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Tuesday, February 17, 2009

तुझ में समाहित हो जाती हूँ


तुम उलझे मांझे से
मेरे जीवन में आते हो
सुकून से छत पर पसर जाते हो
पर सुलझाते हुए उनको
मै ख़ुद ही उलझ जाती हूँ

चाँद
जो तुम्हारा प्रतिबिम्ब है
इन ऊँची इमारतों में कहीं खो जाता है
उस को ढूंढने की अभिलाषा में
मै मंजिल दर मंजिल चढ़ती जाती हूँ

तुम्हारी हथेलियों में
रख अपना चेहरा
पिघलती हूँ
तुझमे खो के ख़ुद को पाती हूँ
स्नेह बूंद पी के
मै नशे में बौरा जाती हूँ

यादों की सिकुडी चादर
जो फैलाती हूँ
तुम्हारे शब्द
मेरी हथेलियों पर चढ़ गुदगुदाते है
कहते हैं ,मुझको सोच रही थी न
मै लज्जा जल से नहा जाती हूँ

दिल की गीली ज़मीं से
सांसों की गर्माहट तक
उनीदें ख्वाबों से जगती रातों तक
अलसाई उमंगों के
तरंगित होने और डूबने तक
मै तुझ से जन्म ले तुझ में समाहित हो जाती हूँ

--रचना श्रीवास्तव

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10 कविताप्रेमियों का कहना है :

manu का कहना है कि -

तुम्हारे शब्द,,,,,,,,,मेरी हथेलियों पर चढ़ गुनगुनाते हैं,,,,,,,,
मुझको सोच रही थी न,,,,??

मैं लज्जा जल से नहा जाती हूँ,,,,,,,,,,,,
मन को छूते ...गहराई तक छूते ......
असरदार शब्द............लाजवाब रचना......

प्रथम पाठक की बधाई स्वीकारें रचना जी.....

sangeeta का कहना है कि -

रचना जी,
उलझे मांझे का प्रयोग पहली बार पढ़ा ...अच्छा लगा एक नई सोच लायीं हैं आप .
तुम्हारे शब्द
मेरी हथेलियों पर चढ़ गुदगुदाते है
कहते हैं ,मुझको सोच रही थी न
बहुत सुंदर अभिव्यक्ति है.
बहुत ही खूबसूरती से ख़ुद को समाहित कर लिया जहाँ से जन्म लिया था....
अच्छी कृति के लिए बधाई

अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -

सुंदर रचना के लिए बधाई |

-- अवनीश तिवारी

neeti sagar का कहना है कि -

रचना जी मुझे तो आपकी रचना की प्रत्येक पंक्ति अच्छी लगी! आप बहुत अच्छा लिखती है! आपको मेरी बहुत-बहुत बधाई!

तपन शर्मा का कहना है कि -

रचना जी.. बहुत अच्छी प्रेम कविता...

rachana का कहना है कि -

आप सभी के कोमल शब्दों का धन्यवाद .ये शब्द मेरी धरोहर है मेरी पूंजी है इनको मै हृदय के कोष्ट में बंद कर के रखती हूँ
क्यों की येही है जो मुझको लिखने की प्रेरणा देते हैं
रचना

neelam का कहना है कि -

दिल की गीली ज़मीं से
सांसों की गर्माहट तक
उनीदें ख्वाबों से जगती रातों तक
अलसाई उमंगों के
तरंगित होने और डूबने तक
मै तुझ से जन्म ले तुझ में समाहित हो जाती हूँ

mai wo yaad hoon ,jo kabhi mitna nahi chaahti ,
rachna ji aapki sohbat me to hum bhi...............

विश्व दीपक ’तन्हा’ का कहना है कि -

एक सुलझी हुई रचना के लिए बधाई स्वीकारें।

-विश्व दीपक

vinodni का कहना है कि -

रचना जी बहुत खूब .कविता का एक एक शब्द ख़ुद कविता है
बधाई
विनोदनी

Harihar का कहना है कि -

बहुत ही सुन्दर कविता रचनाजी!

तुम्हारी हथेलियों में
रख अपना चेहरा
पिघलती हूँ
तुझमे खो के ख़ुद को पाती हूँ
स्नेह बूंद पी के
मै नशे में बौरा जाती हूँ

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