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Thursday, January 07, 2010

चाहता हूँ


प्रतियोगिता के चौथे पायदान की कविता के रचनाकार चन्द्रकांत सिंह हिन्द-युग्म से काफी समय से जुड़े रहे हैं। इनकी एक कविता गत अक्टूबर माह की यूनिप्रतियोगिता मे तेरहवें स्थान पर रह चुकी है। 1 जून 1984 को सोनभद्र (उ॰प्र॰) में जन्मे चन्द्रकांत जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली से एम॰ फिल की पढ़ाई कर रहे हैं। कविता-लेखन और योग में रुचि रखने वाले युवा कवि चंद्रकांत की कविताएँ ‘वाक्’, ‘समय-सरोकार’, ‘शब्दयोग’, ‘युद्धरत आम आदमी’ में प्रकाशित हो चुकी हैं।

पुरस्कृत कविता- चाहता हूँ

चाहता हूँ जाना गाँव की गलियों में
एक उम्र पड़ी है अभी
दोनों हाथों से पोसना चाहता हूँ
बकरियों, सुग्गों, तीतरों के बच्चों को
अरसे हुए शहर में तप कर पत्थर बन चुका हूँ
गदराहट पाने के लिए
खोए बचपन को फिर से सहलाने के लिए
एक बार आना चाहता हूँ अपने गाँव
वही गाँव जहाँ अब भी मेड़ से होकर
गुजरता है चन्द्रप्रभा का जल
वहीं जहाँ छपक छपक के साथ गायी जाती है कजरी
मेरी शिकस्ता सी आवाज जम चुकी है
चाहता हूँ विदा लेने से पहले
हो आऊँ अपने गाँव
सुन्नर काका की बछिया भी अब
ज़नने का सुख पा चुकी होगी
सहुआईन की बखरी में
सोने के पाट लग चुके होंगे
आखिर टेनी मारकर ही तो कमाई गई है पूंजी
जिससे गाँव प्रधान तक धन्ना सेठ हो गए

अब मोट नहीं चलते तो क्या
पम्पिंग सेट के नीचे बैठ कर नहाऊँगा
हेंगे पर सवार होकर ज़मीन की उर्वरता को थाहूँगा
अब तो कत्तई मन नहीं लगता शहर में
रह रह कर करेजा पकड़ लेता हूँ
हर बखत बस घर की याद आती है


ऊँख का खेत नाच जाता है
जब पटरे पर बैठा-बैठा ऊँघने लगता हूँ
क्या हुआ जो जाने को पैसे नहीं
भला गाँव जाने के लिए
ज़रूरी तो नहीं टमटम की सवारी
पैदल चला जाऊँगा
वैसे भी शहर में
अब दाना पानी नहीं बदा
गाँव जाकर मेहनत मजूरी करके पेट पाल लूँगा
खाली हाथ कभी नहीं गया गाँव
जानता हूँ कि जाते ही बच्चे छोप लेंगे मुझे
मुआ आज लेमनचूस तक की किल्लत है

खैर
आज रीते हाथ ही जाऊँगा
ज़रूरी तो नहीं कि हर बार कुछ लेकर ही जाऊँ
खराई मारकर निकलूँगा तो शाम तक पहुँच ही जाऊँगा अपने गाँव
डारे पर निरखा सुखाती मेरी दस साल की बच्ची
रोज़ अगोरती है बाट
न मालूम वह कैसे
मेरे आने की आहट पा जाती है.
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पुरस्कार- विचार और संस्कृति की मासिक पत्रिका 'समयांतर' की ओर से पुस्तक/पुस्तकें।

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6 कविताप्रेमियों का कहना है :

Devendra का कहना है कि -

सुंदर कव‍िता के बधाई..

हृदय पुष्प का कहना है कि -

ग्रामीण जीवन की जावंत प्रस्तुति, अपनी मिट्टी से जुड़ने की उनकी चाहत और भावनाओं को मेरा नमन - चन्द्रकांत सिंह जी बधाई. साथ ही हिंद युग्म और निर्णायकों को ऐसी रचनाओं जिनकी आज हमें शख्त जरुरत है पुरुष्कृत करने के लिए आभार और धन्यवाद्.

विनोद कुमार पांडेय का कहना है कि -

आप के कविता से गाँव के पावन मिट्टी की खुश्बू आती है जो कही ना कही हम सब जो गाँव से जुड़े है के दिल में एक प्रेम की सुंदर भावनाओं का संचार करती है..शहर की चकाचौंध में डूबा हर शक्स जिसे अपने मिट्टी से प्यार है उसका दिल भर आया होगा आपकी सुंदर कविता को पढ़ने के बाद..सुंदर कविता ..बधाई चंद्रकांत जी

akhilesh का कहना है कि -

har vyakti ke ander ik gaaon rahta hi hai , gar gaao mein paia hua to use bhul nahi sakta aur jo waha nahi paida hota wo kahi na kahi se apne ander ik gaao wasa hi leta hai.

yah is desh ka mool charitra hai , metro sanskriti ise khatm nahi ker paayegi.hum satrahvi floor per rahte hue bhi gaao ke neem ki chao chate hai...

badhyee.

sumita का कहना है कि -

बहुत सुन्दर चाहना है चन्द्रकान्त जी...प्यारी कविता के लिए बधाई!

PADMSINGH का कहना है कि -

शब्द कम हैं रचना के लिए ... बहुत ही सुन्दर रचना
जैसे प्रेमचंद् साकार हो उठे हों .... बहुत बढ़ाई

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