सुजीत कुमार सुमन लम्बे समय से हिन्द-युग्म पर कविताएँ भेजते रहे हैं। लगातार अच्छा लिखने की कोशिश कर रहे हैं।
कविता- मत समझो
गर कहा मानो मेरा किसी को भगवान मत समझो
किसी की सादगी को तुम महज पहचान मत समझो
बहुत कांटे हैं राहों में सुमन के वेश में देखो
है मुश्किल ये डगर इसको आसान मत समझो
साधते जाओ जहां तक सको साध हित अपना
कभी रिश्तों को राहों का व्यवधान मत समझो
वो और था गांधी फिरा करता था खद्दर में
भूले से भी खादी को महान मत समझो
खताएं वो भी करते हैं कद ऊंचा है जिनका
तुम उनकी बातों को कभी फरमान मत समझो
अगर पाना तुम्हें भी हो जगह ऊंची जमाने में
उठाओ जूतियां उनकी कभी अपमान मत समझो
कहा जो भी अभी मैंने तर्जुबा कच्चे वय का है
पर बात है सच्ची मुझे नादान मत समझो।






