युवा कवि संजय सेन सागर हिन्द-युग्म के अब जाना पहचाना चेहरा बनते जा रहे हैं। जनवरी माह की प्रतियोगिता में भी इनकी कविता शीर्ष १० में आई है।
पुरस्कृत कविता- तिरंगे का चौथा रंग
तीन रंगों से बना था, ये तिरंगा
केसरिया, हरा और सफ़ेद
अब शरीक हो रहा है इसमें
एक नया रंग.
केसरिया बताता है त्याग, बलिदान को
हरा दर्शाता है हरियाली को,
सफ़ेद में समाई है शान्ति
उसी प्रकार यह चौथा रंग प्रतीक होगा
हमारी कमजोरी का, आतंकवाद की जीत का और
मासूमों के बहे खून का।
यह नया ''लाल रंग'' जो जमा है कारगिल के पत्थरों पर
यह वही रंग है जो निशानी है जयपुर,
गुजरात और दिल्ली की।
इस लहू जैसे रंग से ही पहचाना जाने लगा है मायानगरी को।
हर पल तिरंगे के नीचे बहता है, यह चौथा रंग
जिसके धब्बे दिखने लगे है तिरंगे पर,
इससे अच्छा ही है की शरीक हो जाये ये तिरंगे में!
यह लाल रंग बताएगा बेगुनाहों के खून को,
मासूमों की चीख को,
और हर दर्द को जिसकी कहानी जुड़ी हो लाल रंग से।
न लड़ना पड़ेगा हमें इन गुनाहगारों से, खून के सौदागरों से
क्योंकि ये सब भाग हो जायेंगे
हमारे संविधान के।
हमारी सरकारें रह सकेगी खामोश
और नमन कर सकेगी इस तिरंगे का
माफ़ कीजिये
चौरंगे का।
और हम ढल जायेंगे ''स्वतंत्रता दिवस''को गिनने में।
प्रथम चरण के जजमेंट में मिले अंक- ४, ४, ६
औसत अंक- ४॰६६६७
स्थान- सोलहवाँ
द्वितीय चरण के जजमेंट में मिले अंक- ४॰७, ५, ४॰६६६७ (पिछले चरण का औसत)
औसत अंक- ५॰७८८८
स्थान- चौदहवाँ
अंतिम चरण के जजमेंट में मिला अंक- ४
स्थान- सातवाँ
टिप्पणी- हिंदी के प्रखर आलोचक डा.रमाकांत शर्मा की यह मूल्यवान स्थापना है कि "विचार और दर्शन यदि कविता में सीधे-सीधे उतर आते हैं तो कविता का सौंदर्य नष्ट ही होगा। वह बोझिल और उबाऊ हो जायेगी। लेकिन वे ही अनुभव का हिस्सा बनकर जब संवेदनात्मक औए इंद्रियबोधात्मक रुप में प्रस्तुत होते हैं तब प्रभावी, विश्वसनीय और आत्मीय हो उठते हैं। इस तथ्य की उपेक्षा के कारण ही समकालीन कविता का अधिकांश हिस्सा पटरी से उतरा जान पड़ता है।" - इस कविता के साथ यहाँ यही हुआ है। तिरंगे के चौथे रंग की अभिव्यक्ति में कलात्मकता क्षीण हो गयी प्रतीत होती है।
पुरस्कार- ग़ज़लगो द्विजेन्द्र द्विज का ग़ज़ल-संग्रह 'जन गण मन' की एक स्वहस्ताक्षरित प्रति।




नवम्बर माह की यूनिकवि प्रतियोगिता की दूसरी कविता कवि संजय सेन सागर की है, जिसके माध्यम से कवि ने साहित्य को व्यवसाय समझने वालों पर वार किया गया है। साथ-साथ यह कविता एक सच्चे लेखक की भावनाओं को बयां करने का प्रयत्न करती है। म.प्र. के सागर जिले में पैदा हुए और सागर केन्द्रीय विश्वविधालय में बी.काम. द्वितीय वर्ष के छात्र कवि संजय सेन सागर की यह पहली रचना है, जिसे हिन्द-युग्म पर प्रकाशित किया जा रहा है। कवि को पिछले कुछ सालों से लिखने का शौक लगा है। मीडिया में जाना चाहते हैं, उसी दिशा में प्रयासरत हैं।

