Monday, November 05, 2007

दशम् यूनिकवि एवम् यूनिपाठक प्रतियोगिता के परिणाम

ओ आस्था के अरुण!
हाँक ला
उस ज्वलन्त के घोड़े
खूँद डालने दे
तीखी आलोक-कशा के तले तिलमिलाते पैरों को
नभ का कच्छा आँगन!

बढ़ आ, जयी !
सँभाल चक्रमण्डल यह अपना

('कितनी नावों में कितनी बार' से)


प्रत्येक माह हिन्द-युग्म भी हिन्दी काव्य के नवअरुणों का आव्हान करता है। अक्टूबर माह में हमने दसवीं बार 'हिन्द-युग्म यूनिकवि एवम् यूनिपाठक प्रतियोगिता' के माध्यम से कविता के नव हस्ताक्षरों से उनका चक्रमण्डल सँभालने की गुहार की थी।

३४ कवियों ने हमारी पुकार सुनी। हर बार की तरह इन कवियों के ज्वलन्त घोड़ों ने ४ चरणों के ७ जजों के साथ दौड़ लगाई। २२ कविताएँ दूसरे दौर में पहुँचीं, १५ तीसरे में, तो १० अंतिम में।

अंत में बचे रह गये, अपनी पताका 'कवि की बेटी' के साथ अक्टूबर माह के यूनिकवि अभिषेक पाटनी

यूनिकवि- अभिषेक पाटनी

जन्मतिथि- १८ सितम्बर १९७७

शिक्षा- 'पत्रकारिता व जन्सम्प्रेषण' में स्नात्कोत्तर (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी)
हिन्दी-साहित्य में सनात्कोत्तर (पटना विश्वविद्यालय, पटना)

उपलब्धियाँ- राँची स्थित स्पेनिन संस्था द्बारा 'स्पेनिन सृजन सम्मान २००७' से सम्मानित
तमाम हिन्दी साहित्यिक पत्रिकाओं में कविताएँ, कहानियाँ व निबंध प्रकाशित

रुचियाँ- रचनात्मक लेखन और गीत-संगीत सुनना।

उद्देश्य- पत्रकारिता के माध्यम से समाज के विस्थापित नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना

स्थायी पता- क्वार्टर न0 - १२, रोड न0 -३, श्री कृष्ण नगर, पटना (बिहार)-८००००१

पत्राचार पता- बी- १३, प्रथम तल, सेक्टर - १५, अलका सिनेमा के पीछे, नोएडा (उत्तर प्रदेश)-२०१३०१

ईमेल- patni12@gmail.com, मोबाइल-९९७१५८१७१४

पुरस्कृत कविता- कवि की बेटी

कवि की बेटी
उसके लिये तो
जन्म से ही
श्रंगारिक स्रोत थी
कभी अल्हड़
कभी नवयौवना
कभी प्रौढ़ा
और
कभी मर्दिनी का
रूप लिये
उसकी तमाम
कविताओं की
अद्वितीय नायिका!

किंतु
उस रूप में
कभी नहीं
ढली
जिस रूप में
कल
बाज़ार में
कुछ लोगों ने
उसे देखा
घूरा
छुआ
और
अंतत: भोगा (?)

जी हाँ! सरेआम
कवि की बेटी
सामूहिक बलात्कार
की शिकार हुई.

कवि ने
अपनी कल्पना में
उसे हर रूप में
ढाला था
रंगा था
पर.....
इस रंग की उसने
कल्पना तक नहीं की थी
(दूसरों के लिये भी नहीं)

उसकी बेटी
उसकी लेखनी से
कई युगों में
ढलती रही
किंतु
इतनी बड़ी नहीं हुई
जितना कल
कुछ लोगों ने
उसे बलात
बना डाला था!

अब वह
शब्दों के ढेर से
कैसे उसकी
तार-तार हुई
ज़िन्दगी को ढाँपेगा?
और
उन कविताओं का
क्या होगा
जिनकी नायिका के
हर रूप में
वह ढली है?

क्या वे कवितायें
फिर पढ़ी जायेंगी?
क्या उन कविताओं को
पढ़ा जा सकता है????




