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Tuesday, November 25, 2008

पैसे की कीमत


प्रतियोगिता की शीर्ष १० कविताओं में से ८वीं कविता का रसास्वादन शेष है। इस स्थान की कविता की रचयिता स्मिता मिश्रा लखनऊ से हैं और परास्नातक कर चुकी हैं। इनका मानना है कि इन्होंने नौकरी बहुत की लेकिन चाकरी कभी नहीं की। स्वभावतः घुम्मकड़ हैं। स्वयम् के लिए लेखन करती हैं। कविता और कला से गहरी दोस्ती रखती हैं। संवेदना और शब्दों के बीच गठजोड़ कायम करने की कोशिश में जो बनता है उसे ये कविता मानती हैं।



पुरस्कृत कविता

पैसा मिलता है,
तो लेता है अपनी कीमत
हम चुकाते हैं जिसे,
अपने समय से
अपने प्रेम के क्षणों से
अपने सुकून के अंधेरे कोनों से
जाड़े की अंगीठी की गर्माहट के
वंचित सुख से
और
अपने साथी के मौन वियोग से



प्रथम चरण के जजमेंट में मिले अंक- ६, ४, ६, ५॰३
औसत अंक- ५॰३२५
स्थान- पंद्रहवाँ


द्वितीय चरण के जजमेंट में मिले अंक- ६, ५, ५॰३२५ (पिछले चरण का औसत)
औसत अंक- ५॰४४
स्थान- आठवाँ


पुरस्कार- कवयित्री पूर्णिमा वर्मन की काव्य-पुस्तक 'वक़्त के साथ' की एक प्रति।

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14 कविताप्रेमियों का कहना है :

manu का कहना है कि -

itne kam shabd, itni chhoti kavita aur us mein itna kuchh...!!ek bada kamaal..... apne jeevan ke behad kareeb....

सीमा सचदेव का कहना है कि -

आज की आपाधापी की और पैसे की होड़ में जिस तरह हम भाग रहे है ,उसपे बिल्कुल सटीक बैठती है आपकी कविता | इस भागमभाग में हम कितना कुछ छोड़ रहे है हमें स्वयम पता नही चलता | सच्च है पैसा अपनी कीमत वसूल करता है और हमें उसकी अच्छी खासी कीमत चुकानी पड़ती है ...न चाह कर भी | अच्छी रचना के लिए बहुत-बहुत बधाई ....सीमा सचदेव

devendra का कहना है कि -

पैसे की बहुत बड़ी कीमत समझाई आपने स्मिता जी ।
अच्छी रचना के लिए बधाई।
-देवेन्द्र पाण्डेय।

neelam का कहना है कि -

आपकी कविता तो गागर में सागर को समेटे है ,

Sehar का कहना है कि -

अर्थपूर्ण संचिप्त मैं बहुत कुछ कह दिया
संवेदना और शब्दों का सही तालमेल .
सुंदर !!

Anonymous का कहना है कि -

मुझे कविता बस ठीक लगी कुछ खास नही
महेश

rachana का कहना है कि -

सच कटु होता है पर सच तो फ़िर सच ही है पैसा तो चाहिए बस सोचना ये है की किस कीमत पे और कितनी कीमत पे .अच्छा लिखा है आप ने
रचना

विश्व दीपक ’तन्हा’ का कहना है कि -

सीधी-सपाट बातें हृदय को अमूमन छू हीं जाती हैं। लेकिन असर तभी होता है, जब हर्ष,विषाद या फिर दर्शन अपनी पराकाष्ठा पर हो। इसमें असर वाली बात की कुछ कमी लगी।
ध्यान देंगी!!!

-विश्व दीपक ’तन्हा’

MUFLIS का कहना है कि -

..zindgi ke kai anubhav aksar un.kahe reh jaate haiN..lekin aapki ye rachna kuchh kehti hai... maano kitne diloN ki khaamosh dhadhkanoN ko zubaaN de di aapne. badhaaee. ---MUFLIS---

anju का कहना है कि -

very good ,keep it up

sahil का कहना है कि -

smita ji,aapki kavita ke bhaw to bahut damdaar hain,aur sach maaniye sidhe hriday mein utar bhi gaye,par,shayad kuchh aur mehnat ki darkar hai aapki kavita ko aapse.shubhkamnayein.
ALOK SINGH "SAHIL"

तपन शर्मा का कहना है कि -

अच्छा लिखा है स्मिता जी..सच्ची बात कम शब्दों में..
बधाई..

Anonymous का कहना है कि -

bahut achha aur sachha likha hai..

manu का कहना है कि -

mujh par kiye itne bhaari bharkam coment ke liye shukriyaa aapka .........is laayak kahaan hoon main.....

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