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कुहरे के भीतर की बात और शब्दानुकूलित वायुमंडल


दिनेश कुमार शुक्ल की कविताएँ सपाट-बयानी और नारेबाजी से बहुत दूर हैं। इनकी कविताओं को पढ़कर पगडण्डी पर चलने का सुख और सुकूँ मिलता है, और ये पगडण्डियाँ गाँव और गाँव की त्रासदी जैसे सच तक या तो पहुँचती हैं या वहाँ से निकलती हैं। अब इन कविताओं से गुजर कर यदि आप बाज़ारों के शहर में खो जायें तो इसमें कवि का कोई दोष नहीं।

7. कुहरा

जैसे-जैसे होता है सूर्य उदय
कुहरा भी घना और घना होता जाता है
अपनी सफेद नीलिमा में कुहरा
दरअसल आकाश है बरसता हुआ
रेशा-रेशा उड़ता,
जैसे आँचल में
ढँक लेती है माँ अपने शिशु को
कुहरा ढँक लेना चाहता हे गोलमटोल बच्चे-सी पृथ्वी की

अमूर्तन से भरता हुआ संसार को
कुहरा हर चीज़ में
भरना चहता है और अधिक अर्थ
और अधिक आकार

कुहरा छल की रचना नहीं करता न फैलाता है मायाजाल
यह नुकीले कोनों और तीखी रेखाओं को
मद्धम करता हुआ, चुभन को कम करता,
यथार्थ को बनाना चाहता है और अधिक मानवीय

कुहरा संवेदना से गीला कर देता है
भयानक से भयानक बारूद को,
कुहरा प्रकाश को देता है प्रभामंडल
और अग्नि की लपेटों को
बनाता है स्निग्ध,
और जब वह समेट लेता है अपना रूप
तो वापस कर जाता है
धुली-पुँछी,
पहले से अधिक साफ
एक दुनिया

8. भीतर की बात

न बड़ा न छोटा
न खरा न खोटा
आदमी कोई एक समूची चीज़ नहीं
तमाम छोटे-छोटे जीवों का एक समूह है
छोटे-छोटे रागों की एक सिम्फनी,
छोटे-छोटे जीव और राग भी
आपस में न छोटे न बड़े
तभी न आदमी के भीतर
टकराने की आवाज़ें सुनाई देती हैं अकसर,
बड़े शहरों में छोटे-छोटे शहर,
एक-दूसरे के भीतर-बाहर फैले हुए
नन्द नगरी से नार्थ एवन्यू तक
तभी न इतने पहरे और पुलिस
भीतरी टक्कर रोकने के लिए,
राज की बात तो यह कि
हर विचार में घुसे बैठे हैं चार
या उससे भी अधिक विचार
तभी न हर विचार के भीतर मची है धमाचौकड़ी,
खुली-खुली सीधी-सी दिखती है जो बात
जाल बिछा है उसके भीतर
पेचीदा गलियों का
जिनमें भटकते ही जाना है-
इसीलिए लोग
सीधी सपाट बातों के भीतर घुसने से डरते हैं
वे उन बातों को बस मान लेते हैं चुपचाप
और कन्नी काट कर लेते हैं अपनी राह
और फिर उसी राह में भटकते चले जाते हैं...

ऊपर जो कुछ भी कहा गया है
अगर पढ़ रहा है कोई इसे
तो जान ले कि वह खुद भी इतिहास और भूगोल में
एस साथ फैली एक छोटी-सी जीविता आकाशगंगा है
और इतनी छोटी भी नहीं!


9. शब्दानुकूलन

ये बकरियाँ तो आपकी बलिदानी भावना को
समझने से रहीं
इसीलिए ये सींग टकरा ही देती हैं जब तब
और तिस भी जुर्रत
कि इनकी माँ ख़ैर भी मनाती रहती है......


बड़े ढीठ हैं कुछ शब्द
उन्हें आपके गम्भीर साहित्य की
गहराई से डर लगता है
आप जब घसीट कर लाते हैं उन्हें
तो कभी-कभी आपका लिखा सब फाड़ डालते हैं वे

मिला हूँ मैं उन बच्चों से
जो व्यस्क होने से कर देते हैं इनकार
और अपने बच्चों की वयस्कता पर
आँखें फाड़े खड़े रह जाते हैं

मैं जानता हूँ बहुत से मतदाताओं को
जिनके प्राण फड़फड़ाते हैं पोस्टरों की तरह
जब निकट आते हैं चुनाव

जानता हूँ मैं उन दिनों को
जो काटे कटते नहीं बल्कि लोग ही
कटते चले जाते हैं
ऐसे ही दिनों के भीतर भरी-दुपहर
रात फट-फट पड़ती है बारूद-सी

इस शब्दानुकूलित वायुमंडल में
क्या कहूँ मैं आपसे
जब एक शब्द के पास बचता है केवल एक ही अर्थ

आपके स्पष्ट विचारों
और आपकी सफल विभीषिकाओं
की अग्नि में जल रहा है संसार
कौन-सा सत्य अब उद्‍‍भासित करने जा रहे हैं आप!

