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अंधेरे में डूबे बिना हाशियों का दर्द समझना और पानी का रंग जानना मुश्किल है


काव्यसदी में आज हम संतोष कुमार चतुर्वेदी की तीन कविताएँ लेकर उपस्थित हैं। इस स्तम्भ के प्रथम कवि संतोष की पाँच कविताएँ (विषम संखयाएँ, भभकना, ओलार, माँ का घर और राग नींद) पहले ही प्रकाशित हो चुकी हैं। कवि की दो कविताएँ (बादल और दूब तथा वहीं से फूटती हैं राहें) साहित्यिक मासिक 'वागर्थ' के मई 2011 अंक में प्रकाशित हैं। युवा कवि तमाम मुद्दों को नयी दृष्टि से देख रहे हैं। संतोष की काव्य-दृष्टि में नवीनता पूरी तरह से मुखरित होती है।

अन्धेरे में डूबे बिना

चकाचौंध भरे उजाले से
अन्धेरे में आ कर
तत्काल ही नहीं समझा जा सकता
अन्धेरे को ठीक से
तब शर्तिया तौर पर चौंधिया जायेंगी आँखें
और नहीं दिखायी पड़ेगा
बिल्कुल नजदीक तक का
अन्धेरे में कुछ भी
अन्धेरे को देखने के लिए
पहले अन्धेरे के अनुकूल बनानी पड़ती हैं आँखें
अन्धेरे को समझने के लिए
होना पड़ता है पहले पूरी तरह अन्धेरे का
अन्धेरे को जानने के लिए
अन्धेरे के साथ ही पड़ता है जीना
अन्धेरे को नहीं देखा जा सकता
अन्धेरे में डूबे बिना

हाशियाँ

जब से आबाद हुई यह दुनिया
और लिखाई की शक्‍ल में
जब से होने लगी अक्षरों की बूँदाबादी
हाशिये की जमीन तैयार हुई
तभी से हमारे बीच
अब यह जानबूझ कर हुआ
या बस यूँ ही
छूट गयी जगह हाशिये वाली
कहा नहीं जा सकता इस बारे में
कुछ भी भरोसे से
लेकिन जिस तरह छूट जाता है हमसे
हमेशा कुछ-न-कुछ जाने अंजाने
जिस तरह भूल जाते हैं हम अमूमन
कुछ-न-कुछ किसी बहाने
पहले-पहल छूटा होगा हाशिया भी
दुनिया के पहले लेखक से
कुछ इसी तरह की
भूल गलती वाले प्रयोग से
अब ऐसा सायास हुआ हो या अनायास
हाशिये की वर्तनी के साथ ही
अक्षर पन्‍ना तभी लगा होगा इतना दीप्‍त
सुघड़ दिखा होगा अपनी पहलौठी में भी
उतना ही वह
जितना आज भी खिला-खिला दिखता है
अक्षरों वाली पंक्‍तियों के साथ
भरेपूरेपन में हाशियाँ
हाशिये में भरापूरापन
कुछ इसी तरह तो
बनता आया है छन्‍द जीवन का
कुछ इसी तरह तो
लयबद्व चलती आ रही है प्रकृति
न जाने कब से
कभी कभी होते हुए भी
हम नहीं होते उस जगह पर
कभी-कभी न होते हुए भी
हमारे होने की खुशबू से
तरबतर होती हैं जगहें

