

तुम्हें भूल जाऊँगा मैंने कहा था,
न यादों में लाऊँगा मैंने कहा था,
मगर माफ करना मुझे मेरे हमदम,
तुम्हें याद अब भी किये जा रहा हूँ।

अभी याद आती हैं वो तेरी बातें,
वो होठों की बंदिश,जन्नत सी आँखें,
भरोसा रखो मुझपे ऐ मेरे दिलवर,
मैं गैरों से बातें किये जा रहा हूँ।

नहीं तुमसे मिलना नहीं बात करना,
नहीं ख़त का लिखना नहीं याद करना,
सदा रहना खुश अब तो मैं भी सुखी हूँ,
कि सागर पे सागर पिये जा रहा हूँ।

तुम्हारा कहा बस किये जा रहा हूँ।
मुझे क्या पता क्यूँ जिये जा रहा हूँ।।

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10 कविताप्रेमियों का कहना है :

Anish का कहना है कि -

pankaj achaa hai dost.
lekin naya kam laga..
keep writing..
avaneesh tiwaree

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

पंकज जी

सारे कोमल शब्द और कोमल भाव। मनभावन और गेय रचना है।

*** राजीव रंजन प्रसाद

रंजू का कहना है कि -

सुंदर भाव है !!

सजीव सारथी का कहना है कि -

तुम्हें भूल जाऊँगा मैंने कहा था,
न यादों में लाऊँगा मैंने कहा था,
मगर माफ करना मुझे मेरे हमदम,
तुम्हें याद अब भी किये जा रहा हूँ।
सच है. काश की भूल पाना इतना आसान होता .....

Anonymous का कहना है कि -

:)

मज़ेदार है

Bharati का कहना है कि -

accha hai.
bharati tiwaree

Bhupendra Raghav का कहना है कि -

पंकज जी,

एक तो प्यारी रचना और उसपर प्यारे भाव.
एक शब्द में बोलूँ तो कविता लाजवाब...

बधाई.....

दिवाकर मणि का कहना है कि -
This comment has been removed by the author.
दिवाकर मणि का कहना है कि -

पंकजजी,
सदा रहना खुश अब तो मैं भी सुखी हूँ,
कि सागर पे सागर पिये जा रहा हूँ।

क्या बात है!!
कथ्य की गेयात्मकता आकर्षित करती है. आगे आपसे और भी सुनने-पढ़ने को मिलेगा. इसी आशा के साथ.............
तुम्हारा कहा बस किये जा रहा हूँ।
मुझे क्या पता क्यूँ "लिखे" जा रहा हूँ।।

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

पिए जाइए।

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