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Wednesday, July 14, 2010

लड़ाइयों में क्रमशः


जून माह की प्रतियोगिता की नौवीं कविता प्रभा मुजुमदार (मजूमदार) की है। प्रभा पिछले 3-4 महीनों से हिन्द-युग्म को लगातार पढ़ रही हैं। ये कविता-मंच के उन ईमेल सब्सक्राइबरों में से एक हैं जो पढ़कर ईमेल के माध्यम से प्रतिक्रिया ज़रर देती हैं। हिन्द-युग्म पर पहली बार इनकी कविता प्रकाशित हो रही है। 10 अप्रैल 1957 को इंदौर (म॰ प्र॰) में जन्मी प्रभा ने एम.एससी. पीएच.डी.(गणित) तक की शिक्षा प्राप्त की है। तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग के आगार अध्ययन केन्द्र, अहमदाबाद में कार्यरत प्रभा मजूमदार का पहला काव्य संग्रह ‘अपने अपने आकाश’ अगस्त 2003 में और दूसरा काव्य-संग्रह ‘तलाशती हूँ जमीन’ 2009 में प्रकाशित हुआ। विभिन्न साहित्यिक पत्रिकाओं ‘वागर्थ’, ‘प्रगतिशील वसुधा’, ‘नवनीत’, ‘कथाक्रम’, ‘आकंठ’, ‘उन्नयन’, ‘संवेद वाराणसी’, ‘देशज’, ‘समकालीन जनमत’, ‘वर्तमान साहित्य’, ‘अहमदाबाद आकार’, ‘देशज’, ‘पाठ’, ‘लोकगंगा’, ‘समरलोक’, ‘समय माजरा’ अभिव्यक्ति अक्षरा उदभावना आदि में प्रकाशित। नेट पत्रिकाओं ‘कृत्या’, ‘सृजनगाथा’, ‘साहित्यकुंज’ मे प्रकाशन। आकाशवाणी एवं दूरदर्शन से कविताओं का प्रसारण।
सम्पर्क: डॉ. प्रभा मुजुमदार, ए-3,अनमोल टावर्स, नारानपुरा, अहमदाबाद-380063.
दूरभाष: 079-27432654

पुरस्कृत कविता: क्रमशः

अक्सर
बड़ी होती हैं
छोटी-छोटी लड़ाइयाँ
किसी भी बड़ी लडाई के मुकाबले।
कभी खत्म न हो सकने वाली
किसी भी निर्णय
अथवा मुकाम पर
न पहुँचा सकने वाली
महत्त्वहीन-सी
अचर्चित
इतिहास के पन्नों पर
दर्ज न हो सकने वाली।
इन लड़ाइयों में
नहीं बहता रक्त
न ही बिछती लाशें
प्रयोग नहीं होती
बंदूक और गोलियाँ
बम और ग्रेनेड
फिर भी कितनी मारक
अपने ही संकल्पों की आँच
अपनी ही आँखों का पानी
फौलाद से इरादे
न थकने वाले हाथ
न थमने वाले कदम
अपने ही भीतर
टूट-फूट/ उधेड़बुन
दुविधा और कशमकश।
रोजमर्रा जिन्दगी की जंग
न मालूम कब-कब
कौन पक्ष कौन प्रतिपक्ष
एक साथ या अलग-अलग।
कब फूँका गया था शंख
कबसे बज रही रणभेरियाँ
मरीचिका की तलाश में
अनवरत दौड़
सत्ता और शक्ति की
खत्म न हो सकने वाली
पिपासा विजय-यात्रा।
अपने ही रचे चक्रव्यूह में
छटपटाहट
जीत का छोटा-सा एक पल
पराजय के लंबे अँधेरे युग
महात्वाकांक्षा के उच्चतर शिखर से
गहरी घाटियों में फिसलन
संत्रास और कड़ूआहट के बीच
चाहत और आस की
छोटी-सी किरण।
बंद दीवारों-दरवाजों पर
दस्तक देती सुबह
फिर सुसज्ज कर देती है
नये संकल्पों के साथ।
चुक जाते है हथियार
बीत जाते है
हार और जीत के पल
गुजर जाते है विजय-जुलूस
लौटती पराजित सेनाएँ भी।
मिट जाते वे पात्र
छोड़ जाते हैं
किसी और के लिये
वही लड़ाई
अनवरत जारी रखने के लिये।

पुरस्कार: विचार और संस्कृति की पत्रिका ’समयांतर’ की एक वर्ष की निःशुल्क सदस्यता।

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7 कविताप्रेमियों का कहना है :

KISHORE KALA का कहना है कि -

बहुत सुंदर और शानदार अभिब्यक्ति की है आपने.चयनकर्ताओं के चयन की दाद देनी होगी
सत्ता और शक्ति की
खत्म न हो सकने वाली
पिपासा विजय-यात्रा।
इसी की बजह से तो फैला है संत्रास्वाद. जिसने नजाने कितने लोगों की जिंदगी बर्बाद कर दी है. आज देस का हर प्रान्त इसी समस्या से जर्जरित है. कवि को बधाई चयनकर्ताओं को भी बहुत-बहुत धन्यवाद.
किशोर कुमार जैन. गुवाहाटी असम

M VERMA का कहना है कि -

मिट जाते वे पात्र
छोड़ जाते हैं
किसी और के लिये
वही लड़ाई
अनवरत जारी रखने के लिये।
यह अनवरतता ही तो है जो हमें धरोहर में मिलती है और कभी कभी हम उन लड़ाईयों के औचित्य को बिना जाने-समझे जुट जाते हैं अपनी तलवारों के जंग को साफ करने में.
सुन्दर भाव और सार्थक सन्दर्भ की रचना
बधाई

निर्मला कपिला का कहना है कि -

बहुत सटीक गहरे भाव लिये उमदा रचना। प्रभा जी को बधाई।

sada का कहना है कि -

गहरे भाव लिये हुये बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

sumita का कहना है कि -

सुन्दर प्रस्तुति...कवयित्री प्रभा जी को बधाई..

डा. अरुणा कपूर. का कहना है कि -

सुंदर रचना से साक्षात्कार हुआ है...बधाई!

निखिल आनन्द गिरि का कहना है कि -

इस कविता में विषय ने बहुत प्रभावित किया....अच्छी कविता है..

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