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Monday, June 28, 2010

गली-गली द्वार-द्वार बच्चे हैं रो रहे


आपस के प्यार स्नेह, नींद में हैं सो रहे
और हम तो संबंध, भार लिये ढो रहे
रीति ये चली है कि, प्रीति को हराना है
आपस में प्यार करो, राग यह पुराना है
भाई-भाई के बीच दीवार खिंच गई
मंथरा अब कहती है, मौसम सुहाना है
मानवता, प्रेम, भाव अर्थ आज खो रहे
और हम तो संबंध भार लिये ढो रहे
आपस के प्यार...............................

नीम की टहनियों पर पियराये पात हैं
शकुनी की अंगुली पर अनचाहे घात हैं
दुल्हन को लूट लिया दानवी दहेज ने
और हम तो हत्यारी लौटी बारात हैं
नफरत की गीता बना कर संजो रहे
और हम तो संबंध भार लिये ढो रहे
आपस के प्यार...........................

बौराया सागर है आज हर किनारे पर
फिर भी बंद सांकल है रिश्तों के द्वारे पर
पेट की ज्वाला है धधक रही और तेज
छोड़ कर गई है मां किसके सहारे पर
गली-गली द्वार-द्वार बच्चे हैं रो रहे
और हम तो संबंध भार लिये ढो रहे
आपस के प्यार.....................

कवि- मृत्युंजय साधक

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7 कविताप्रेमियों का कहना है :

M VERMA का कहना है कि -

मानवता, प्रेम, भाव अर्थ आज खो रहे
और हम तो संबंध भार लिये ढो रहे

आज के हालात की सुन्दर रचना

निर्मला कपिला का कहना है कि -

बौराया सागर है आज हर किनारे पर
फिर भी बंद सांकल है रिश्तों के द्वारे पर
पेट की ज्वाला है धधक रही और तेज
छोड़ कर गई है मां किसके सहारे पर
गली-गली द्वार-द्वार बच्चे हैं रो रहे
और हम तो संबंध भार लिये ढो रहे
आज के सच को बहुत बडिया तरह से नये बिम्बों से सजाया है---बन्द सांकल-- रिश्ते के दुआरे पर वाह। बधाइ

डा. अरुणा कपूर. का कहना है कि -

पेट की ज्वाला है धधक रही और तेज
छोड़ कर गई है मां किसके सहारे पर
गली-गली द्वार-द्वार बच्चे हैं रो रहे
और हम तो संबंध भार लिये ढो रहे

...आज के समाज का यथार्थ चित्रण है!

संगीता पुरी का कहना है कि -

बहुत बढिया !!

निखिल आनन्द गिरि का कहना है कि -

''नीम की टहनियों पर पियराये पात हैं
शकुनी की अंगुली पर अनचाहे घात हैं''
ये बेहतरीन है...लय में कई दिनों से नहीं लिखा...आपको पढ़कर मन कर गया....कविता शुरुआत में थोड़ी ढीली है मगर अंत आते-आते गज़ब ढाती है.....

sada का कहना है कि -

बौराया सागर है आज हर किनारे पर
फिर भी बंद सांकल है रिश्तों के द्वारे पर
पेट की ज्वाला है धधक रही और तेज
छोड़ कर गई है मां किसके सहारे पर,

बहुत खूब लिखा है आपने, बेहतरीन ।

डा.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी का कहना है कि -

बौराया सागर है आज हर किनारे पर
फिर भी बंद सांकल है रिश्तों के द्वारे पर
पेट की ज्वाला है धधक रही और तेज
छोड़ कर गई है मां किसके सहारे पर
गली-गली द्वार-द्वार बच्चे हैं रो रहे
और हम तो संबंध भार लिये ढो रहे
आपस के प्यार.....................
साधक जी की श्रेष्ट काव्य साधना
संबन्ध-भार को उतारने की है आराधना/

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