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Tuesday, December 08, 2009

दोहा गाथा सनातन: ४६ मनहरण (कवित्त/घनाक्षरी) छंद


दोहा गाथा सनातन: ४६

काव्य रसिकों!

'दोहा गाथा सनातन' के समापन से पहले दोहा के लक्षणों से समय रखते कुछ लोकप्रिय छंदों की चर्च में आल हम मनहरण (कवित्त/घनाक्षरी) छंद से साक्षात् करते हैं.

मनहरण छंद एक वर्णिक छंद है जबकि दोहा मात्रिक छंद है. मनहरण छंद का पदभार गिनाते समय दोहा की तरह मात्रा न गिनें अपितु लघु-गुरु का भेद भूलकर हर अक्षर को एक ही गिनें.

दोहा में दो पद और चार चरण होते हैं. मनहरण में चार पद होते हैं. दोहा में १३-११ पर विराम होता है मनहरण में १६-१५ पर. मनहरण के हर पद में ८,८,८ और ७ पर यति होती है. मनहरण में अंतिम वर्ण गुरु होना आवश्यक है.

पढने में ये बंधन प्रारंभ में कठिन प्रतीत होते हैं किन्तु कुछ छंदों को लगातार दोहराने के बाद मन में लय बैठ जाये तो सहज ही भाव मनहरण के रूप में ढल कर व्यक्त हो पाते हैं. आइये! कुछ कवित्तों का रसपान करें:

१.
सुनिए विटप वर, पुहुप तिहारे हम, रखिहो तो सोभा हम, राबरी बढायेंगे.
तजिहों हरिष के तो, विलग न माने कछु, जहाँ-जहाँ जैहें, तहाँ दूनो जस गायेंगे.
सुर न चढ़ेंगे नर, सिर न चढ़ेंगे फेरि, सुकवि अनीस हाथ, हाथन बिकायेंगे.
देस में रहेंगे, परदेस में रहेंगे, काहू- भेस में रहेंगे तऊ, राबरे कहायेंगे.

२.
सिसिर में ससि को सरुप पावै सविता हूँ, घाम हूँ में चाँदनी की दुति दमकति है.
'सेनापति' होत सीतलता है सहस गुनी, रजनी की झाईं बासर में झलकति है.
चाहत चकोर, सूर ओर दृग छोर करी, चकवा की छाती तजि धीर धसकति है.
चंद के भरम होत, मोद है कुमोदिनी को, ससि-संक पंकजनी फूलि न सकति है.

३.
मातु शारदा के ज्ञानदा के चारु चरणों का, ध्यान धर धीरों के गुणानुवाद गाइए.
प्राण वार दीजिये, कृपान की कृपा पै आज, वीरों की बहादुरी का, सुयश सुनाइए.
काम वासना के मीत, प्रीत-गीत जो बने हैं, गा के राग, राग के न काग बन जाइए.
भेद नायिका के, जो लिखे गए लकीर पीट, छोड़ के अतीत, नए गीत आज गाइए.

४.
भारती की आरती उतारिये 'सलिल' नित, सकल जगत को सतत सिखलाइये.
जनवाणी हिंदी को बनायें जगवाणी हम, भूत अंगरेजी का न शीश पे चढ़ाइये.
बैर ना विरोध किसी बोली से तनिक रखें, पढ़िए हरेक भाषा, मन में बसाइये.
शब्द-ब्रम्ह की सरस साधना करें सफल, छंद गान कर रस-खान बन जाइए.

यदि आप किसी विशेष छंद की चर्चा या शंका का समाधान चाहते हों तो बतायें. ३० दिसंबर की कड़ी से इस लेखमाला का समापन होगा. सभी नए-पुराने सहभागी
आदि से अंत तक के अध्यायों और गोष्ठियों पर दृष्टिपात कर सकें तो उन्हें लाभ होगा

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Acharya Sanjiv Salil

http://divyanarmada.blogspot.com

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15 कविताप्रेमियों का कहना है :

Devendra का कहना है कि -

वाह!

Anonymous का कहना है कि -

दोहों की रचना का ज्ञान कराया बहुत अच्छा लगा
धन्यवाद
विमल कुमार हेडा

विनोद कुमार पांडेय का कहना है कि -

भारती की आरती उतारिये 'सलिल' नित, सकल जगत को सतत सिखलाइये.
जनवाणी हिंदी को बनायें जगवाणी हम, भूत अंगरेजी का न शीश पे चढ़ाइये.
बैर ना विरोध किसी बोली से तनिक रखें, पढ़िए हरेक भाषा, मन में बसाइये.
शब्द-ब्रम्ह की सरस साधना करें सफल, छंद गान कर रस-खान बन जाइए.

sharad ma ki jay ..badhiya jnan se labrej prstuti..salil ji bahut bahut aabhar yah jnan sahity ke liye bahut hi upyogi hai..pranam sanjeev ji

ह्रदय पुष्प का कहना है कि -

आचार्य जी आभार और धन्यवाद् - निश्चित ही हम सभी को आपके द्वारा प्रदत्त ज्ञानमय प्रस्तुति का लाभ उठाना चाहिए. लेखमाला का समापन व्यक्तिगत रूप से मेरे लिए एक कमी रहेगी - सादर
-------------
राकेश कौशिक

Manju Gupta का कहना है कि -

आदरणीय गुरु जी ,
सादर नमस्ते .
ज्ञानप्रद मनहरन का उत्कृष्ट ज्ञान मिला . हार्दिक धन्यवाद .लिखने की कोशिश की है -
हिन्दुस्तान का बाना,तो हो हिन्दू का ताना ,देकर सच की मेवा , करें जगत सेवा .

मानवीयता के दिल ,सा हो मानव का मन , अहिंसा का परिचय , से जग दंग
होगा .

भारतीयता को पहन ,हो भारतीय को गर्व , बनाये 'शांति भवन ' ,मैत्री का वास होगा .

नव -नव चेतना से , एकता -सम भाव से ,नर से नर का मन , फिर जुड़ जाएगा .

डा. श्याम गुप्त का कहना है कि -

आचार्य जी, घनाक्षरी गण बद्ध छन्द है तो उसमे कौन- कौन से गण व अन्त मै कौन गण आना चाहिये , यह तो बताया ही नहीं।

KAVITA RAWAT का कहना है कि -
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KAVITA RAWAT का कहना है कि -

सुर न चढ़ेंगे नर, सिर न चढ़ेंगे फेरि, सुकवि अनीस हाथ, हाथन बिकायेंगे.
देस में रहेंगे, परदेस में रहेंगे, काहू- भेस में रहेंगे तऊ, राबरे कहायेंगे.

Manharan chhand bahut achha laga.
Nisandeh aap hindi sahitya ke prati logon ka dhyan aakrasht karne ki immandaar koshish kar rahen hain.... bahut achha lagta hai yaisa hindi prem ...

Navneet Rai का कहना है कि -

परम पूज्यवर , अतीव उम्दा प्रेरक घनाक्षरी रचनाएँ पढ़कर मन को सुकून मिला । विनम्र प्रणाम ।

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