और अक्‍सर अपने ही समानान्‍तर
बनाते चलते हैं हम हाशिया
जिसे देख नहीं पाते
अपनी नजरों के झरोखे से
एक सभ्‍यता द्वारा छोड़े गये हाशिये को
किसी जमाने में सजा-संवार देती है
कोई दूसरी सभ्‍यता
लेकिन कहीं-कहीं तो
प्रतीक्षारत बैठे बदस्‍तूर आज भी
दिख जाते हैं हाशिये
किसी कूँची किसी रंग या फिर
किसी हाथ की उम्‍मीद में
कई परीक्षाओं में मैंने खुद पढा यह दिशा निर्देश
कृपया पर्याप्‍त हाशियाँ छोड़ कर ही लिखें
बहुत बाद में जान पाया था यह राज
कि हाशिये ही सुरक्षित रखते थे
हमारे प्राप्‍तांकों को
परीक्षकों के हाथों से छीनकर
कॉपियाँ जाँचे जाने के वक्‍त
और इस तरह हमारे कामयाब होने में
अहम भूमिका रहती आयी है हाशिये की
जैसे कि आज भी किसी न किसी रूप में
हुआ करती है
हमसे भूल गयी बातों
चूक गये विचारों
और छूट गये शब्‍दों को
सही समय पर सही जगह दिलाने में
अक्‍सर काम आता है
यह हाशियाँ आज भी
हाशिये को दरकिनार कर
दरअसल जब भी लिखे गये शब्‍द
भरी गयीं पंक्‍तियाँ
किसी हड़बड़ी में जब भी
बाइण्‍डिंग के बाद
लड़खड़ा गयी पन्‍ने की शक्‍ल
अपठनीय हो गयी
वाक्‍यों की सूरत।


पानी का रंग

गौर से देखा एक दिन
तो पाया कि
पानी का भी एक रंग हुआ करता है
अलग बात है यह कि
नहीं मिल पाया इस रंग को आज तक
कोई मुनासिब नाम

अपनी बेनामी में भी जैसे जी लेते हैं तमाम लोग
आँखों से ओझल रह कर भी अपने मौसम में
जैसे खिल उठते हैं तमाम फूल
गुमनाम रह कर भी
जैसे अपना वजूद बनाये रखते हैं तमाम जीव
पानी भी अपने समस्‍त तरल गुणों के साथ
बहता आ रहा है अलमस्‍त
निरन्‍तर इस दुनिया में
हरियाली की जोत जलाते हुए
जीवन की फुलवारी में लुकाछिपी खेलते हुए

अनोखा रंग है पानी का
सुख में सुख की तरह उल्‍लसित होते हुए
दुःख में दुःख के विषाद से गुजरते हुए
कहीं कोई अलगा नहीं पाता
पानी से रंग को
रंग से पानी को
कोई छननी छान नहीं पाती
कोई सूप फटक नहीं पाता
और अगर ओसाने की कोशिश की किसी ने
तो खुद ही भीग गया वह आपादमस्‍तक

क्‍योंकि पानी का अपना पक्‍का रंग हुआ करता है
इसलिए रंग छुड़ाने की सारी प्रविधियाँ भी
पड़ गयीं इसके सामने बेकार

किसी कारणवश
अगर जम कर बन गया बर्फ
या फिर किसी तपिश से उड़ गया
भाप बन कर हवा में
तब भी बदरंग नहीं पड़ा
बचा रहा हमेशा एक रंग
प्‍यास के संग-संग

अगर देखना हो पानी का रंग
तो चले जाओ
किसी बहती हुई नदी से बात करने
अगर पहचानना हो इसे
तो किसी मजदूर के पसीने में
पहचानने की कोशिश करो
तब भी अगर कामयाबी न मिल पाये
तो शरद की किसी अलसायी सुबह
पत्तियों से बात करती ओस की बूँदों को
ध्‍यान से सुनो

अगरचे बेनाम से इस पनीले रंग को
इसकी सारी रंगीनियत के साथ
बचाये रखना चाहते हो
तो बचा लो
अपनी आखों में थोड़ा-सा पानी
जहाँ से फूटते आये हैं
रंगों के तमाम सोते।

माँ के घर की तलाश में एक इलाहाबादी कवि


26 अप्रैल 2011 से हमने समकालीन युवा कवियों को आपके समक्ष प्रस्तुत करने का एक नया स्तम्भ 'काव्यसदी' आरम्भ किया है, जो युवा कवि भरत प्रसाद के संपादन और निर्देशन में आगे बढ़ेगा। पिछली बार आपने युवा कवि संतोष कुमार चतुर्वेदी की तीन कविताएँ पढ़ी, आज हम उनकी दो कविताएँ लेकर उपस्थित हैं। संतोष डिटेलिंग के कवि हैं, लेकिन जब आप उनकी कविताओं को पढ़ते हैं तो ऐसा लगता है कि ये सारे विवरण ज़रूरी थे। इससे इनकी कविता अपने तमाम तर्कों के साथ पाठक तक पहुँचती है।