प्रथम चरण के ज़ज़मेंट में मिले अंक- ७, ७॰५,७
औसत अंक- ७॰१७
स्थान- छठवाँ




द्वितीय चरण के ज़ज़मेंट में मिले अंक- ५॰१, ७॰५,
औसत अंक- ६॰३०
स्थान- सातवाँ




तृतीय चरण के ज़ज़ की टिप्पणी-किसी घटना को कविता में ढालना बड़े जोखिम का काम है।जोखिम इसलिए कि सीधे-सीधे विचार या मत प्रकट करना तो बहुत आसान है। बहुत आत्मसात करना होगा। कथ्य का चुनाव नई तरह से किया है। कल्पना का रंग भरने का प्रयास अच्छा है।
अंक- ६॰१
स्थान- छठवाँ




अंतिम ज़ज़ की टिप्पणी-
यह कविता जिन शब्दों में बुनी जानी चाहिये थी, कवि के तेवरों ने वैसा ही प्रस्तुतिकरण किया है। कवि की प्रेरणा, कवि की बेटी की परिणति और फिर यह प्रश्न कि “क्या उन कविताओं को पढ़ा जा सकता है????” उस नासूर की ओर इशारा करता है जो कि हमारे समाज की काया पर है।
कला पक्ष: ८/१०
भाव पक्ष: ८॰५/१०
कुल योग: १६॰५/२०




पुरस्कार- रु ३०० का नक़द ईनाम, रु १०० तक की पुस्तकें और प्रशस्ति-पत्र। चूँकि इन्होंने नवम्बर माह के अन्य तीन सोमवारों को भी अपनी कविताएँ प्रकाशित करने की सहमति जताई है, अतः प्रति सोमवार रु १०० के हिसाब से रु ३०० का नक़द ईनाम और पुस्तक 'कोई दीवाना कहता है' की स्वहस्ताक्षरित प्रति।

यूनिकवि अभिषेक पाटनी तत्व-मीमांसक (मेटाफ़िजिस्ट) डॉ॰ गरिमा तिवारी से ध्यान (मेडिटेशन) पर किसी भी एक पैकेज़ (लक को छोड़कर) की सम्पूर्ण ऑनलाइन शिक्षा पा सकेंगे।




चित्र- जैसाकि हमने उद्‌घोषणा की थी कि इस बार हम टॉप १० की सभी कविताओं पर हमारे चित्रकारों द्वारा चित्र भी प्रकाशित करने की कोशिश करेंगे, तो यूनिकविता पर चित्र बना भेजा है श्रीमती स्मिता तिवारी ने।

पाठकों में भी इस बार पहले से ज्यादा घमासान रहा।

शिवानी सिंह और रणधीर "राज" जिस तरह की विश्लेषात्मक प्रतिक्रियाएँ देने में लगे थे, उससे लग रहा था कि इस बार यूनिपाठक चुनना बहुत मुश्किल होगा, परन्तु पता नहीं क्यों माह के तीसरे पड़ाव पर इनकी प्रतिक्रियाएँ नहीं आईं। हम अनुरोध करेंगे कि आपदोनों पुनः सक्रिय हो जाय।

यूनिपाठिका का ख़िताब इस बार श्रीमती गीता पंडित के नाम जाता है, जिन्होंने हमारी हर एक गतिविधि पर नज़र रखी और हमारा उत्साहवर्धन किया।

यूनिपाठिका- गीता पंडित

परिचय- गीता पंडित का परिचय पढ़िए उन्हीं की जुबानी।

परिचय क्या, एक अनवरत खोज है मेरी, स्वयं को जानने की। जान पाऊँ, तो संभवतः 'उस' को जान पाऊँ जो अभीष्ट है। लेखनी ही माध्यम है इस खोज की। साहित्य साधना है, कर रही हूँ। फलेच्छा क्योंकि गीता-धर्म नहीं है, इसलिये गीता पंडित साधना-रत है, केवल। रसिक हूँ, अतः समय और अवसर मिलते ही संगीत-कार्यक्रमों में सम्मिलित
होने की उत्कंठा बनी रहती है। यदा-कदा नाटकों मे मंच-स्पर्श भी किया। घर की दीवारों पर लगे तैल-चित्रों में अपने ही विचारों को चित्रित कर पाने में अंशतः सफलता मिली। यूँ सफलता तो सागर-शोधन की तरह है।
एम.ए.इंग.(लिट.) और फिर एम.फिल.(लिंग्विस्टिक्स) किया, किंतु रूप गृहिणी का ही है। श्रद्धेय जनक, प्रसिद्ध कवि श्री "मदन शलभ" का वरद-हस्त इस विधा में रत रहने की प्रेरणा रहा है। किसी गीत के पहले दो बोल पिता ने घुट्टी में दे दिये होंगे..... उसी गीत को पूर्ण करने के प्रयास मे लगी हूँ। वो जहाँ हैं, वहीं से मेरे स्व-धर्म और स्व-कर्म पर दृष्टि रखें।
शेष शारदे के हाथ।

