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Wednesday, October 31, 2007

शोभा की नज़र में 'आधुनिक नारी'


प्रतियोगिता की कविताओं में आज हम उन्नीसवें पायदान की कविता 'आधुनिक नारी' की रचयिता श्रीमती शोभा महेन्द्रू से मिलवाने वाले हैं, जिन्होंने एक पाठक, आलोचक की हैसियत से हिन्द-युग्म की जितनी मदद की है, उतनी किसी ने नहीं की। इन्हें हम इंटरनेट का वरदान ही मानते हैं। ये भी उन हिन्दी भाषियों में से हैं, जिन्हें निज भाषा का अभिमान है। शोभा महेन्द्रू ३० अक्टूबर से हिन्द-युग्म की स्थाई सदस्य हो गई हैं और प्रत्येक माह के पहले व तीसरे शनिवार को अपनी कविताएँ प्रकाशित करेंगी।

कविता- आधुनिक नारी

कवयित्री- शोभा महेन्द्रू, फ़रीदाबाद



आधुनिक नारी
बाहर से टिप-टाप
भीतर से थकी-हारी ।
सभ्य, सुशिक्षित, सुकुमारी
फिर भी उपेक्षा की मारी।
समझती है जीवन में
बहुत कुछ पाया है
नहीं जानती-
ये सब छल है, माया है।
घर और बाहर दोनों में
जूझती रहती है।
अपनी वेदना मगर
किसी से नहीं कहती है ।
संघर्षों के चक्रव्यूह
जाने कहाँ से चले आते हैं ?
विश्वासों के सम्बल
हर बार टूट जाते हैं ।
किन्तु उसकी जीवन शक्ति
फिर उसे जिला जाती है ।
संघर्षों के चक्रव्यूह से
सुरक्षित आ जाती है ।
नारी का जीवन
कल भी वही था-
आज भी वही है ।
अंतर केवल बाहरी है ।
किन्तु
चुनौतियाँ हमेशा से
उसने स्वीकारी है ।
आज भी वह माँ-बेटी
तथा पत्नी का कर्तव्य
निभा रही है ।
बदले में समाज से
क्या पा रही है ?
गिद्ध दृष्टि आज भी उसे
भेदती है ।
वासना आज भी
रौंदती है ।
आज भी उसे कुचला जाता है ।
घर, समाज व परिवार में
उसका देने का नाता है ।
आज भी आखों में आँसू
और दिल में पीड़ा है ।
आज भी नारी-
श्रद्धा और इड़ा है ।
अंतर केवल इतना है
कल वह घर की शोभा थी
आज वह दुनिया को महका रही है ।
किन्तु आधुनिकता के युग में
आज भी ठगी जा रही है ।
आज भी ठगी जा रही है

रिज़ल्ट-कार्ड
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प्रथम चरण के ज़ज़मेंट में मिले अंक- ७, ९, ६, ७, ७
औसत अंक- ७॰२
स्थान- पाँचवाँ
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द्वितीय चरण के ज़ज़मेंट में मिले अंक-६॰५, ७॰६, ५॰१, ७॰२ (पिछले चरण का औसत)
औसत अंक- ६॰६
स्थान- उन्नीसवाँ
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13 कविताप्रेमियों का कहना है :

सजीव सारथी का कहना है कि -

वाह आज के "सुपर वूमन" की वेदना को साकार रूप देने में सफल रही हैं आप

मोहिन्दर कुमार का कहना है कि -

शोभा जी,
सुन्दर चित्रण किया है आपने आधुनिक नारी का.
दोहरे भार (पारिवारिक और व्यवसायिक) के कारण जीवन कठिन हो जाता है.. परन्तु नारी में असीम सहनशीलता उसे सुगम बनाती है. आगे बढने की चाह और अपना मुकाम बनाने की चाह में कुछ सुखों को तिलांजली देनी ही पडती है.

