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Thursday, December 06, 2007

कुछ लफ्ज़



1: आतंक के हाथ
क़ानून से ज्यादा लंबे हैं
जो ख़ास सुरक्षा मिलने पर भी
मौका मिलते ही धमाका कर जाते हैं
और लिखने वाले के हाथ
अभी भी बंधे हैं
जो आजाद होते हुए भी
इंसानो से ड़र जाते हैं !!




2:सुनो ,
आज कुछ लफ्ज़ दे दो मुझे
ना जाने मेरी कविता के सब मायने
कहाँ खो गये हैं?
मेरे अपने लिखे लफ्ज़ अब
ना जाने क्यों बेमानी से हो गये हैं
दिखते हैं अब सिर्फ़ इसमें
विस्फोटक ,बलात्कार, भ्रष्टाचार
और कुछ डरे सहमे से शब्द
जो मुझे किसी ,
कत्लगाह से काम नही दिखते
हो सके तो दे देना अब मुझे
विश्वास और प्यार के वो लफ्ज़
जो मेरे देश की पावन मिटटी की
खुशबु थे कभी!!

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21 कविताप्रेमियों का कहना है :

Anish का कहना है कि -

दोनों छंद बहुत सुंदर बने हैं.
खास कर पहला मुझे बहुत पसंद आया .
बधाई.
अवनीश तिवारी

मनीष वंदेमातरम् का कहना है कि -

रंजू जी़!

सुंदर कविता है।
एक सजग और संवेदनशील नागरिक की स्वाभाविक बेचैनी।

Anupama Chauhan का कहना है कि -

dono hi chand bahut aache likhe hain.....

और लिखने वाले के हाथ
अभी भी बंधे हैं
yeh punch line aachi tarah se use ki hai...jo chand me jaan bhar rahi hai.

आज कुछ लफ्ज़ दे दो मुझे
ना जाने मेरी कविता के सब मायने
कहाँ खो गये हैं?
मेरे अपने लिखे लफ्ज़ अब
ना जाने क्यों बेमानी से हो गये हैं
zehan me kaafi naya vichaar aaya ho lagta hai aapke...yeh likhte waqt....kyunki padhne me kaafi fresh lag raha hai....aacha likha hai

Sanjeet Tripathi का कहना है कि -

क्या बात है!!!लेखन में बदलाव जारी ही है!!

पढ़ने से ही मालूम चल रहा है कि आपके दिलो-दिमाग में इन दिनो उथल-पुथल सी चल रही है!!!
गुड है जी!!
शुभकामनाएं

Dr. RAMJI GIRI का कहना है कि -

"मेरे अपने लिखे लफ्ज़ अब
ना जाने क्यों बेमानी से हो गये "

samaz ke sankraman kal par satik rachna hai aapki.

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

और लिखने वाले के हाथ
अभी भी बंधे हैं
जो आजाद होते हुए भी
इंसानो से ड़र जाते हैं !!

हो सके तो दे देना अब मुझे
विश्वास और प्यार के वो लफ्ज़
जो मेरे देश की पावन मिटटी की
खुशबु थे कभी!!

आपकी कविता के ये तेवर देख कर अच्छा लगा। बधाई स्वीकारें।

*** राजीव रंजन प्रसाद

मोहिन्दर कुमार का कहना है कि -

नई शैली नया अनदाज पसन्द आया...
सचमुच अगर हाथ बंधे न होते तो ये आन्तकवाद न होता.
आन्तकवादी के मरने और सेना के जवान के मरने में कोई फ़र्क नहीं.. शहीद की विध्वा और परिवार को कुछ दिनों में सब भूल जाते हैं... यहां तक कि लिखने वाले भी.

anuradha srivastav का कहना है कि -

आपने अपनी शैली से हटकर लिखा । बहुत अच्छा लिखा । कुछ बैचेन सा ,कुछ नाराज सा।

सजीव सारथी का कहना है कि -

रंजना जी इस बार अपनी शैली से बिल्कुल अलग हट कर लिखा है आपने, कलम की धार कुंद करने की कोशिश हमेशा से होती रही है, पर कलाम्कारों ने कभी भी सच का परचम झुकने नही दिया, आपका क्रोध उभर कर आया है बहुत सुंदर कविता

shobha का कहना है कि -

रंजना जी
लाज़वाब लिखा है इस बार ।
आतंक के हाथ
क़ानून से ज्यादा लंबे हैं
जो ख़ास सुरक्षा मिलने पर भी
मौका मिलते ही धमाका कर जाते हैं
और लिखने वाले के हाथ
अभी भी बंधे हैं
जो आजाद होते हुए भी
इंसानो से ड़र जाते हैं !!
बधाई स्वीकारें ।