संपर्क- १९९ ग्राउंड फ़्लोर, गंगा-लेन, सेक्टर-५, वैशाली (गाजियाबाद)-उत्तर प्रदेश
ईमेल- gieetika1@gmail.com



पुरस्कार- रु ३०० का नक़द ईनाम, रु २०० तक की पुस्तकें और प्रशस्ति पत्र।

पुस्तक 'कोई दीवाना कहता है' की स्वहस्ताक्षरित प्रति। (यह पुरस्कार हमने पिछली बार इन्हें भेजा है, अतः यह पुस्तक हम इस बार तृतीय स्थान के पाठक को भेंट कर रहे हैं)।

यूनिपाठिक गीता पंडित तत्व-मीमांसक (मेटाफ़िजिस्ट) डॉ॰ गरिमा तिवारी से ध्यान (मेडिटेशन) पर किसी भी एक पैकेज़ (लक को छोड़कर) की सम्पूर्ण ऑनलाइन शिक्षा पा सकेंगी।


दूसरे स्थान के पाठक के लिए हमने चुना है समीक्षात्मक टिप्पणियाँ लिखने वालीं पाठिका शिवानी सिंह को। इन्हें पुरस्कार स्वरूप कवि कुलवंत सिंह की काव्य-पुस्तक 'निकुंज' की स्वहस्ताक्षरित प्रति तथा डॉ॰ कुमार विश्वास की काव्य-पुस्तक 'कोई दीवाना कहता है' की स्वहस्ताक्षरित प्रति भेंट की जाती है।

तीसरे स्थान के पाठक के रूप में एक और नया चेहरा हमारे सामने आता है, रणधीर "राज" का। इनके उत्साह का क्या कहें ! इनकी एक एक टिप्पणी कविता का सार-तत्व है। कविताओं को बिलकुल निचोड़ लेते हैं ये। इन्हें भी पुरस्कार स्वरूप कवि कुलवंत सिंह की काव्य-पुस्तक 'निकुंज' की स्वहस्ताक्षरित प्रति तथा डॉ॰ कुमार विश्वास की काव्य-पुस्तक 'कोई दीवाना कहता है' की स्वहस्ताक्षरित प्रति भेंट की जाती है।

अवनीश तिवारी जो कि अनिश के नाम से प्रतिक्रियाएँ करते हैं, हिन्द-युग्म को मिला नया उपहार हैं। हमारी हर गतिविधि पर दृष्टि ही नहीं रखते, बल्कि उनमें भाग भी लेते हैं। इन्होंने बहुत सी टिप्पणियों का उपहार हमें दिया है, हम भी इन्हें चतुर्थ स्थान के पाठक का सम्मान अर्पित करते हैं। कवि कुलवंत सिंह इन्हें अपनी काव्य-पुस्तक 'निकुंज' की स्वहस्ताक्षरित प्रति भेंट करेंगे।

इनलोगों के अतिरिक्त विकास मलिक, रविन्दर टमकोरिया, दिवाकर मणि, आशा जोगलेकर इत्यादि ने हमें पढ़ा, सराहा, सलाह दी। हिन्द-युग्म आप सभी से गुज़ारिश करता है कि हमारे इस सकारात्मक प्रयास में बराबर साथ देते रहें।

साथ ही साथ हम अपने पुराने यूनिपाठकों जैसे सुनील डोगरा 'ज़ालिम', आर्य मनु और कुमार आशीष से अनुरोध करेंगे कि हिन्द-युग्म के निरंतर परिमार्जित करने में हमारा साथ देते रहें।

