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Wednesday, October 22, 2008

मौत वरेंगे पर न मरेंगे


प्रतियोगिता के ९वें स्थान की कविता के रचयिता आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' का बहुत लम्बा परिचय हमें प्राप्त हुआ हैं। हम कम शब्दों में इनका परिचय देने का प्रयास कर रहे हैं। बहुमुखी प्रतिभा के धनी आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' एक व्यक्ति मात्र नहीं अपितु संस्था भी है. अपनी बहुआयामी गतिविधियों के लिए दूर-दूर तक जाने और सराहे जा रहे सलिल जी ने हिन्दी साहित्य में गद्य तथा पद्य दोनों में विपुल सृजन कर अपनी स्वतंत्र पहचान बनाई है. गद्य में कहानी, लघु कथा, निबंध, रिपोर्ताज, समीक्षा, शोध लेख, तकनीकी लेख, तथा पद्य में गीत, दोहा, कुंडली, सोरठा, गीतिका, ग़ज़ल, हाइकु, सवैया, तसलीस, क्षणिका, भक्ति गीत, जनक छंद, त्रिपदी, मुक्तक तथा छंद मुक्त कवितायेँ सरस-सरल-प्रांजल हिन्दी में लिखने के लिए बहु प्रशंसित सलिल जी शब्द
साधना के लिए भाषा के व्याकरण व् पिंगल दोनों का ज्ञान व् अनुपालन अनिवार्य मानते हैं. उर्दू एवं मराठी को हिन्दी की एक शैली मानने वाले सलिल जी सभी भारतीय भाषाओं को देवनागरी लिपि में लिखे जाने के महात्मा गाँधी के सुझाव को भाषा समस्या का एक मात्र निदान तथा राष्ट्रीयता के लिए अनिवार्य मानते हैं.
श्री सलिल साहित्य सृजन के साथ-साथ साहित्यिक एवं तकनीकी पत्रिकाओं और पुस्तकों के स्तरीय संपादन के लिए समादृत हुए हैं. वे पर्यावरण सुधार, पौधारोपण, कचरा निस्तारण, अंध श्रद्धा उन्मूलन, दहेज़
निषेध, उपभोक्ता व् नागरिक अधिकार संरक्षण, हिन्दी प्रचार, भूकंप राहत, अभियंता जागरण आदि कई क्षेत्रों में एक साथ पूरी तन्मयता सहित लंबे समय से सक्रिय हैं. ९ कृतियाँ प्रकाशित, २५ अप्रकाशित पाण्डुलिपियाँ, ८ पत्रिकाओं, १४ स्मारिकाओं और ९ पुस्तकों का सम्पादन। ११ संस्कृत स्तोत्र और २ अंग्रेज़ी काव्यकृतियों का हिन्दी काव्यनुवाद। ६० से अधिक सम्मान।

पुरस्कृत कविता-
नव-गीत


दीप-वर्तिका सदृश जलेंगे
आपद-विपदा विहंस सहेंगे...
मौत वरेंगे पर न मरेंगे

हैं लघु कण यह सत्य जानते,
पर विराट से समर ठानते.
पचा न पायें आप हलाहल,
धार कंठ में-हम उबारते.
शिवता-सुन्दरता के पथ पर-
सत का कर गह-नित्य बढ़ेंगे...
मौत वरेंगे पर न मरेंगे

कहीं न परिमल हर दल दलदल.
भ्रमर-दंश से दंशित शतदल.
सलिल धार अनवरत प्रवाहित.
शब्द अमरकंटक-से प्रति पल.
लोक नर्मदा नीति वर्मदा
कार्य शर्मदा सतत करेंगे...
मौत वरेंगे पर न मरेंगे

अजर-अमर हैं हम अक्षर हैं.
नाद-ताल हैं सरगम-स्वर हैं.
हम अनादि हैं,हम अनंत हैं.
सादि-सांत हम क्षण-भंगुर हैं..
सच कहते हैं सब जग सुन ले,
मौत वरेंगे
पर न मरेंगे,..



प्रथम चरण के जजमेंट में मिले अंक- ८॰२५, ५, ६, ८, ४, ६॰३५
औसत अंक- ६॰२६६६६७
स्थान- पाँचवाँ


द्वितीय चरण के जजमेंट में मिले अंक- ४, ४॰५, ६॰२६६६७ (पिछले चरण का औसत)
औसत अंक- ४॰९२२२
स्थान- नौवाँ


पुरस्कार- कवि शशिकांत सदैव की ओर से उनकी काव्य-पस्तक 'औरत की कुछ अनकही'

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6 कविताप्रेमियों का कहना है :

निखिल आनन्द गिरि का कहना है कि -

कविता में प्रवाह भी है और संदेश भी....बेहद प्रभावी रचना.....

उत्पल कान्त मिश्रा "नादां" का कहना है कि -

acchi kriti ... kintu darshan ke bimbatmak prayog par kuch tipaani ... aasha hai sakratmak roop main lenge ...


हम अक्षर हैं.

sadhoovaad .... akshar ka darshan wa adyaatm aaj luptpraay ho chuka hai .... usko sakaratmak swaroop main punar jeevan dainain ka dhanyawaad ..... akshar hi dason mahavidyaaaon ka mool hain ..... a , ka , ta , ta ..... aadi ...

हम अनादि हैं,
हम अनंत हैं.

yadi aatm ke vishay main yeh panktiyaan hain ya aatma ke vishay main to sriman na to koi aatma anadi hai na ananat .... anadi wa ananat kewal brahm hain ... brahmaansh nahin ....

sampoorna kavita ko padhkar kaavya ras ki prabal anubhuti hui ..... sabhi judges se kshama pratna ke saath .... mere drishtikon se is kavita ko navma sthan dena shayad anyaay hai ..... yeh kavita yadi iski mool awdharna, kavya shaili wa vaykati se vishwa ka swaroop ko lekar dekhi jaye to shayad kuch accha sthan prapt karnain yogya hai ....

saadar ...

utpal

तपन शर्मा का कहना है कि -

बहुत ही अलग सी रचना.. ऐसी कविता काफी दिनों बाद पढ़ने क मिली। बधाई संजीव जी।

rachana का कहना है कि -

कविता को दो बार पढ़ा तब समझ आई बहुत अलग सी कविता है
सादर
रचना

sahil का कहना है कि -

बहुत ही उम्दा रचना.बहुत बहुत बधाई.
आलोक सिंह "साहिल"

pramesh का कहना है कि -

Bahut hi sundar vakyon me aapne manav abhiruchi ko bade hi saral tarike se prastut kiya hai bahut bahut bdhai, prayaasrat rahiye, dhanyavaad.

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