Bhupendra Raghav का कहना है कि -

बहुत बढिया चित्र उकेरा है आधुनिक नारी का..
बहुत अच्छा

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

शोभा जी,

संघर्षों के चक्रव्यूह
जाने कहाँ से चले आते हैं ?
विश्वासों के सम्बल
हर बार टूट जाते हैं ।

आज भी उसे कुचला जाता है ।
घर, समाज व परिवार में
उसका देने का नाता है ।
आज भी आखों में आँसू
और दिल में पीड़ा है ।
आज भी नारी-
श्रद्धा और इड़ा है ।
अंतर केवल इतना है
कल वह घर की शोभा थी
आज वह दुनिया को महका रही है ।
किन्तु आधुनिकता के युग में
आज भी ठगी जा रही है ।
प्रश्न और चिरन दोनों ही बहुत अच्छा है रचना में। नारी समस्या/पीडा और स्वाभिमान के सशक्त प्रश्न हैं आपकी रचना में। बधाई।

*** राजीव रंजन प्रसाद

तपन शर्मा का कहना है कि -

शोभा जी,
हिंद-युग्म का स्थाई सदस्य बनने पर बधाई स्वीकार करें।
धन्यवाद,
तपन शर्मा

Anish का कहना है कि -

बहुत खुब.
बिल्कुल सतीक शब्दों मे आलोचना की है.

बधायी.

अवनीश तिवारी

Rajesh का कहना है कि -

शोभाजी स्थायी कवि बनने के लिए आप को बहोत बधाईयां.
नारी के कितने रूप है - बेटी, बहन, प्रेमिका, दोस्त, पत्नी, माँ, दादी और न जाने कितने ही. और हर एक पात्र वह बखूबी निभा लेती है बिना किसी से कोई शिकायत के और अगर कोई शिकायत भी होती है फ़िर भी कभी जबान पर नही आती. और इसी लिए नारी को भारत में इतना महत्व मिला है हमेशा से जिस का कोई जोड़ नही है. हाँ अब भी बहोत कुछ सहन कर रही है नारी पर जिस तरह से इतनी तरक्की की है और भी जरूर होगी और अपना लोहा मनवा कर के छोदेगी यह नारी. इतनी अच्छी कविता बना ने पर भी आप को बधाई.

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

प्रवाह, संदेश, समसामयिकता की दृष्टि से कविता तो उत्तम है लेकिन आधुनिक नारी पर व्यंग्य करती, आसू बहाती इसी तरह की और रचनाएँ भी पढ़ने को खूब मिलती हैं। इन्हीं सब पर तो तसलीमा का पूरा साहित्य है। प्रस्तुतिकरण में नयापन नहीं है।

kamlesh का कहना है कि -

acchi tarah se likha hai ....

रंजू का कहना है कि -

शोभा जी आपका स्वागत है ...अच्छी लगी आपकी यह रचना नारी के स्वरूप को दर्शाती

विश्वासों के सम्बल
हर बार टूट जाते हैं ।
किन्तु उसकी जीवन शक्ति
फिर उसे जिला जाती है ।
संघर्षों के चक्रव्यूह से
सुरक्षित आ जाती है ।
नारी का जीवन
कल भी वही था-
आज भी वही है ।
अंतर केवल बाहरी है ।

बहुत सही बात कही आपने ..

आपके लिखे का इंतज़ार रहेगा शुभकामना के साथ
रंजू

Gita pandit का कहना है कि -

आज भी आखों में आँसू
और दिल में पीड़ा है ।
आज भी नारी-
श्रद्धा और इड़ा है ।
अंतर केवल इतना है
कल वह घर की शोभा थी
आज वह दुनिया को महका रही है ।
किन्तु आधुनिकता के युग में
आज भी ठगी जा रही है ।

वाह....शोभा जी,
सुन्दर चित्रण आधुनिक नारी का....


बधाई।

Sunny Chanchlani का कहना है कि -

a

Sunny Chanchlani का कहना है कि -

अच्छी रचना के लिए साधुवाद

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