माँ का घर

मैं नहीं जानता अपनी माँ की माँ का नाम
बहुत दिनों बाद जान पाया मैं यह राज
कि जिस घर में हम रहते हैं
वह दरअसल ससुराल है माँ की
जिसे अब वह अपना घर मानती है
फिर माँ का अपना घर कहाँ है
खोजबीन करने पर यह पता चला
कि मामा के जिस घर में
गर्मियों की छुटि्‌टयों में
करते रहते थे हम धमाचौकड़ी
वही माँ का घर हुआ करता था कभी
जहाँ और लड़कियों की तरह ही वह भी
अपने बचपन में सहज ही खेलती थी कितकित
और गिटि्‌टयों का खेल
जिस घर में रहते हुए ही
अक्षरों और शब्‍दों से परिचित हुई थी वह पहले-पहल
वही घर अब उसकी नैहर में
तब्‍दील हो चुका है अब

अपना जवाब खोजता हुआ मेरा सवाल
उसी मुकाम पर खड़ा था
जहाँ वह पहले था
माँ का घर एक पहेली था मेरे लिए अब भी
जब यह बताया गया कि
हमारा घर और हमारे मामा का घर
दोनो ही माँ का घर है
जबकि हमारा घर माँ की ससुराल
और मामा का घर माँ का नैहर हुआ करता था

हमारे दादा ने रटा रखा था हमें
पाँच सात पीढी तक के
उन पिता के पिताओं के नाम
जिनकी अब न तो कोई सूरत गढ़ पाता हूँ
न ही उनकी छोड़ी गयी किसी विरासत पर
किसी अहमक की तरह गर्व ही कर पाता हूँ
लेकिन किसी ने भी क्‍यों नहीं समझी यह जरूरत
कि कुछ इस तरह के ब्‍यौरे भी कहीं पर हों
जिनमें दर्ज किये जाय अब तक गायब रह गये
माताओं और माताओं के माताओं के नाम

हमने खंगाला जब कुछ अभिलेखों को
इस सिलसिले में
तो वे भी दकियानूसी नजर आये
हमारे खेतों की खसरा खतौनी
हमारे बाग बगीचे
हमारे घर दुआर
यहाँ तक कि हमारे राशन कार्डों तक पर
हर जगह दर्ज मिला
पिता और उनके पिता और उनके पिता के नाम
गया बनारस इलाहाबाद के पण्‍डों की पुरानी पोथियाँ भी
असहाय दिखायी पड़ी
इस मसले पर
माँ और उनकी माँ और उनकी माताओं के नाम पर
हर जगह दिखायी पड़ी
एक अजीब तरह की चुप्‍पी
घूंघट में लगातार अपना चेहरा छुपाये हुए

तमाम संसदों के रिकार्ड पलटने पर उजागर हुआ यह सच
कि माँ के घर के मुददे पर
बहस नहीं हुई कभी कोई संसद में
दिलचस्‍प बात यह कि
बेमतलब की बातों पर अक्‍सर हंगामा मचाने वाले सांसदों ने
एक भी दिन संसद में चूं तक नहीं की
इस अहम बात को ले कर
और बुद्विजीवी समझे जाने वाले सांसद
पता नहीं किस भय से चुप्‍पी साध गये
इस मुद्‌दे पर

और अपने आज में खोजना शुरू किया जब हमने माँ को
तब भी तकरीबन पहले जैसी दिक्‍कतें ही पेश आयीं
घर की मिल्‍कियत का कागज पिता के नाम
बैंकों के पासबुक हमारे या हमारे भाइयों या पिता के नाम
घर के बाहर टंगे हुए नामपट्‌ट पर भी अंकित दिखे
हम या हमारे पिता ही

