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Thursday, December 06, 2007

प्रतियोगिता की चौथी प्रस्तुति


हम एक-एक करके प्रतियोगिता की कविताएँ प्रकाशित करते हैं, लेकिन हम दूसरी कविता के बाद सीधे चौथी कविता लेकर आये हैं। कारण यह है कि तीसरे स्थान के कवि ऋतुराज की कविता कल ही प्रकाशित होनी थी, लेकिन कल पूरे दिन का इंतज़ार करने के बावज़ूद भी उनका परिचय हमें नहीं प्राप्त हुआ। पिछले २-३ दिनों से कई बार उनके दिये गये मोबाइल नं॰ पर हमारे साथियों ने सम्पर्क किया, लेकिन वो पहुँच से दूर हैं।

अब हम उनके परिचय का टॉप १० कविताओं के प्रकाशित होने तक इंतज़ार करेंगे।

चौथी स्थान पर फ़िर से एक कवयित्री का कब्ज़ा है। कवयित्री दिव्या श्रीवास्तव ने ५ से भी अधिक बार इस प्रतियोगिता में भाग लिया और हर बार इनकी कविता प्रकाशित हुई है, लेकिन टॉप ५ में आने का इनका पहला अवसर है।

परिचय-सुश्री दिव्या श्रीवास्तवा का जन्म कोलकाता महानगर में हुआ था। ४ साल पहले इन्होंने कविता- सृजन आरंभ किया। इस कार्य में उन्हें अपने परिवार का विशेष कर अपने पिताश्री का विशेष सहयोग और प्रोत्साहन मिला। अध्ययन के साथ-साथ साहित्य-सृजन का कार्य भी चलता रहा। कविता के अतिरिक्त व्यंग्य और कथा साहित्य में भी कुछ रचना लिखी हैं। हिंदी साहित्य के प्रति गहरी अभिरुचि और आस्था है। अभी आप मेडिकल (MBBS) की प्रथम बर्ष की छात्रा है।

पुरस्कृत कविता

जीवन, तू मौन है
पर मैं सुनती हूँ
तुझे मौत से प्यार नहीं.........

धवल से वस्त्र धारण
कर टहलती है तू
मैं ही तुझ पर
रंगों के छींटें फेंकती
रहती हूँ
गुदगुदाती हूँ.....तब
तू हंसती है खिलखिलाती है,
जैसे सरिता का कल-कल निनाद!

जीवन, तू ने कितने चेहरे
धारण किये है.....
शायद अनगिनत.....
कुरूप, सुरूप, भयावह
सलोना.......
मैंने कभी तेरे चेहरे
के आकार को चूमा है
कभी दुत्कारा है
कभी लांक्षित किया है....
पर तू सदेव तटस्थ रही है
न आवेग, न अवहेलना
वक़्त के साथ तू
बस चलती रहती है, बस चलती रहती है
ठहरती है तू सिर्फ
मौत के गोद में
जिसको तूने कभी
प्यार नहीं किया.....


जजों की दृष्टि-


प्रथम चरण के ज़ज़मेंट में मिले अंक- ७॰१, ६
औसत अंक- ६॰५५
स्थान- सातवाँ


द्वितीय चरण के ज़ज़मेंट में मिले अंक- ७॰२५, ७॰९५, ५, ६॰५५ (पिछले चरण का औसत)
औसत अंक- ६॰६८७५
स्थान- ग्यारहवाँ


तृतीय चरण के ज़ज़ की टिप्पणी-जीवन पुल्लिंग होता है। कविता में उसे स्त्रीलिंग की तरह बरता गया है। वर्तनी और व्याकरण की अशुद्धियां हैं। सरल शब्दों के प्रयोग का अभ्यास करें।
मौलिकता: ४/२॰५ कथ्य: ३/१॰५ शिल्प: ३/१॰५
कुल- ५॰५
स्थान- छठवाँ


अंतिम ज़ज़ की टिप्पणी-
दर्शन का रचना में अच्छा प्रस्तुतिकरण है। कविता सहजता से ऐसी बात कह जाती है जिसमें पाठक नवीनता तो नहीं पाता किंतु ठहर कर आध्यात्म से सोच को जोड़ता अवश्य है।

