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Friday, December 31, 2010

कैलेंडर बदलने से पहले


आज, वक्त के इस व्यस्ततम जंक्शन पर
जबकि सबसे सर्द हो चले हैं
गुजरते कैलेंडर के आखिरी बचे डिब्बे
जहाँ पर सबसे तंग हो गयी हैं
धुंध भरे दिनों की गलियाँ
और सबसे भारी हो चला है
हमारी थकी पीठों पर अंधेरी रातों का बोझ
और इन रातों के दामन मे
वियोग श्रंगार के सपनों का मीठा सावन नही है
इन जागती रातों की आँखों मे
हमारी नाकामयाबी की दास्तानों का बेतहाशा नमक घुला है
इन रातों के बदन पर दर्ज हैं इस साल के जख्म
वो साल
जो हमारे सीनों पर से किसी नान-स्टॉप ट्रेन सा
धड़धड़ाता गुजर गया है

और इससे पहले कि यह साल
आखिरी बूंदे निचोड़ लिये जाने के बाद
सस्ती शराब की खाली बोतल सा फेंक दिया जाय
कहीं लाइब्रेरी के उजाड़ पिछवाड़े मे
हम शुक्रिया करते हैं इस साल का
कि जिसने हमें और ज्यादा
बेशर्म, जुबांदराज और खुदगर्ज बना दिया
और हमें जिंदगी का वफ़ादार बनाये रखा

इस साल
हम शुक्रगुजार हैं उन प्रेमिकाओं के
जिन्होने किसी मुफ़लिस की शरीके-हयात बनना गवारा नही किया
हम शुक्रगुजार हैं उन नौकरियों के
जो इस साल भी गूलर का फूल बन कर रहीं
हम शुक्रगुजार हैं उन धोखेबाज दोस्तों के
जिन्होने हमें उनके बिना जीना सिखाया
हम शुक्रगुजार हैं जिंदगी के उन रंगीन मयखानों के
जहाँ से हर बार हम धक्के मार के निकाले गये
हम शुक्रगुजार हैं उन क्षणजीवी सपनों का
जिनकी पतंग की डोर हमारे हाथ रही
मगर जिन्हे दूसरों की छतों पर ही लूट लिया गया
उन तबील अंधेरी रातों का शुक्रिया
जिन्होने हमें अपने सीने मे छुपाये रखा
और कोई सवाल नही पूछा
उन उम्रदराज सड़कों का शुक्रिया
जिन्होने अपने आँचल मे हमारी आवारगी को पनाह दी
और हमारी नाकामयाबी के किस्से नही छेड़े !

और वक्त के इस मुकाम पर
जहाँ उदास कोहरे ने किसी कंबल की तरह
हमको कस कर लपेट रखा है
हम खुश हैं
कि इस साल ने हमें सिखाया
कि जरूरतों के पूरा हुये बिना भी खुश हुआ जा सकता है
कि फ़टी जेबों के बावजूद
सिर्फ़ नमकीन खुशगवार सपनों के सहारे जिंदा रहा जा सकता है
कि जब कोई भी हमें न करे प्यार
तब भी प्यार की उम्मीद के सहारे जिया जा सकता है

और इससे पहले कि यह साल
पुराने अखबार की तरह रद्दी मे तोल दिया जाये
हम इसमें से चंद खुशनुमा पलों की कटिंग चुरा कर रख लें
और यह याद रखें
खैरियत है कि उदार संगीनों ने
हमारे सीनों का पता नही मांगा
खैरियत है कि जहरीली हवाओं ने
हमारी साँसों को सिर्फ़ चूम कर छोड़ दिया
खैरियत है कि मँहगी कारों का रास्ता
हमारे सीनों से हो कर नही गुजरा
खैरियत है कि भयभीत सत्ता ने हमें
दुश्मन बता कर हमारा शिकार नही किया
खैरियत है कि कुपोषित फ़्लाईओवरों के धराशायी होते वक्त
उनके नीचे सोने वालों के बीच हम नही थे
खैरियत है कि जो ट्रेनें लड़ीं
हम उनकी टिकट की कतार से वापस लौटा दिये गये थे
खैरियत है कि दंगाइयों ने इस साल जो घर जलाये
उनमे हमारा घर शामिल नही था
खैरियत है कि यह साल भी खैर से कट गया
और हमारी कमजोरी, खुदगर्जी, लाचारी सलामत रही

और हमें अफ़सोस है
उन सबके लिये
जिन्हे अपनी ख्वाहिशों के खेमे उखाड़ने की मोहलत नही मिली
और यह साल जिन्हे भूखे अजगर की तरह निगल गया
और इससे पहले कि यह साल
इस सदी के जिस्म पर किसी पके फ़फ़ोले सा फूटे
आओ हम चुप रह कर कुछ देर
जमीन के उन बदकिस्मत बेटों के लिये मातम करें
जिनका वक्त ने खामोशी से शिकार कर लिया

आओ, इससे पहले कि इस साल की आखिरी साँसें टूटे
इससे पहले कि उसे ले जाया जाय
इतिहास की पोस्टमार्टम टेबल पर
हम इस साल का स्यापा करें
जिसने कि हमारी ख्वाहिशों को, सपनों को बाकी रखा
जिसने हमें जिंदा रखा
और दम तोड़ने से पहले
अगले साल की गोद के हवाले कर दिया

आओ हम कैलेंडर बदलने से पहले
दो मिनट का मौन रखें


 अपूर्व शुक्ल

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10 कविताप्रेमियों का कहना है :

