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Sunday, November 04, 2007

मैं......(अन्तिम भाग)


..मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ॥
कुछ शब्द हाँफते चले आ रहे हैं
..हाँफते शब्द मेरे ही हैं शायद॥

ऐसा क्यों होता है कि,
मैं आंखें मूंदता हूँ जब भी॥
अतीत गड़ता है आंखों में...
जैसे आईने के पेड़ उगते हों
मेरी आंखों में, सपनों की जगह...

मेरे शब्दों ने चुपके से एक टुकडा उठाया है आईने का.....
और उनकी हथेली लहूलुहान हो गयी है...

मेरे शब्द भाग रहे हैं॥
उनके तलवे छिल रहे हैं !!
पूरी ज़मीन पर टुकड़े-टुकड़े हो कर गिरे हैं अतीत के हिस्से...

शब्द हाँफते हैं
क्यूंकि उन्हें डर है
ये हिस्सों में बँटा अतीत
लहूलुहान न कर डाले वर्तमान को....

शब्द हाँफते हैं
क्यूंकि उन्हें पता है.......
लहूलुहान वर्तमान का भविष्य कैसा होगा....

निखिल आनंद गिरि
+919868062333

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16 कविताप्रेमियों का कहना है :

गौरव सोलंकी का कहना है कि -

..मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ॥
कुछ शब्द हाँफते चले आ रहे हैं
..हाँफते शब्द मेरे ही हैं शायद॥

मार्मिक 'मैं'...
प्रभावित करने वाली कविता।

सजीव सारथी का कहना है कि -

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति, स्पर्श करने वाली कविता

रंजू का कहना है कि -

बहुत खूब निखिल ...

मेरे शब्दों ने चुपके से एक टुकडा उठाया है आईने का.....
और उनकी हथेली लहूलुहान हो गयी है...

बात है इस रचना में ...सुंदर अभिव्यक्ति

आलोक शंकर का कहना है कि -

निखिल अच्छी रचना है ! बहुत अच्छे !!

बाल किशन का कहना है कि -

कुछ बात है कि कविता पढ़ते रहे तुम्हारी
यूं ही नही comments बरसे पोस्ट पे तुम्हारी."

shobha का कहना है कि -

शब्द हाँफते हैं
क्यूंकि उन्हें पता है.......
लहूलुहान वर्तमान का भविष्य कैसा होगा....
अच्छा लिखा है निखिल ।

Anish का कहना है कि -

सुंदर रचना है निखील जी,
बधाई.
अवनीश तिवारी

Gita pandit का कहना है कि -

निखिल जी,


सुंदर रचना ....
मार्मिक अभिव्यक्ति

बधाई.

RAVI KANT का कहना है कि -

निखिल जी,
अच्छी रचना के लिए बधाई।

अतीत गड़ता है आंखों में...
जैसे आईने के पेड़ उगते हों
मेरी आंखों में, सपनों की जगह...

सुन्दर प्रयोग है।

मोहिन्दर कुमार का कहना है कि -

निखिल जी,
सुन्दर लिखा है.. शायद आपने अतीत को ही शब्द कहा है..

"जैसे आईने के पेड़ उगते हों"

मेरे विचार से उपरोक्त पंक्ति में आईने की जगह यदि कांच शब्द प्रयुक्त होता तो अधिक उपयुक्त रहता..

बधाई

tanha kavi का कहना है कि -

अतीत गड़ता है आंखों में...
जैसे आईने के पेड़ उगते हों
मेरी आंखों में, सपनों की जगह...

मेरे शब्दों ने चुपके से एक टुकडा उठाया है आईने का.....
और उनकी हथेली लहूलुहान हो गयी है...

टुकड़े-टुकड़े हो कर गिरे हैं अतीत के हिस्से...

लहूलुहान न कर डाले वर्तमान को....

शब्द हाँफते हैं
क्यूंकि उन्हें पता है.......
लहूलुहान वर्तमान का भविष्य कैसा होगा....

क्या कहूँ निखिल जी,
मैं अवाक-सा पडा हूँ आपकी रचना पढकर । हर भाव को आपने बड़ी हीं खूबसूरती से गढा है। हृदय बाग-बाग हो गया।
बधाई स्वीकारें।

-विश्व दीपक 'तन्हा'

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

निखिल जी,

कुछ शब्द हाँफते चले आ रहे हैं
..हाँफते शब्द मेरे ही हैं शायद॥

मेरे शब्दों ने चुपके से एक टुकडा उठाया है आईने का.....
और उनकी हथेली लहूलुहान हो गयी है...

मेरे शब्द भाग रहे हैं॥
उनके तलवे छिल रहे हैं !!
पूरी ज़मीन पर टुकड़े-टुकड़े हो कर गिरे हैं अतीत के हिस्से...

शब्द हाँफते हैं
क्यूंकि उन्हें पता है.......
लहूलुहान वर्तमान का भविष्य कैसा होगा....

बेहतरीन रचना, बहुत बधाई|

*** राजीव रंजन प्रसाद

सुनील डोगरा ज़ालिम का कहना है कि -

कौन हांफता है? शब्द, हाथ या फिर 'मैं'!

बहुत खूब।

Avanish Gautam का कहना है कि -

शब्द अतीत से भाग नहीं सकते निखिल जी उन्हें मज़बूत बनना होगा.

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

हर ज़मीर वाले के साथ ऐसा ही होता है। आप भूत, वर्तमान और भविष्य की समीक्षा करने लगे हैं, आगे आफ हिन्दी जगत को सच्चा साहित्य देंगे।

"राज" का कहना है कि -

""मेरे शब्दों ने चुपके से एक टुकडा उठाया है आईने का.....
और उनकी हथेली लहूलुहान हो गयी है...


........बहुत अच्छी लगी...


मेरे शब्द भाग रहे हैं॥
उनके तलवे छिल रहे हैं !!
पूरी ज़मीन पर टुकड़े-टुकड़े हो कर गिरे हैं अतीत के हिस्से...

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आपने एक शब्द..""शब्द"" को लेके "मैं" के अन्तिम भाग को और भी खुब्शूरत बना दिया है...
बधाई!!!

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