अभी तक हम परिणाम के साथ शीर्ष ४ कविताएँ प्रकाशित करते थे। लेकिन बहुत से पाठकों की शिकायत थी कि इतनी सारी बातें, कविताएँ और पेंटिंगें एक साथ देखने-सुनने से उनका असली मज़ा चला जाता है। इसलिए हमने निर्णय लिया कि इस बार से हम एक-एक करके कविताएँ, कवियों का परिचय व उनपर बनीं पेंटिंगें प्रकाशित करेंगे।

टॉप १० के अन्य ९ कवियों के नाम जिनमें से शुरू के ६ कवियों को हम डॉ॰ कविता वाचक्नवी की काव्य-पुस्तक "मैं चल तो दूँ" की स्वहस्ताक्षरित प्रति वो क्रमशः ८वें, ९वें और दसवें स्थान के कवियों को सृजनगाथा की ओर से 'विहंग' भेजेंगे, निम्नलिखित हैं-

मंज़िल
तपन शर्मा
अंजलि सोलंकी कठपालिया
कुमार आशीष
कवि कुलवंत सिंह
सुनील प्रताप सिंह (तेरा दीवाना)
सन्नी चंचलानी
रवीन्दर टमकोरिया
सुनीता यादव

टॉप २० के अन्य १० कवियों के नाम जिनकी कविताएँ १-१ करके नवम्बर माह में हिन्द-युग्म पर प्रकाशित होंगी।

हरि एस॰ बाजपेई
श्यामल किशोर झा
पंकज रामेन्दू मानव
अरुण मिश्रा
अनुराधा शर्मा
सुनील डोगरा 'ज़ालिम'
सौम्या अपराजिता
प्रगति सक्सेना
रजनीश सचान
हरिहर झा

उपर्युक्त सभी प्रतिभागी कवियों से निवेदन है कि जिस कविता के साथ आप प्रतियोगिता में भाग लिए थे, कृपया उसे ३० नवम्बर तक अन्यत्र प्रकाशित न करें/करवायें।

निम्न कवियों ने भी प्रतियोगिता में भाग लेकर हमारा हौसला बढ़ाया है। हम इनसे यहीं उम्मीद करते हैं कि वो परिणाम को सकारात्मक लेंगे और बढ़-चढ़कर इस बार भी यूनिकवि प्रतियोगिता में भाग लेंगे।

दिव्या श्रीवास्तव
अमलेन्दु त्रिपाठी
प्रतिष्ठा शर्मा
सुमन कुमार सिंह
दिनेश गहलोत
पारुल्क (पारुल कुमारी)
अभिषेक कुमार
विजय मधू
आशुतोष कुमार मिश्रा (मासूम)
शिवानी सिंह
संदीप सिंह
मनुज मेहता
साधना दुग्गड़
अवनीश एस॰ तिवारी

सभी प्रतिभागियों का बहुत-बहुत धन्यवाद। हिन्दी को जिस ऊर्जा की आवश्यकता है, वो हमें आप सभी से मिल रही है। सहयोग देना ज़ारी रखिए।

नवम्बर माह की 'यूनिकवि एवम् यूनिपाठक प्रतियोगिता' से संबंधित पूरी जानकारी यहाँ है।

34 टिप्पणी:

sunita (shanoo) said...

यूनिकवि की यह कविता वाकई लाजवाब है...जैसे कि कटघरे में खड़ी कोई एक अबोध बालिका...
सचमुच दिल दहला देने वाली कविता थी यह...
आपको बहुत-बहुत बधाई...
गीता जी को भी बहुत-बहुत बधाई...उनकी टिप्पणी हर पाठक का हौंसला बढ़ाती रही है...

Anish said...

अभिषेक को यूनी कवि बनने के लिए बधाई....
आपकी रचना मे नया पन है.
सुंदर ..

अवनीश तिवारी

तपन शर्मा said...

अभिषेक जी, आपने साधारण शब्दों में बहुत कुछ कह डाला। गीता जी, आप पाठकों से ही कवि की कलम मजबूत होती है। हार्दिक बधाई।

Bhupendra Raghav said...