प्रवीण पाण्डेय का कहना है कि -

कितना कुछ समेटे है समय।

धर्मेन्द्र कुमार सिंह ‘सज्जन’ का कहना है कि -

अच्छी कविता है मगर बेवजह बहुत लम्बी हो गई। मुझे अपना एक हाइकु याद आ गया।

ढूँढे ना मिली
खो गई है कविता
शब्दों की गली

खुशदीप सहगल का कहना है कि -

सुदूर खूबसूरत लालिमा ने आकाशगंगा को ढक लिया है,
यह हमारी आकाशगंगा है,
सारे सितारे हैरत से पूछ रहे हैं,
कहां से आ रही है आखिर यह खूबसूरत रोशनी,
आकाशगंगा में हर कोई पूछ रहा है,
किसने बिखरी ये रोशनी, कौन है वह,
मेरे मित्रो, मैं जानता हूं उसे,
आकाशगंगा के मेरे मित्रो, मैं सूर्य हूं,
मेरी परिधि में आठ ग्रह लगा रहे हैं चक्कर,
उनमें से एक है पृथ्वी,
जिसमें रहते हैं छह अरब मनुष्य सैकड़ों देशों में,
इन्हीं में एक है महान सभ्यता,
भारत 2020 की ओर बढ़ते हुए,
मना रहा है एक महान राष्ट्र के उदय का उत्सव,
भारत से आकाशगंगा तक पहुंच रहा है रोशनी का उत्सव,
एक ऐसा राष्ट्र, जिसमें नहीं होगा प्रदूषण,
नहीं होगी गरीबी, होगा समृद्धि का विस्तार,
शांति होगी, नहीं होगा युद्ध का कोई भय,
यही वह जगह है, जहां बरसेंगी खुशियां...
-डॉ एपीजे अब्दुल कलाम

नववर्ष आपको बहुत बहुत शुभ हो...

जय हिंद...

डिम्पल मल्होत्रा का कहना है कि -

नये साल की गज़ब शुरुआत :)
सीधी सरल भाषा में एक संवेदनशील कविता..
कैलेंडर के पन्ने बदलना फिर भी आसान है पर इतना आसान नहीं किसी के विचारों या मनोवृतियों का बदलना...क्यों जो इंसान की फितरत कैलेंडर का कोई पृष्ठ नहीं..फिर भी उम्मीद रखते हुए २ मिनट का मौन तो रख ही लेते है..

हिमानी का कहना है कि -

अच्छा इयर एंडर तैयार किया है अपूर्व ji

अश्विनी रॉय “प्रखर” का कहना है कि -

“और हमें अफ़सोस है
उन सबके लिये
जिन्हे अपनी ख्वाहिशों के खेमे उखाड़ने की मोहलत नही मिली
और यह साल जिन्हे भूखे अजगर की तरह निगल गया
और इससे पहले कि यह साल
इस सदी के जिस्म पर किसी पके फ़फ़ोले सा फूटे
आओ हम चुप रह कर कुछ देर
जमीन के उन बदकिस्मत बेटों के लिये मातम करें
जिनका वक्त ने खामोशी से शिकार कर लिया” ऐसा लगता है कि ये बेहद लंबी कविता कोई अफ़सोस प्रकट करती हुई रचना है. सारी दुनिया जहां नए साल के आगमन का स्वागत करती है, वहीँ इसमें मातम मनाने की बात कही गई है. जीवन और मृत्यु का क्रम तो चलता ही रहता है लेकिन प्रदर्शन केवल खुशी का होता है, अफ़सोस करने का नहीं. कवि का यह नजरिया सरासर गलत प्रतीत होता है क्योंकि अगर आप हँसतें हैं तो दुनिया आपका साथ देगी और अगर रोयें तो शायद कोई भी आपका साथ नहीं देगा. ऐसा लगता है कि हिंद-युग्म पर कविता प्रकाशित होने पर बिना-वजह तारीफ़ करने का चलन सा हो गया है. अगर हिंद-युग्म को नए साल के शुरू में स्यापा ही करना या करवाना है तो भला हम क्या कह सकते हैं? अब इस नेक काम में जो साथ देना चाहें, वो जरूर आगे आयें ! मुझे तो इस कविता में कुछ भी काबिले-तारीफ़ नहीं लगा.

डिम्पल मल्होत्रा का कहना है कि -

कविता में सिर्फ so called स्यापा ही नही किया गया इसमें चंद खुशनुमा पलों की कटिंग चुरा कर रख लेने की बात भी की गयी है कुछ कडवे सच जिन से हम आँखे चुरा लेना चाहते है उनको बयां किया है पर खैरियत के साथ.सपनो को जिन्दा रखने की बात की है...पर चीज़ को देखने का हर व्यक्ति का अपना नजरिया होता है...:)

निर्मला कपिला का कहना है कि -

समय को समेटने का अच्छा प्रयास। आपको भी सपरिवार नये साल की हार्दिक शुभकामनायें।

अश्विनी रॉय “प्रखर” का कहना है कि -

कुछ लोग दूसरों की टिप्पणी पर अपनी टिप्पणी देने से कभी नहीं चूकते, भले ही इस की कहीं कोई आवश्यकता ही न हो. ऐसे व्यक्ति से मैं सिर्फ एक ही बात पूछना चाहता हूँ कि क्या किसी जगह शादी के जश्न में लोग अपने पुरखों को याद करके दो मिनट का मौन रखते हैं? यदि हाँ, तो मैं अपनी टिप्पणी वापिस ले लूंगा.

sada का कहना है कि -

सुन्‍दर शब्‍दों का संगम ..इस अभिव्‍यक्ति में ।

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