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Monday, September 21, 2009

सुबह एक खरगोश!


सुबह-
एक खरगोश की तरह है.
मैं यह खरगोश
आरामकुर्सी पर बैठे
दादाजी को देना चाहता हूँ
ताकि वे इसे
दुलारते-पुचकारते रहें.
और उन्हें अपना बचपन
याद आता रहे कि
वे भी ऐसे ही,
खरगोश की तरह
घर-आँगन में
दौड़ते-फिरते थे...
जब वे बच्चे थे.
मैं यह खरगोश
उस बच्चे को भी
देना चाहता हूँ, जो
अभी दौड़ तो नहीं सकता.
पर खुश होता रहेगा
उछल-कूद करते
खरगोश को देख कर..
लेकिन मैं यह खरगोश
उस नौजवान को दूंगा
जो रोटी कमाने की जुगत में
बेतहाशा दौड़ रहा है..
दुपहर में सूरज ठीक
आँगन के ऊपर चमकेगा और
चिड़ियों की चहचहाहट
बाहर पेड़ पर नहीं,
आँगन के इस पार बने
रोशनदान से सुनाई देगी.
जब सूरज आँगन से
जा चुका होगा, तब
दादाजी और बच्चा
फिर चाहेंगे
खरगोश पाना और
मन बहलाना.
मैंने तय कर लिया था कि
मैं यह खरगोश
नौजवान को ही दूंगा जो
उदास आँखों से
कभी दादाजी और
कभी बच्चे को देख रहा है.
और सोच रहा है कि...
दादाजी बहुत दौड़ लिए
अब उनके
आराम करने के दिन है.
और बच्चा!
अभी से ही दौड़ कर
क्या करेगा...
उसके दौड़ने में तो
अभी बहुत बरस बाकी हैं.
'दौड़ना तो मुझे है'
सोचता है नौजवान.
और ठीक उसी पल
कर दिया, मैंने
उसके हवाले खरगोश.
दादाजी और बच्चा-
नौजवान और खरगोश को
दौड़ते हुए देख कर
बेहद खुश हैं.
पर मैं उदास हूँ
यह देख कर कि
दौड़ में नौजवान
पिछड़ रहा है...
और शाम तेजी से
घिरती जा रही है!

--सुधीर सक्सेना 'सुधि'

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9 कविताप्रेमियों का कहना है :

विनोद कुमार पांडेय का कहना है कि -

ek sundar bhav liye kavita ..
achchi lagi...badhayi sudhir ji

Nirmla Kapila का कहना है कि -

वाकई बहुत सुन्दर लाजवाब कविता है आज बुजुर्ग लोगों की जो हालत हो रही है उसे बडी संवेदना से उकेरा है शुभकामनायें

Disha का कहना है कि -

सुन्दर रचना सुन्दर भावों के साथ

Manju Gupta का कहना है कि -

सुधि जी नौजवानों को सुस्ती से जगाना चाहते हैं .खरगोश के माध्यम से उन्हें क्रियाशील होने का संदेश दे रहें हैं .बधाई

शोभना चौरे का कहना है कि -

teeno pidhi ki bhavnao ko bahut achhe se vykt karti sundar rachna
badhai

SUNIL DOGRA जालि‍म का कहना है कि -

तीनो को एक-एक खरगोश दे दो या दादा जी ही दे दो बेचारे अकेले मायूस हो जायेंगे.. नौजवान को नौकरी खोजने दो ....


वैसे भाव लाजवाब हैं

Sumita का कहना है कि -

सच है आज का नौजवान नौकरी के लिए तो भाग दौड कर रहा है लेकिन भ्रश्टाचार के चलते वह हार चुका है..उसकी बडी-बडी डिग्रियां किसी काम की नहीं..संवेदन्शील भाव के लिये बधाई।

Anonymous का कहना है कि -

कविता ना तो बुजुर्गों की हालत पर है और ना सुधी जी नौजवानों को सुस्‍ती से जगाना चाहते हैं, ना ही बच्‍चा, नौजवान और दादाजी को एक एक खरगोश मिल सकता है। सुधी जी का खरगोश एक सुबह की तरह है, वह सुबह जिसकी आस सभी को है, दुख यही है कि बच्‍चे और दादाजी के हाथ में खरगोश आया नहीं और खरगोश के साथ नौजवान दौड में पिछड़ रहा है, वह रात अभी गई नहीं और वह सुबह अभी हाथ आई नहीं।
-अमित

Shamikh Faraz का कहना है कि -

पूरी कविता में खरगोश को केंद्र मानकर जो बात कही गई है वहढंग बढ़िया लगा.

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