हर जगह साधिकार खड़े दिखे
कहीं पर हम
या फिर कहीं पर हमारे भाई
या फिर कहीं पर हमारे पिता ही
जब हमने अपनी तालीमी सनदों पर गौर किया
जब हमने गौर किया अपने पते पर आने वाली चिटि्‌ठयों
तमाम तरह के निमन्‍त्रण पत्रों
जैसी हर जगहों पर खड़े दिखायी पड़े
हम या हमारे पिता ही
अब भले ही यह जान कर आपको अटपटा लगे
लेकिन सोलहो आने सही है यह बात कि
मेरे गाँव में नहीं जानता कोई भी मेरी माँ को
पड़ोसी भी नहीं पहचान सकता माँ को
मेरे करीबी दोस्‍तों तक को नहीं पता
मेरी माँ का नाम

अचरज की बात यह कि
इतना सब तलाश करते हुए भी
जाने अंजाने हम भी बढे जा रहे थे
लगातार उन्‍हीं राहों पर
जिन्‍हें बड़ी मेहनत मशक्‍कत से संवारा था
हमारे पिता
हमारे पिता के पिता
हमारे पिता के पिता के पिताओं ने
एक लम्‍बे अरसे से

खुद जब मेरी शादी हुई
मेरी पत्‍नी का उपनाम न जाने कब
और न जाने किस तरह बदल गया मेरे उपनाम में
भनक तक नहीं लग पायी इसकी हमें
और कुछ समय बाद मैं भी
बुलाने लगा पत्‍नी को
अपने बच्‍चे की माँ के नाम से
जैसा कि सुनता आया था मैं पिता को
बाद में मेरे बच्‍चों के नाम में भी धीरे से जुड़ गया
मेरा ही उपनाम

अब कविता की ही कारीगरी देखिए
जो माँ के घर जैसे मुद्‌दे को
कितनी सफाई से टाल देना चाहती है
कभी पहचान के नाम पर
कभी शादी ब्‍याह के नाम पर
तो कभी विरासत के नाम पर

न जाने कहाँ सुना मैंने एक लोकगीत
जिसमें माँ बदल जाती है
कभी नदी की धारा में
कभी पेड़ की छाया में
कभी बारिश की बूँदों मे
कभी घर की नींव में होते हुए
माँ बदल जाती है फिर माली में
बड़े जतन से परवरिश करती हुई अपने पौधों की
फिर बन जाती है वह मिट्‌टी
जिसमें बेखौफ उगते अठखेलियाँ करते
दिख जाते हैं पौधे
पौधों में खोजो
तो दिख जाती है पत्‍तियों में
डालियों में फूलों में फलों में
फिर धीमे से पहुँच जाती हमारे सपनों में

धान रोपती बनिहारिने गा रहीं हैं
कि जिस तरह अपने बियराड़ से बिलग हो कर
धान का बेहन दूसरी धूल मिट्‌टी में गड़ कर
लहलहाने लगता है फूलने फलने लगता है
उसी तरह गुलजार कर देती हैं अपनी विस्‍थापित उपस्‍थिति से
किसी भी घर को महिलाएँ
खुद को मिटा कर

और जहाँ तक माँ के घर की बात है
मैं हरेक से पूछता फिर रहा हूँ
अब भी अपना यह सवाल
कोई कुछ बताता नहीं
सारी दिशाएँ चुप हैं
पता नहीं किस सोच में

जब यही सवाल पूछा हमने एक बार माँ से
तो बिना किसी लागलपेट के बताया उसने कि
जहाँ पर भी रहती है वह
वही बस जाता है उसका घर
वहीं बन जाती है उसकी दुनिया
यहाँ भी किसी उधेड़बुन में लगी हुई माँ नहीं
बस हमें वह घोसला दिख रहा था
जिसकी बनावट पर मुग्‍ध हो रहे थे हम सभी।


राग नींद

देखा मैंने
जब भी देखा
अपने इस शहर को
दौड़ते-भागते-जागते देखा

दिन-रात चलती मशीनें-खटर-पटर
दिन-रात खटते मजदूर-थके-मांदे
दिन-रात की शोर से बहरी हो गयी सड़क
दिन-रात चारो तरफ बस
भागमभाग-दौड़धूप

कहीं पर नींद का नामो-निशान नहीं
कहीं पर नींद की परछाई नहीं
कहीं पर लोरी गाती कोई माँ नहीं
कहीं पर कोई सपना नहीं
उफ्‌ कितना भयावह है यह सब कुछ