विजेताओं व प्रतियोगियों को बहुत बहुत बधाई

सचमुच गीता जी की हर टिप्पणी उत्प्रेरक रहीं वहीं अभिषेक जी की कविता वाकई लाजवाब..

बधाई हो जनाब...

श्रीकान्त मिश्र 'कान्त' said...

अभिषेक जी एवं गीता जी

आप दोनों का स्वागत अभिनन्दन
यूनिकवि एवं यूनिपाठिका के रूप में कवि की बेटी हृदय को चीर देने वाली रचना है. सारे समाज एवं व्यवस्था से प्रश्न पूछती हुयी. इन प्रश्नों का उत्तर देने के लिये हमारा तथाकथित रचनाकारों का समूह भी क्या सही अर्थों में दायित्व निभा पा रहा है ? यह एक प्रश्न मैं स्वयं से भी पूछता हुआ अनुभव कर रहा हूं.....

क्या रचनाकार मात्र संवेदनाओं का सौदागर ही होता है ? उसका एक नागरिक के रूप में, एक व्यक्ति के रूप में, रचनाधर्मिता से इतर भी कुछ दायित्व युगधर्म के निर्वाह के लिये है ? इन सभी प्रश्नों के बीच... यूनिकवि के रूप में युग्म के मंच पर एक जागरूक संवेदनशील पाठिका के रूप में माननीय गीता जी जो स्वयं भी कवि पुत्री हैं का युग्म पर आना भी शुभ संकेत है

मोहिन्दर कुमार said...

अभिषेक जी,

सुन्दर रचना व यूनीकवि चुने जाने पर बहुत बहुत बधाई. आपकी अन्य रचनाओं की प्रतीक्षा रहेगी.

गीता जी आपकी टिप्पणियां हम सब के लिये अमुल्य हैं..यूनीपाठिका चुने जाने पर बहुत बहुत बधाई. आशा है आप भविष्य में भी इसी तरह हमारा उत्साहवर्धन करती रहेंगी.

anitakumar said...

अभिषेक जी बहुत ही मार्मिक रचना पर जो हथौड़े की तरह पड़ती है, यूनी कवी बनने के लिए बधाई

anitakumar said...

गीता जी आप को भी बधाई

SRIJANSHEEL said...

काव्य में किसी घटना को व्यक्त करने के लिए अभिषेक जी को बधाई
कविता में वर्णित घटना दोबारा न हों इसी कामना के साथ साधुवाद!

कुमार आशीष said...

और
उन कविताओं का
क्या होगा
जिनकी नायिका के
हर रूप में
वह ढली है?
...बाजार तो फिर बाजार ही है, अभिषेक जी।

जबतक रंगों का विचलन है...
पर.....
इस रंग की उसने
कल्पना तक नहीं की थी
(दूसरों के लिये भी नहीं)

इस बार के यूनिकवि एवं यूनिपाठिका गीता पण्डित जी को मेरी बधाई।

pankaj ramendu said...

sabse pahle to sabhi pratibhaiyon ko dher sari badhiyan, zindagi ek prayas hai, aur jo is prayas ko lagatar jari rakhta hai, wo hi safal hai, darasal asafalta to rukna hoti hai, hai zindagi me rukne ka atrh ahi maut. isliye sabhi bhagidar badhai ke patra hain.
abhishek ne apne shabdon ke phoolon ko jis tarah se bhavon ke dhage me priyo hai wo kabil-e-tareef hai.
asli kavi ya lekhak wo hi hai, jo dusre ke dard ko jee sake, kai baar vartni, vyakran se badi hoti hai bhavna.
aap ko dher sari badhaiyan
pankaj ramendu Manav

shobha said...

अभिषेक जी
बहुत-बहुत बधाई । आपने जिस दर्द का चित्रण किया है वह भारत का दुर्भाग्य है । किन्तु बेटी चाहे कवि की हो या
किसी और की - पीड़ा की अनुभूति में कोई अन्तर नहीं होता । बेटी को लेकर दर्द सबका इक सा है । उसका
अपमान पूरी मानवता का अपमान है ।

shobha said...

गीता जी
यूनिपाठिका बनने की बहु-बहुत बधाई ।
स्मिता जी
आपकी कला को नमन ।

tanha kavi said...

