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Monday, July 27, 2009

मौलवी थे वो तपस्या में रहे थे दिन भर


दिल ने तन्हाई के लम्हात चुगे थे दिन भर
और आँखों में मेरी अश्क छुपे थे दिन भर

मौलवी थे वो तपस्या में रहे थे दिन भर
उन की चौखट पे कई लोग रुके थे दिन भर

प्यार इस शह्र में इक शख्स था कल बाँट रहा
उस के क़दमों में बहुत लोग गिरे थे दिन भर

शब की आगोश में बेसुध से पड़े जिस लम्हा
सिर्फ इस बात पे खुश थे कि चले थे दिन भर

कोई सीने से लगा और कोई बेगानावार
थी तसल्ली कि कुछ अफरात मिले थे दिन भर

जश्न तो आया मगर दिल को दरीदः कर के
सब इसी बात पे अफ़सोस किये थे दिन भर

उन को मज़हब का जुनूँ था कि सियासत की लगन
हमने जलते वे मकानात गिने थे दिन भर

हम सुखनवर तो नहीं थे कोई ग़ालिब जैसे
बस खयालात ही कागज़ पे लिखे थे दिन भर

(अफरात = लोग, दरीदः कर के = चीर कर)

(बह्र = फाइलातुन फइलातुन फइलातुन फेलुन
2122 1122 1122 22)

कवि- प्रेमचंद सहजवाला

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13 कविताप्रेमियों का कहना है :

M.A.Sharma "सेहर" का कहना है कि -

दिल ने तन्हाई के लम्हात चुगे थे दिन भर
और आँखों में मेरी अश्क छुपे थे दिन भर

जश्न तो आया मगर दिल को दरीदः कर के
सब इसी बात पे अफ़सोस किये थे दिन भर

उम्दा शेर ..
बहुत खूब लिखा !!

Nirmla Kapila का कहना है कि -

खूबसूरत गज़ल है
उन को मज़हब का जुनूँ था कि सियासत की लगन
हमने जलते वे मकानात गिने थे दिन भर
लाजवाब शेअर है

Manju Gupta का कहना है कि -

खुबसूरत शेर से भरी ग़ज़ल है .बधाई .

manu का कहना है कि -

प्यार इस शह्र में इक शख्स था कल बाँट रहा
उस के क़दमों में बहुत लोग गिरे थे दिन भर

सारी गजलही बहुत बहुत खूबसूरत है ...
पर इस शे'र को पढ़ते ही राखी सावंत की याद आ गयी,,,
:)

Shamikh Faraz का कहना है कि -

वैसे तो पूरी गज़ल है खूबसूरत है लेकिन ये शे'र कुछ ज्यादा ही पसंद आये.

प्यार इस शह्र में इक शख्स था कल बाँट रहा
उस के क़दमों में बहुत लोग गिरे थे दिन भर

उन को मज़हब का जुनूँ था कि सियासत की लगन
हमने जलते वे मकानात गिने थे दिन भर

हम सुखनवर तो नहीं थे कोई ग़ालिब जैसे
बस खयालात ही कागज़ पे लिखे थे दिन भर

RC का कहना है कि -

जश्न तो आया मगर दिल को दरीदः कर के
सब इसी बात पे अफ़सोस किये थे दिन भर

उन को मज़हब का जुनूँ था कि सियासत की लगन
हमने जलते वे मकानात गिने थे दिन भर

हम सुखनवर तो नहीं थे कोई ग़ालिब जैसे
बस खयालात ही कागज़ पे लिखे थे दिन भर

Yeh ashaar pasand aaye.

Pranaam
RC

sada का कहना है कि -

दिल ने तन्हाई के लम्हात चुगे थे दिन भर
और आँखों में मेरी अश्क छुपे थे दिन भर


बहुत ही बेहतरीन रचना बधाई ।

SURINDER RATTI का कहना है कि -

उन को मज़हब का जुनूँ था कि सियासत की लगन
हमने जलते वे मकानात गिने थे दिन भर

हम सुखनवर तो नहीं थे कोई ग़ालिब जैसे
बस खयालात ही कागज़ पे लिखे थे दिन भर
Prem Ji, Bahut sunder maza aagaya ...
Surinder

Disha का कहना है कि -

उन को मज़हब का जुनूँ था कि सियासत की लगन
हमने जलते वे मकानात गिने थे दिन भर
बहुत ही बढिया शेर, सुन्दर रचना

मुहम्मद अहसन का कहना है कि -

नया तर्ज़, नयी बात , नयी तश्बीहात ,
कुल मिला कर बहुत अच्छी ग़ज़ल लेकिन कुछ अशुद्धियाँ जिन्हें इंगित करना ज़रूरी
'शब की आगोश ' = शब के आगोश
'कुछ अफरात मिले थे' = मेरे विचार से लफ्ज़ अफराद ( फर्द का बहुबचन) हो गा. फर्द माँ'आने आदमी
'सब इसी बात पे अफ़सोस किये थे दिन भर ' = खड़ी बोली के हिसाब से यह गलत है. ऐसा न लिखा जाता है, न बोला जाता है, पूर्वी उत्तर प्रदेश में यह आम बोल चाल में अक्सर मिल जाए गा लेकिन लिखने में यह व्याकरण प्रयोग नहीं होती है
-मुहम्मद अहसन

निखिल आनन्द गिरि का कहना है कि -

बड़े दिनों बाद आपको पढ़ा...अच्छा लगा...

rachana का कहना है कि -

सुंदर ग़ज़ल ये शेर पसंद आये
प्यार इस शह्र में इक शख्स था कल बाँट रहा
उस के क़दमों में बहुत लोग गिरे थे दिन भर

उन को मज़हब का जुनूँ था कि सियासत की लगन
हमने जलते वे मकानात गिने थे दिन भर
सादर
रचना

mamta का कहना है कि -

खूबसूरत गज़ल है.बधाई
दिल ने तन्हाई के लम्हात चुगे थे दिन भर
और आँखों में मेरी अश्क छुपे थे दिन भर
प्यार इस शह्र में इक शख्स था कल बाँट रहा
उस के क़दमों में बहुत लोग गिरे थे दिन भर

mamta kiran

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