Vicky का कहना है कि -

आपकी कविता मे कुछ तो बात है!! पढ़ कर बहुत अच्छा लगा!! इन्सान ख़ुद का दुश्मन बन बैठा है !! खैर आप उही अच्छी कविताये लिखती रहे !! हमारी सुभकामनाये हमेसा आपके साथ है!!! प्रभात कुमार पटना से

sahil का कहना है कि -

रंजू जी सादर प्रणाम,
मैंने आपकी कुछ समीक्षाएं पढी तो मन में विचार आया कि आखिर ये कैसी कविता करती होंगी.सच कहूँ तो मैं आपकी कविता पढने को काफ़ी बेताब था.
पर आज आपने मेरी व्यग्रता और बेताबी पर अपनी इस ज्वलंत काव्य से पूर्ण विराम लगा दिया.
आपकी समीक्षा करूँ तो बेनियाजी होगी.बस मुबारकबाद ही दे सकता हूँ.
बहुत बहुत साधुवाद.
आपकी कवितायेँ निरंतर पढने को मिलती रहेंगी.इसी यकीं के साथ-
अलोक सिंह "साहिल"

Bhupendra Raghav का कहना है कि -

आज कुछ लफ्ज़ दे दो मुझे
ताकि मैं लिखे पर भी कुछ लिख सकूँ
कुछ टिप्पणी कर सकूँ
मैं ! क्या निःशब्द ऐसे ही बैठा रहुँगा
और अगर कहुँगा भी तो क्या कहुँगा ?
वाह ! लाजवाब..
और बस फिर स्तब्ध...

Mrs. Asha Joglekar का कहना है कि -

बडी अलग सी अभिव्यक्ती वाकई लिखने वाले के हाथ बंधे हुए हैं । बधाई हाथ की रस्सियों को ढीला कर पाने के लिये ।

शैलेश चन्द्र जम्लोकी (मुनि ) का कहना है कि -

-रंजना जी
आपकी दोनों पद बहुत अच्छे बने है अगर हम भावात्मक दृष्टि से देखे तो...
मगर मुझे दूसरा पद ज्यादा अच्छा लगी .. .बस कारन तो मै भी ढूढ़ रहा हू..
-जो पहला कारन समझ मै आता है वो ये की उसमे अंत मै सन्देश भी दिया गया है
- दूसरा ये की उसमे कारन भी बताया गया है की क्यों मेरे लफ्ज़ खो गए है? वो मै यू समझा हू की .. आसपास के माहोल से आदमी की सोच भी बदल जाती है इसलिए

वैसे पहली वाला भी अच्छा व्यंग लगा .... बधाई स्वीकार कीजिए
सादर
शैलेश चन्द्र जम्लोकी (मुनि )

श्रीकान्त मिश्र 'कान्त' का कहना है कि -

वाह रंजना जी !

बहुत ही अच्छा लगा आपको रचना के इस नए रूप में पढ़ना हार्दिक शुभकामना

Alpana Verma का कहना है कि -

और लिखने वाले के हाथ
अभी भी बंधे हैं
जो आजाद होते हुए भी
इंसानो से ड़र जाते हैं !!
बहुत सही सही आपने आज की स्थिति को अपनी कविता के द्वारा बताने का सफल प्रयास किया है---यह विडंबना ही है कि सब जानते हुए भी हम कुछ कर नहीं पाते --आप की कविता थोड़े शब्दों में बहुत कह सकी है-बधाई !

tanha kavi का कहना है कि -

हो सके तो दे देना अब मुझे
विश्वास और प्यार के वो लफ्ज़
जो मेरे देश की पावन मिटटी की
खुशबु थे कभी!!

बहुत बढिया मनुहार है रंजू जी। दूसरी क्षणिका/कविता ज्यादा पसदं आई। वैसे पहली भी काबिल-ए-तारीफ है।

बधाई स्वीकारें।

-विश्व दीपक 'तन्हा'

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

पहली क्षणिका (कविता) में तेवर हैं, दूसरे में इसका काफ़ी अभाव है। दूसरी सपाट है।

निखिल आनन्द गिरि का कहना है कि -

"आतंक के हाथ
क़ानून से ज्यादा लंबे हैं
जो ख़ास सुरक्षा मिलने पर भी
मौका मिलते ही धमाका कर जाते हैं
और लिखने वाले के हाथ
अभी भी बंधे हैं
जो आजाद होते हुए भी
इंसानो से ड़र जाते हैं !!"

रंजू जी,
विलम्ब से टिपण्णी के लिए क्षमा.....इस बार टिपण्णी नही करता तो आप तो मेरे यहाँ आकर पिटती मुझे....
क्षणिकाओं में आपका प्रयास सफल है....दो ही क्यों लिखीं...

निखिल आनंद गिरि

mukesh का कहना है कि -

dono hi kavitaye bahut acchi lagi.badhaiya

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