अभिषेक जी को यूनि-कवि बनने के लिए बहुत-बहुत बधाई। यूनिकवि प्रतियोगिता को सफल बनाने के लिए अन्य प्रतिभागी कवियों का भी बहुत-बहुत धन्यवाद और हृदय से शुभकामनाएँ।
गीता जी को यूनि-पाठिका बनने की बधाई।

-विश्व दीपक 'तन्हा'

रंजू said...

सबको बहुत बहुत बधाई .....कविता बेटी बहुत दिल को छू लेने वाली है ..
गीता जी की टिप्पणी ने हमेशा सबका होंसला हर जगह बढाया है चाहे वह कविता हो या बाल उद्यान की रचना या फ़िर कोई कहानी उनकी राय हर जगह हमे बहुत सहारा देती है ...सबको के बार फ़िर से हार्दिक बधाई ...

आलोक शंकर said...

abishek aur gita ji dono ko bahut bahut badhaiyaan

Sanjeet Tripathi said...

सभी को बधाई व शुभकामनाएं

pragati "pragsavee" said...

many many congratulations to you Abhishek jee..aapki kavita padhee
jo jhakjhor ke rakh de deti hai..

राजीव रंजन प्रसाद said...

अभिषेक जी एवं गीता जी को हार्दिक बधाई|

*** राजीव रंजन प्रसाद

RAVI KANT said...

अभिषेक जी एवं गीता जी को बधाईयाँ साथ ही अन्य प्रतिभागियों को शुभकामनाएँ। बहुत सही प्रश्न उठाया है अभिषेक जी ने...एक आह सी निकल जाती है पढ़कर...

Neeraj Goswamy said...

यूनी कवि बनने पर अभिषेक जी को हार्दिक बधाई. बहुत शशक्त कविता है उनकी . कम शब्दों मैं बहुत गहरी बात.
गीता जी का परिचय पढ़ कर आनंद आया उनको भी हार्दिक बधाई.
नीरज

सुनील डोगरा ज़ालिम said...

सभी प्रतिभागियों एवं विजेताऒं को बहुत बहुत बधाई।

नमस्कार .... said...

अभिषेक जी ,
सबसे पहले तो मैं आपको यूनिकवि बनने के लिए बधाई दूंगा ....उसके बाद कहना चाहूँगा की जब कवि की रचना इतनी अच्छी हो तो फिर कोई उसे कैसे नकार सकता है ...आप की कविता सचमुच जीत की हकदार है ..आशा करता हूँ , आगे भी आपके द्वारा हमे इसी प्रकार की कवितायें पढने को मिलेंगी....
इसके पश्चात , यूनी पाठक गीता पंडित को भी मेरी और से बधाई ...

निखिल आनन्द गिरि said...

अभिषेक jee....
बेहद उत्कृष्ट रचना के लिए बधाई...मैंने ऐसी रचना बहुत ही कम पढी है....एकदम नए ढंग से बात रखी है आपने....क्या दर्शन है...वाह...
कवि ने
अपनी कल्पना में
उसे हर रूप में
ढाला था
रंगा था
पर.....
इस रंग की उसने
कल्पना तक नहीं की थी
(दूसरों के लिये भी नहीं)

अब वह
शब्दों के ढेर से
कैसे उसकी
तार-तार हुई
ज़िन्दगी को ढाँपेगा?
और
उन कविताओं का
क्या होगा
जिनकी नायिका के
हर रूप में
वह ढली है?

क्या वे कवितायें
फिर पढ़ी जायेंगी?
क्या उन कविताओं को
पढ़ा जा सकता है????

क्या अंदाज़ हैं भाई....बेहद गंभीर रचना है....आपके सवाल लाजमी भी हैं और कचोटने वाली भी..क्या कहूँ...मैं हिल गया....आप हिंद युग्म को मिली एक अनुपम भेंट हैं....परिवार में स्वागत...
हिन्दी जिन्दाबाद....
निखिल आनंद गिरि

avinash said...

कवि की बेटी की चीखें सुन पा रहा हूँ. उन कविताओं को अगेर नही पढ़ा जाता टू ये दोषी समाज का एक और अपराध ही होगा. जीवित कविता.