कला पक्ष: ६॰५/१०
भाव पक्ष: ६॰५/१०
कुल योग: १३/२०


पुरस्कार- प्रो॰ अरविन्द चतुर्वेदी की काव्य-पुस्तक 'नक़ाबों के शहर में' की स्वहस्ताक्षरित प्रति

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13 कविताप्रेमियों का कहना है :

Kavi Kulwant का कहना है कि -

हिंदयुग्म एक अच्छा कार्य कर रहा है.. इसलिए सराहना करता हूँ..लेकिन आप के कविता निर्णय में कहीं त्रुटियां हैं.. जिससे आप लोग सही राह से भटक जाते हैं..

सजीव सारथी का कहना है कि -

धवल से वस्त्र धारण
कर टहलती है तू
मैं ही तुझ पर
रंगों के छींटें फेंकती
रहती हूँ
गुदगुदाती हूँ.....तब
तू हंसती है खिलखिलाती है,
जैसे सरिता का कल-कल निनाद!
बहुत सुंदर दिव्या जी, कितना सुंदर लिखा है आपने और अंत बेहद अच्छा है .....सुंदर,
हाँ तीसरे judge की टिपण्णी पर गौर कीजियेगा

Kavi Kulwant का कहना है कि -

1. हिंदयुग्म (कार्यकर्ताओं ) का कोई भी सदस्य निर्णय प्रक्रिया से जुड़ा नही होना चाहिए
2. देश के प्राख्यात कवियों को निर्णायक मंडल (८-१०) बनने के लिए अनुरोध किया जाना चाहिए । इन जजों के नाम हिंदयुग्म पर प्रकाशित हों ।
3. सारी कविताओं को प्रति माह ३/४ ( ३/४ यह निर्णय पहले से हो) जजों के पास भेजकर उनका औसत लिया जाना चाहिए..
4. जजों द्वारा अंक देने के लिए मानदण्ड बनाए जाने चाहिएं (जैसे कि ५ अंक भाव, ५ अंक शब्द चुनाव, ५ अंक लेखन शैली, ५ अंक प्रवाह, ५ अंक छंद बद्धता, ५ अंक मौलिक विचार? इत्यादि । कुल मिलाकर ३० अंकों में से अंक दिये जाने चाहिएं ।)
5. प्राप्त सभी जजों के अंको का औसत लेकर एक ही चरण में निर्णय किया जाना चाहिए..

Hind Yugm wrote:
आदरणीय कुलवंत जी,
आपने निर्णय में किस तरह की त्रुतियाँ देखी/पाई हैं, कृपया मार्गदर्शन करें ताकि हम आगे से उन बातों का ख्याल रख सकें।
आभार सहित-
हिन्द-युग्म

Anish का कहना है कि -

दिव्या जी -
आपका प्रयास और रचना दोनों अच्छे है.
पुरस्कार की बधाई.
अवनीश तिवारी

Harihar का कहना है कि -

जीवन, तू ने कितने चेहरे
धारण किये है.....
शायद अनगिनत.....
कुरूप, सुरूप, भयावह
सलोना.......
मैंने कभी तेरे चेहरे
के आकार को चूमा है
कभी दुत्कारा है
कभी लांक्षित किया है....
पर तू सदेव तटस्थ रही है
न आवेग, न अवहेलना
वक़्त के साथ तू
बस चलती रहती है, बस चलती रहती है
ठहरती है तू सिर्फ
मौत के गोद में
जिसको तूने कभी
प्यार नहीं किया.....

बहुत खूब दिव्या जी

मनीष वंदेमातरम् का कहना है कि -

दिव्या जी!