अब मुझे डर लगता है
सच कहूँ तो आपसे
और अपने आप से

कविता की नई ज़मीन की इंटरनेट के राजमार्ग पर शोभायात्रा


दिनेश कुमार शुक्ल की कविताएँ कविता की बिलकुल नई ज़मीन तैयार करती हैं, जहाँ पर खड़ा होकर पाठक भी सच का आर-पार देख पाता है। पिछले सप्ताह हमने कवि के संग्रह 'कभी तो खुलें कपाट' से चंद कविताएँ आपको पढ़वाई थी, आज हम इनके नवीनतम कविता-संग्रह 'आखर-अरथ' से कुछ कविताएँ प्रकाशित कर रहे हैं। दिनेश शुक्ल कविताओं के माध्यम से आम आदमी के प्रति समाज, सभ्यता और सरकार द्वारा की जा रही साजिशों के खिलाफ़ आवाज़ उठाते हैं। आप खुद देखिए-

4. वह जगह

जा रही है लहर
पीछे छूटता जाता है पानी
लहर में पानी नहीं
कुछ और है जो जा रहा है

शब्द में टिकती नहीं कविता
न कविता में समाता अर्थ
थमता नहीं संगीत ध्वनि में
रंग रेखा रूप में रुकता नहीं है चित्र

जिया जितना
सिर्फ़ उतना ही नहीं जीवन,
आ रहा संज्ञान में जो
सिर्फ़ उतना ही नहीं सब कुछ

यहीं बिल्कुल आस-पास है कहीं वह जगह--
जहाँ अपनी सहज लय में गूँजता संगीत
होते हैं तरंगित अर्थ कविता के,
जहाँ साकार होते हैं सभी आकार अपने आप
जहाँ इतनी सघन है अनुभूति
जैसे गर्भ माता का
अँधेरी रात का तारों भरा आकाश
या फिर अधगिरी दीवार पर
फूले अकेले फूल की पीली उदासी
सघनता भी जहाँ जाकर विरल हो जाती!

किसी को दिख जाए शायद 'वह जगह'
वह जगह है आदमी के बहुत पास
कभी शायद कह सके कोई-
'यह रही वह जगह
ठीक बिल्कुल यहाँ, उँगली रख रहा हूँ मैं जहाँ!'

5. वैदर्भी रीति

अब मास्को के ऊपर
तैर रहा होगा सप्तर्षि मंडल
हवाई जहाज़ों के साथ

अब तुमने बन्द की होंगी
खिड़कियाँ रंगून में

बताना तो
क्या नाम है अब वियतनाम का

स्कूलों में क्या
माली अब भी तैयार करते हैं
फूलों की क्यारियाँ

बिल्कुल सच्ची है ख़बर कि दुबारा
फाँसी दी जाएगी भगत सिंह को

लाखों विचार
मस्तिष्क के अन्धकार में
टिमटिमा रहे हैं
इस अमावस की रात
मुझे लम्बी यात्रा पर जाना है

पढ़ना तुम
कल सुबह के अख़बार में
विदर्भ के किसानों ने
शुरू कर दिया है
एक बिल्कुल ही नयी
कविता-सी पृथ्वी का निर्माण

6. नया धरातल

नयी भूमि थी नया धरातल
ताँबे का जल जस्ते का फल
काँसे की कलियों के भीतर
चाँदी की चाँदनी भरी थी

पारे का पारावार मछलियाँ सोने की
था मत्स्य न्याय का लोहे जैसा अहंकार
निर्मल अकाट्य था
अष्टधातु का तर्क और
मरकतमणि के गहरे प्रवाल के जंगल थे,
जंगल में आँखें रह-रहकर जल उठती थीं फास्फोरस की

सिलिकन के मस्तिष्क में छुपी बुद्धि
शहर के स्कूलों में अपना चारा खोज रही थी
और टीन के किट-पतंग-मक्खियाँ-चींटे
चाट रहे थे नमक रक्त का
शोरे के पहाड़ थे जिनमें दबी पड़ी अभिव्यक्ति
दहकती थी जैसे बारूदी चुप्पी

अभ्रक की चट्टानों के थे सिद्धपीठ
पर्वत की ऊँची चोटी पर
गन्धक के बादल सोते थे
पत्थर की आँखें थीं उस युग के भाष्यकार की
नीलम की पुतलियाँ अचंचल
सधी हुई एकाग्र लक्ष्य पर
आखेटक-सी

इंटरनेट के राजमार्ग पर
शोभायात्रा निकल रही थी तत्त्वज्ञान की,
अर्थशास्त्र के सूचकांक में संचित था सारा संवेदन
राजनीति थी गणित, गणित में समीकरण थे
ज्यों ही मानुषगन्ध भरा कोई विचार
उस देश-काल में करता था संचार
घंटियाँ ख़तरे की बजने लगती थीं,
सब खिड़कियाँ और दरवाज़े
अपने आप बन्द जो जाते
चक्रव्यूह से बचकर कोई
बाहर नहीं निकल सकता था

आभ्यन्तर में फिर भी कोई
चिड़िया पिंजारा तोड़ रही थी
धुक् धुक् धुक् धुक्
धुक् धुक् धुक् धुक्