रिपुदमन पचौरी said...

भई ...कवि जी को पुरस्कार मिला है इसलिये मैं भी बधाई दिये देता हूँ। किन्तु अभी कविता को कविता कह देने में कसर बाकी है। प्रयास ज़ारी रखें।

सजीव सारथी said...

सभी विजेताओं को ढेरों बधाइयाँ, आप सबकी दीवाली मंगलमयी हो, युनिपठकों को संख्या मी बदोतरी उत्साहवर्द्धक है, नए प्रतिभागियों को अगली मुठभेड़ के लिए कमर कस लेनी चाहिए

Gita pandit said...

हिन्द-युग्म के साथ-साथ...
आप सभी का बहुत - बहुत धन्यवाद |

यूनिकवि चुने जाने पर ....
अभिषेक जी,
आपको बहुत-बहुत बधाई...
गंभीर - सुंदर रचना.....



स्मिता जी,

आपकी कला के लिये
आपको बहुत-बहुत बधाई |

सभी विजेताओं और
प्रतिभागियों को भी
बधाई

सस्नेह
गीता-पंडित

शैलेश भारतवासी said...

यूनिकवि अभिषेक पाटनी निश्चित रूप से हिन्द-युग्म को मिला अनुपम उपहार हैं।
स्मिता जी की चित्रकारी का मैं हमेशा कायल रहा हूँ, मैं सोच भी नहीं सकता हूँ कि कवि की बेटी की यह तस्वीर वो खिंच देंगी। बहुत-बहुत साधुवाद उनकों।

सभी प्रतिभागियों का आभार कि हिन्द-युग्म की गतिविधियों में सक्रियता से भाग लेकर उत्साहवर्धन कर रहे हैं।

गीता पंडित जी ने अपना परिचय बहुत सुंदर ढंग से दिया है। हिन्द-युग्म के लिइ पाठक बहुत अधिक महत्वपूर्ण है, और यूनिपाठक तो हिन्द-युग्म का सभी कामों का नतीज़ा होते हैं।

सभी पाठकों का धन्यवाद।

parul k said...

abhishek ji ko bahut badhaayi....kavitaa dil tak utar gayii...peedaa ruuh tak mehsus kii magar FLOW kii kami akhar gayii...

आर्य मनु said...

अभिषेक जी एवं गीता जी,

आप दोनों को हार्दिक बधाई ।हर बार की तरह इस बार भी १ स्थान पर आई रचना कालजयी है। इस रचना ने हर एक शब्द पर द्रवित किया । कवि की बेटी में सभी ने अपने अपने मनानुरुप चरित्र देखे, पर मुझे तो वो कन्याभ्रूण दिखाई दिये जो, हमारे शहर की फतहसागर झील मे तैर रहे थे॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰

शैलेश जी, बहुत मन करता है कि अपनी टिप्पणियाँ जारी रखूँ, पर हमारे डायरेक्टर सा' ने ऐसी जगह ड्यूटी लगा रखी है, जहां, इंटरनेट के दर्शन तक नही होते, केफे की आदत है नही, इसलिये थोडी परेशानी है।
फिर भी आपके अनुनय का पूरी विनम्रता के साथ सम्मान करूंगा ।आप ने मुझे पुनः याद किया, मेरे लिये ये ही काफी था ।
पुनश्च बधाई व आभार,

आर्यमनु, उदयपुर ।

anuradha srivastav said...

विजेताओं व प्रतियोगियों को बहुत बहुत बधाई

alok kumar said...

saAbhishek ji Tabaah kar diya apne to.Itni lomharshak aur dahla dene wali kavita............Behatarin.......
aj mere man mein bahut kuchh kahne ki vyakulta hai par kah kuchh nahi pa raha hun.samasya yeh nahi hai ki kya kahun dikkat yeh hai ki kya kya kah dun.
Baat karein apki SMITA Ji to mere jaison ke liye to behtar yahi hoga ki hum apke vishay me kuchh kahe hi na kyonki..................apone tute fute alfajon se apko Navaj kar apki Tauhin nahi karna chahta.apke liye sirf SADHUWAAD....................

Anonymous said...

कविता पढी बहुत अच्छी लगी

दुर्गा प्रसाद