फटाफट (25 नई पोस्ट):

कृपया निम्नलिखित लिंक देखें- Please see the following links

उपन्यास के पात्र छोटू की पहचान तलाशती आकांक्षा पारे


आकांक्षा पारे कविता की युवा-उम्मीद हैं। आकांक्षा की संवेदक खोजबीन बहुत सूक्ष्म है। और सबसे बड़ी बात यह है कि कोमल भावनाओं का सिरा पकड़ कर पुरूषवादी व्यवस्था को तमाचा लगा देती हैं, पता भी नहीं चलता है। प्रस्तुत हैं इन्हीं की 2 कविताएँ-

पहचान

हम चलेंगे वहाँ
जहाँ गिरी होगी ताज़ा बर्फ़
धुनकी हुई रुई की तरह।

वहाँ चलने की तुम्हारी इच्छा भी
करेंगे पूरी
जहाँ
चिनार खाली हो जाते हैं
पत्ते गिरा कर

समुद्र के रेतीले किनारे पर
घुटनों तक उठाए
अपने कपड़े
हम चलेंगे साथ-साथ।

कच्चे पोखर के किसी किनारे पर बैठ कर
चखेंगे खट्टी अमिया
खाएँगे नमक में उबले बेर।

घने किसी जंगल में
सुनेंगे
धड़कनों के साथ नीरवता
और जहाँ भी इच्छा हो तुम्हारी
मैं चलूँगी तुम्हारे साथ।

बस इसके बदले
तुम मुझे ले चलना
सिर्फ एक जगह
जिसे तुम कहते हो घर
जहाँ रहती है तुम्हारी जननी और पिता।

उपन्यास का पात्र छोटू

अलसुबह छोटू उठ कर
भूख से जलती अतड़ियों से
जलाता है चूल्हा।

डाँट के साथ खाता है पाव
पैरों में बाँधता है चक्के
दौड़ता है पूरा दिन
उन लोगों की ज़रूरतों के लिए
जो
अड्डे पर बैठ साबित करते हैं अपनी बुद्धिजीविता
सुनाते हैं अपनी कविताएँ
सपना देखते हैं शब्दों से
आने वाली क्रांति का
चिंता करते हैं देश की
देश में बिखरे अनेक छोटुओं की
फिर सुनाते हैं गर्व से
किसी छोटू पर लिखी अपनी कविता
और प्रमाण देते हैं अपनी संवेदनशीलता का
सभा विसर्जीत करते हुए
बताना नहीं भूलते
'मेरा अगला उपन्यास इन्हीं बच्चों पर है'
बेचारे!

आकांक्षा पारे कहती हैं- खत्म हो गया है अच्छा आदमी


आकांक्षा पारे हिन्द-युग्म पर पहली बार शिरकत कर रही हैं। 18 दिसंबर 1976 को जबलपुर में जन्म आकांक्षा ने इंदौर से पत्रकारिता की पढ़ाई की। दैनिक भास्कर, विश्व के प्रथम हिंदी पोर्टल वेबदुनिया से होते हुए इन दिनों समाचार-पत्रिका आउटलुक में कार्यरत हैं। कई साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में कहानी-कविताएं प्रकाशित हो चुकी हैं। आज पढ़िए इन्हीं एक कविता॰॰॰॰

पुरस्कृत रचना

हर जगह मचा है शोर
खत्म हो गया है अच्छा आदमी
रोज आती हैं खबरें
अच्छे आदमी का सांचा
बेच दिया है ईश्वर ने कबाड़ी को
अच्छे आदमी होते कहाँ है
का ताना मारने से कोई नहीं चूकता
विलुप्त होते भले आदमी ने एक दिन
खोजा उस कबाड़ी को
और
मांग की उस सांचे की
कबाड़ी ने बताया
सांचा बिखर गया है टूट कर
बहुत छोटे-छोटे टुकड़ों में
भले आदमी को कभी-कभी
दिख जाते हैं वह टुकड़े
किसी बच्चे के रूप में जो
हाथ थामे बूढे की पार कराता है सड़क
भरी बस में बच्चा गोद में लिए
चढ़ती स्त्री के लिए
सीट छोड़ता युवा
चौराहे पर ट्रेफिक के बीच
मंदिर दिख जाने पर सिर नवाती लड़की
विलुप्त होता भला आदमी खुश है
टुकड़ों में ही सही
जिंदा है भलाई।

प्रथम चरण के जजमेंट में मिले अंक- ५, ६॰५, ६॰२
औसत अंक- ५॰८६६६७
स्थान- तीसरा


द्वितीय चरण के जजमेंट में मिले अंक- ५, ४, ५॰८६६६७ (पिछले चरण का औसत
औसत अंक- ४॰९५५५
स्थान- छठवाँ


पुरस्कार- कवि गोपाल कृष्ण भट्ट 'आकुल' द्वारा संपादित हाडौती के जनवादी कवियों की प्रतिनिधि कविताओं का संग्रह 'जन जन नाद' की एक प्रति।