हैलोजन-नियॉन लैम्‍पों की रंगी हुई रोशनी में
गुम होती लोगों की रातें हैं यहाँ
गुम होती रातों में खोती हुई नींद है यहाँ
गुम होती नींद में खोते हुए सपने हैं यहाँ
और यह आकाश-तारों की लड़ियों से सजा हुआ
दुग्‍ध-धवल आकाशगंगा में तना हुआ
खोता जा रहा है समूचा
मानवी चकाचौंध के बाहुपाश में

नींद की वजह से कभी कुम्‍भकर्ण की उपाधि से नवाजा गया मैं
अब खुद को पाता हूँ जागता आकर्ण
जब कभी पलक झपकती है
गाने लगता है मोबाइल- ‘राग कर्कश' में,
जब कभी अलसाती हैं हमारी आखों
घर सन्‍नद्ध हो जाता है टी.वी. चैनल पर आने वाले
अपने प्रिय धारावाहिक को देखने के लिए
जब कभी आखों में झलकती है नींद की लालिमा
होने लगता है बेमतलब का हंगामा मेरे घर के सामने
और एक बार उचटी हुई नींद की लड़ी जोड़ने की
कोशिश में जब भी जुटता हूँ
रात बेतरह थक चुकी होती है
कि इसी समय
चौकाने वाली खबरों के साथ आ धमकता है अखबार
मित्रों-परिचितों-अपरिचितों की कॉलबेल बजने लगती है
सूरज आ जाता है अपने सात घोड़ों वाले रथ के साथ
बड़ी तेजी से-ठीक अपने समय पर
और मैं चल पड़ता हूँ
अपने काम पर-दौड़ते-भागते

अपने जगने के समय में कोई कटौती नहीं कर पाता
कविताई करने में भी नहीं करता समझौता
बाजार का अपना हिस्‍सा है हमारे जागृति-समय में
घर-बार, दोस्‍तों-मित्रों का अलग दावा है हमारे समय में
रोजी-रोजगार का कारोबारी समय तो तय ही है
कोई भी कटौती जब करनी होती है
कर लेता हूँ अपनी नींद वाले समय से
और अब हालत यह है कि
सब कुछ होते हुए मेरे पास नहीं है मुट्‌ठी भर नींद
वह लम्‍हा नहीं मिल पाता
जब ले सकूं सुकून भरी नींद


अपने सितार पर मैं 'राग नींद' बजाना चाहता हूँ।
लेकिन अजीब तरीके से बजने लगता है कभी- 'राग जागृति'
तो कभी बजने लगता है - 'राग भागमभाग'
तो कभी बजने लगता है - 'राग चिन्‍ता'
और इस तरह के कई और राग
जिनके नाम तक नहीं सुने संगीत के मशहूर उस्‍तादों ने भी

किस्‍सागो बताते हैं
'राग नींद' बजाने वाले बचे हैं कुछ लोग
अपनी फाकामस्‍ती के बावजूद
वे सड़क किनारे धूल वाले बिस्‍तर पर
आसन साध कर जुट जाते हैं रियाज में
गाने लगते हैं 'राग खर्राटा'

इस 'राग नींद' को साध लेते हैं रिक्‍शावाले सहज ही
अपने रिक्‍शे पर पड़े-पड़े-मुड़ी-गोड़ समेटे
या फिर उन मजूरों के आखों बजता दिख जायेगा 'राग नींद'
जो पसीने के अपने कवच-कुण्‍डल के साथ
दिख जाते हैं मेहनत के रंगमंच पर
'राग नींद' बजाते हुए पहुँच जाते हैं वे मजूर
'नींद-उत्‍सव' के राग में
सुधी स्रोता भी भांप नहीं पाते
सड़कों के डिवाइडरों, रेलवे प्‍लेटफार्मों
चौराहे के पार्कों और चबूतरों तक को
बदल डालते हैं वे मंच में

