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ख्याल बचपने से कभी चंबल नहीं होते


प्रकाश बादल बे-बहर ग़ज़ल लिखते हैं, लेकिन इनके तेवरों से सदा से ही हमारे निर्णायकों को प्रभावित करते रहे हैं। इससे पहले भी इनकी एक इसी तरह की रचना प्रकाशित हो चुकी है।

पुरस्कृत रचना

चिकने चेहरे इतने भी सरल नहीं होते।
ये वो मसले हैं जो आसानी से हल नहीं होते।

कुछ ही पलों की चमक और खुशबू इनकी,
ये फूल किसी का कभी संबल नहीं होते।

भूखों में बाँट दीजिए जो बचा रखा है,
जीवन के हिस्से में कभी कल नहीं होते।

शायर वो क्या, क्या उनकी शायरी,
जो ख़ुद झूमती हुई ग़ज़ल नहीं होते।

कोख़ मां की किसी को न जब तलक मिले,
बीज कैसे भी हों, फ़सल नहीं होते।

विवशताओं ने पागल कर दिया होगा,
ख्याल बचपने से कभी चंबल नहीं होते।

जम गई होगी वक्त की धूल वरना,
आईने की प्रकृति में छल नहीं होते।

प्रथम चरण के जजमेंट में मिले अंक- ४॰५, ५॰७५, ७॰२५
औसत अंक- ५॰८३३३
स्थान- पाँचवाँ


द्वितीय चरण के जजमेंट में मिले अंक- ७, ४, ५॰८३३३ (पिछले चरण का औसत
औसत अंक- ५॰६१११
स्थान- दूसरा


पुरस्कार- कवि गोपाल कृष्ण भट्ट 'आकुल' द्वारा संपादित हाडौती के जनवादी कवियों की प्रतिनिधि कविताओं का संग्रह 'जन जन नाद' की एक प्रति।