सुंदर प्रयास है आपका।
भविष्य के लिए शुभकामनाएं

seema gupta का कहना है कि -

जीवन, तू मौन है
पर मैं सुनती हूँ
तुझे मौत से प्यार नहीं.........
बहुत अच्छा लिखा है बधाई हो

sahil का कहना है कि -

दिव्या जी सबसे पहले तो आपकी इस सफलता पर मुबारकबाद.
रही बात आपकी कविता की तो जिन खूबसूरत अल्फाजों के साथ आपने जीवन को दर्शाने की कोशिश की है वो काफ़ी प्यारा है.
रही बात कुलवंत जी के विचारों की तो निश्चित तौर पर यह अच्छी बात है की उन्होंने समीक्षात्मक दृष्टि डाली है.हम उनके विचारों की कद्र करते हैं ummid करता हूँ भविष्य में भी वे ऐसा करते रहेंगे.
अलोक सिंह "साहिल"

Bhupendra Raghav का कहना है कि -

दिव्या जी अच्छा प्रयास है..
शुभकामनायें

एस. डी. ज़ालिम का कहना है कि -

बहुत खूब दिव्या जी आपकी कविता सचमुच अच्छी है| इसके लिए आपकॊ बधाई|

जहां तक कवि कुलवंत जी की बात है तॊ मैं समझता हूं कि उनके सुझावॊं पर गौर किया जाना चाहिए लेकिन जजॊं की गॊपनीयता जरूरी है|

शैलेश चन्द्र जम्लोकी (मुनि ) का कहना है कि -

-दिव्या जी
-कविता मै आपने जिंदगी को नए नज़रिये से देखा है...
और जिंदगी के कई रंग देखने को जैसे..

पर मुझे कुछ बातें जरूर कहनी है..
- इस कविता के भाव कुछ इतने घहरे है .. की जन साधारण तक जल्दी नहीं पहुच सकते
मसलन--
"धवल से वस्त्र धारण
कर टहलती है तू"-- मतलब जिंदगी अभी बेरंग है..
"मैं ही तुझ पर
रंगों के छींटें फेंकती
रहती हूँ
गुदगुदाती हूँ.....तब
तू हंसती है खिलखिलाती है,
जैसे सरिता का कल-कल निनाद!"

हम उस जिंदगी के हर पल को ख़ुशी से जी कर.. हर मुस्कुरा कर जी कर.. इस खुशहाल बनाते है
और ये जिंदगी भी खुशहाल बन जाती है...

इतनी बात समझने के लिए मुझे कविता की ये पंक्तिया कई बार पढ़नी पढी

और फिर ये बात मुझे अभी तक समझ नहीं आई की
"जिंदगी को मौत से प्यार नहीं है?"
ये शब्द क्यों कहे गए है?

सादर
शैलेश चन्द्र जम्लोकी (मुनि )

Alpana Verma का कहना है कि -

पुरस्कार के लिए बधाई -
ज़िंदगी के बारे में काफी गूढ़ सोच दर्शाई है---ज़िंदगी जो नीरस और उदास होते हुए भी मौत को प्यार नहीं करती---
जिंदगी को मौत से प्यार नहीं है?"
मुनि जी ने पूछा है कि ये शब्द क्यों कहे गए है? -
मैं यह समझ रही हूँ कि कवियत्री जी को शायद नीरस बेरंग ज़िंदगी में अभी भी कुछ उम्मीद दिखी है जिस से उसे ऐसा लगता है की वो मौत को प्यार कर अपना अंत नहीं चाहती ----और उसके मौन को समझने की कोशिश कर रही है---और कवियत्री यही कहना चाह रही होगी कि जिस जीवन को कविता में प्रस्तुत किया है वह चाहे कितना भी निराश हो पर जीवन जीने की आशा अब भी उस में दिख रही है--
अच्छी कविता बन पड़ी है.

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

कविता से ज्यादा शैलेश जम्लोकी और अल्पना चावला के कमेंट को पढ़ने में सुख मिलता है। जितनी अच्छी विवेचना ये दोनों कर रहे हैं, वो पाठकों कवियों को लाभ ही पहुँचायेगी।

मेरे ख्याल से दिव्या जी को समयानुकूल शब्द चयन करने चाहिए। क्लिष्ट शब्द आपके बातों को सामान्य पाठक से दूर करते हैं, ऊपर से व्याकरण की ऐसी गलती, इसे नज़रअंदाज़ मत कीजिएगा।

कुलवंत जी के सुझावों का स्वागत है। हिन्द-युग्म शुरू से ही ऐसा चाहता है। जल्द ही नामी वरिष्ठों का भी दिल जीतेगा।

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