तेज रफ्‍तार वाहनों की कानफोड़ू आवाजें
महफिलों में छोड़े जाने वाले पटाखे
मौसम की उमस
या आस-पास भिनभिनाते-काटते माखी-मच्‍छर
नहीं तोड़ पाते उनका ध्‍यान
'नींद-उत्‍सव' को खास रंग देने में
जुटे हैं वे तल्‍लीनता से

वातानुकूलित कमरों
गद्‌देदार बिस्‍तरों
सुमधुर संगीत और
तरह-तरह की सुख-सुविधाओं के बीच भी
उचट जाती है नींद
बारम्‍बार

मैं नींद को धमकाता हूँ
नींद को खरीदना चाहता हूँ बाजार से
किसी भी कीमत वाले रिचार्ज कूपन का भुगतान कर
पाना चाहता हूँ 'स्‍लीपिंग वैल्‍यू'
हो सके तो किसी से उधार ही लेना चाहता हूँ नींद
लेकिन किसी भी जुगत से
नहीं मिल पा रही नींद

नींद की कई तरह की गोलियों
नींद के आजमाए हुए जोग
नींद के सिद्ध तन्‍त्र-मन्‍त्र
नींद की तमाम कसरतों-कवायदों के बावजूद
कहीं भी पता नहीं नींद का

नींद की अहेर में जुटा हुआ मैं
बार-बार क्‍यों रह जा रहा असफल
नहीं लांघ पा रहा नींद की देहरी
बचपन के गाँव में एक हकीमजी बताया करते थे
और आज का हमारा चिकित्‍साशास्‍त्र भी तसदीक करता है इस बात की
अच्‍छी सेहत के लिए जरूरी होती है पुरकश नींद
सफल होने के लिए जरूरी होते हैं सपने
लेकिन अब तो यहाँ न नींद है, न ही सपने

हमारे शहर को लग गयी है किसी की नजर
कोई वैद्य-हकीम आकर बचा ले हमारे शहर को
किसी भी कीमत के एवज में

नींद से आदमी के पुरातन रिश्‍ते में
किस वजह से पड़ती जा रही है दरार
आदमी-आदमी के बीच
अब क्‍यों नहीं रहा वह ऐतबार
जब कोई सफर करते हम
बगलगीर से बेतक्‍कलुफी से बता कर
आराम से सो जाते थे
'भाइर्स्‍साब ........ इलाहाबाद जंक्‍शन आने पर
जरा जगा दीजिएगा हमको'

शेष की शक्ल में संभावनाएँ


कविता प्रेमियो,

आज से हम कविता का एक नया स्तम्भ शुरू कर रहे हैं, जिसको हमने 'काव्यसदी' का नाम दिया है। इसके अंतर्गत हम ऐसे समकालीन युवा कवियों की चुनिंदा कविताओं को आपके समक्ष प्रस्तुत करेंगे, जो समकालीन हिन्दी कविता की दिशा निर्धारित कर रहे हैं। इस स्तम्भ के लिए कवि और कविता का चुनाव तथा सम्पादन युवा कवि भरत प्रसाद ने अपने जिम्मे लिया है। युवा कवि भरत प्रसाद हिन्दी लिखने-पढ़ने में बेहद सक्रिय हैं, साहित्यिक पत्रिका 'परिकथा' में भी 'ताना-बाना' नाम का स्तम्भ सम्हाले हैं। हिन्द-युग्म जल्द ही भरत प्रसाद के व्यक्तित्व और कृतित्व से आपका परिचय करायेगा। लेकिन सबसे पहले बिना किसी अतिरिक्त भूमिका के 'काव्यसदी' के पहले कवि संतोष कुमार चतुर्वेदी की 3 कविताएँ हम आपके समक्ष रख रहे हैं।

विषम संख्याएँ

संतोष कुमार चतुर्वेदी


जन्म- 2 नवम्बर 1971 को उ0 प्र0 के बलिया जिले के हुसेनाबाद गॉव में एक किसान परिवार में।
पिता- श्री सुरेन्द्र नाथ चतुर्वेदी
माँ- श्रीमती मालती देवी
प्रारंभिक पढाई गाँव में ही। समस्त उच्च शिक्षा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से। ‘प्राचीन इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व’ तथा ‘आधुनिक इतिहास’ में परास्नातक। ‘प्राचीन भारतीय साहित्यिक एवं कलात्मक परम्परा’ में पेड़ पौधे एवं वनस्पतियॉ शीर्षक से डी. फिल.। पत्रकारिता एवं जनसंचार में परास्नातक डिप्लोमा। प्रारंभ में 15 सालों तक ‘कथा’ पत्रिका में सहायक सम्पादक के रूप में कार्य किया। इस समय ‘अनहद’ नामक पत्रिका का संपादन। 2009 में भारतीय ज्ञानपीठ से काव्य संग्रह ‘पहली बार’ का प्रकाशन। अभी हाल ही में लोकभारती प्रकाशन से ‘भारतीय संस्कृति’ नामक पुस्तक का प्रकाशन। देश भर की पत्र पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित। आकाशवाणी इलाहाबाद से निरन्तर कविताओं का प्रसारण।
संप्रति- उ.प्र. के चित्रकूट जिले के मउ में एम. पी. पी. जी. कॉलेज में इतिहास के विभागाध्यक्ष।
सम्पर्क- 3/1 बी, बी. के. बनर्जी मार्ग, नया कटरा, इलाहाबाद, उ0 प्र0 211002
मोबाइल- 09450614857, ई मेल- santoshpoet@gmail.com
जिन्दगी की हरी-भरी जमीन पर
अपनी संरचना में भारी-भरकम
दिखायी पड़ने वाली सम संख्याएँ
किसी छोटी संख्या से ही
विभाजित हो जाती हैं प्रायः
वे बचा नहीं पातीं
शेष जैसा कुछ भी

विषम चेहरे-मोहरे वाली कुछ संख्याएँ
विभाजित करने की तमाम तरकीबों के बावजूद
बचा लेती हैं हमेशा
कुछ न कुछ शेष

वैसे इस कुछ न कुछ बचा लेने वाली संख्या को
समूल विभाजित करने के लिए
ठीक उसी शक्ल-सूरत
और वजन-वजूद वाली संख्या
ढूँढ़ लाता है कहीं से गणित

परन्तु अपने जैसे लोगों से न उलझ कर
विषम मिजाज वाली संख्याएँ
शब्दों और अंकों के इस संसार में
बचा लेती हैं
शेष की शक्ल में संभावनाएँ

अन्धकार के वर्चस्व से लड़ते-भिड़ते
बचा लेती हैं विषम-संख्याएँ
आँख भर नींद
और सुबह जैसी उम्मीद।


भभकना

समकालीन युवा कवियों में अपनी पुखता पहचान बनाने की ओर अग्रसर संतोष चतुर्वेदी अपनी सुशिक्षित बुद्धि को मथने वाले सूक्ष्म विषयों का चुनाव साहसपूर्वक करते हैं। एक साथ लोकजीवन की दुःख-दर्द भरी हलचलों और जटील अबूझ अर्थ भरे विषयों को साधना किसी युवा कवि के लिए रिस्की प्रयास हैं। मगर संतोष चतुर्वेदी इस रिस्क को अपने अनुकूल और आसान बना लेते हैं। वे कविता में गैप कम छोड़ते है, जो कि पाठक के भीतर अर्थ की अविस्मरणीय अनुगूँज पैदा करने के लिए बेहद जरूरी है। यह गैप साध लेना कविता लिखने की नायाब कलात्मकता का दूसरा नाम है।
-भरत प्रसाद
रोज की तरह ही उस दिन भी
सधे हाथों ने जलायी थी लालटेन
लेकिन पता नहीं कहाँ
रह गयी थोड़ी सी चूक
कि भभक उठी लालटेन

हो सकता है कि
किरासिन तेल से
लबालब भर गयी हो लालटेन की टंकी
हो सकता है कि
बत्ती जलाने के बाद
शीशा चढ़ाने में थोड़ी देर हो गयी हो
हो सकता है कि
एक अरसे से लापरवाही बरतने के कारण
खजाने में जम गयी हो
ढेर सारी मैल

यह भी संभव है कि
टंगना उठाते समय
हाथों को सूझी हो थोड़ी-सी चुहल
और आपे से बाहर होकर
भभक उठी हो लालटेन

हो सकता है कि
जब सही-सलामत जल गयी हो लालटेन
तो अन्धेरे को रोशनी से सींचने की
हमारी अकुताहट को ही
बरदाश्त न कर पायी हो
नाजुक-सी लालटेन
और घटित हो गया
भभकने का उपक्रम

दरअसल लालटेन का भभकना
जलने और बुझने के बीच की वह प्रक्रिया है
जिसके लिए कुछ भाषाओं ने तो
शब्द तक नहीं गढ़े
फिर भी घटित हो गयी वह प्रक्रिया
जो शब्दों की मोहताज नहीं होती कभी
जो गढ़ लेती है खुद ही अपनी भाषा
जो ईजाद कर लेती है
खुद ही अपनी परिभाषा

यह वह छटपटाहट थी
जो अनुष्ठान की तरह नहीं
बल्कि एक वाकये की तरह घटित हुई
अन्धेरे के खिलाफ बिगुल बजाती हुई
रोशनी को सही रास्ते पर
चलने के लिए सचेत करती हुई
और जब लोगों ने यह मान लिया
कि भभक कर आखिरकार
बुझ ही जायेगी लालटेन
अनुमानों को गलत साबित करती हुई
फैल गयी आग
समूचे लालटेन में
चनक गया शीशा
कई हिस्सों में

वैसे विशेषज्ञ यह उपाय बताते हैं
कि भभकती लालटेन को बुझा देना ही
श्रेयस्कर होता है
और भी तमाम उपाय
किये जाते हैं इस दुनिया में
भभकना रोकने खातिर

लेकिन तमाम सावधानियों के बाद भी
किसी उपेक्षा
या किसी असावधानी से
भभक उठती है लालटेन
अपनी बोली में
अपना रोष दर्ज कराने के लिए।


ओलार


बहुत देर से जुटा है इक्कावान
इक्के पर बैठे अपने सवारियों को व्यवस्थित करने की कोशिश में

चार यात्री भारी-भरकम काया-माया वाले आगे
खुद साईस की तरह विराजमान
अपनी गद्दी पर इक्कावान
कुछ दुबले-पतले और दो-तीन मोटे-ताजे
बीच में अड़स कर बैठे कुछ बच्चे और महिलाएँ
इक्के की छाजन का ढांचा बनाने वाले लोहे के छड़ों
और इक्के का वितान रचने वाले पटरों को
अपनी मजबूत पकड़ में जकड़े हुए सब

लगातार चाबुक बरसा रहा है इक्कावान घोड़े पर
पर घोड़ा है कि अड़ा हुआ अपनी जिद पर
एक भी कदम आगे न बढ़ने की कसम खाये हुए
जबकि नधा है वह गाड़ी में जुतने के लिए ही

कुछ न कुछ जोड़-घटाव करते हुए
जैसे अपने-आप से कहता है इक्कावान
लगता है ओलार हो गयी है गाड़ी
और जब भी ऐसा होता है
इक्का पलटने का खतरा होता है

आगे का कुछ पीछे
और पीछे का कुछ आगे कर रहा है इक्कावान
पर संतुलन ही नहीं बन पा रहा किसी भी तरह इक्के का
कोई सूरत नजर नहीं आ रही एक भी डग
आगे बढ़ पाने की

यह कैसा समय है भाई
कि मोटे और मोटाते-अघाते जा रहे हैं
कमजोर पतराते जा रहे हैं दिन-ब-दिन
कुछ बैठे हुए हैं पालथी मार कर
और तमाम के कंधे पीरा रहे हैं
कुछ डूबे हैं वैभव-विलास में आकंठ
जबकि तमाम लोगों के सूखते जा रहे हैं कंठ

एक चक्का सूरज की तरह
दूसरा चक्का फिरकी जइसा
ऐसे कैसे गाड़ी चल पायेगी भइया
इसी तरह सब होता रहा अगर
तब तो दुनिया ही ओलार हो जायेगी एक दिन
जिसका मर्म बूझते-समझते हैं
इक्कावान और घोड़े ही।