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Thursday, September 11, 2008

महादेवी वर्मा का आशीर्वाद भरा हाथ


आधुनिक मीरा की २१वीं पुण्यतिथि पर विशेष

लेखक - प्रेमचंद सहजवाला

तुझको पीड़ा में ढूंढ़ूगी
तुझमें ढूंढ़ूगी पीड़ा!


ऐसी वेदना भरी थी महादेवी की लेखनी.

निशा की धो देता राकेश
चांदनी में जब अलकें खोल,
कली से कहता था मधुमास
बता दे मधु मदिरा का मोल.


छायावादी युग की एक सशक्त हस्ताक्षर महादेवी की आज पुण्य तिथि है। कोई मुझे यदि कहे की उन्हें तो इस वर्ष पद्मभूषण तथा इस वर्ष पद्मा विभूषण दिया गया और इस वर्ष उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजा गया तो मैं तो कहूँगा कि वे तो आधुनिक युग की मीरा मानी गई हैं, उनके लिए क्या यह कहना समीचीन न होगा कि वे तो पुरस्कारों सम्मानों से ऊपर थीं.

छायावाद हिन्दी कविता का एक सशक्ततम दौर रहा. इस युग में जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पन्त, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जैसे कालजयी हस्ताक्षर रहे जिन्होंने हिन्दी की ही नहीं विश्व की कविता में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। महादेवी भी उसी युग का एक कालजयी हस्ताक्षर थी। मैं वैसे बचपन से ही कविता पढ़ने का शौक रखता था हालांकि यह कहना अतिशयोक्ति होगी कि तब भी कविता को लेकर इतनी परिपक्वा समझ रखता था। परिपक्व अवस्था में लेखन के लिए मैंने कहानी ले ली और पढ़ने का आनंद लेना हो तो कवितायें पढ़ो। निराला की 'भिक्षुक' कविता बार-बार पढ़ कर दूसरों को सुनाओ - वह आता, दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर जाता, पेट पीठ दोनों मिल कर हैं एक....

आधुनिक मीरा
कभी जयशंकर प्रसाद तो कभी सुमित्रानंदन पन्त। महादेवी जी की कवितायें मन को एक मार्मिक तरीके से छू जाती। सन 1982 में पता चला कि महादेवी जी को ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ है और पुरस्कार समारोह दिल्ली में ही होगा। बचपन से ही उनके दर्शन की अभिलाषा मन में पाले था, सो ऐसा लगा कि मुझसे अधिक सौभाग्यशाली और कोई न होगा। मन में एक गहरी इच्छा रही कि मैं यदि महादेवी के सामने पडूंगा तो सब से पहले उनके चरण स्पर्श करूंगा। अब भी ऐसा लगा कि जहाँ भी समारोह हो रहा होगा, मौका मिला तो मैं उनके चरण स्पर्श करूंगा, भले ही वे मुझे जानती हों या न जानती हों। पुरस्कार समारोह होना था दिल्ली के सिरीफोर्ड सभागार में, जो उस समय दिल्ली के लोगों के लिए अपेक्षाकृत नया था तथा एक आकर्षण-केन्द्र था। लेखक होने के नाते मैंने कहीं से प्रवेश पत्र भी हथिया लिया। सभागार की रौनक देखने योग्य थी। बेहद सुंदर सभागार। नीचे लाल-लाल कालीन। सामने विशाल मंच, और आज सभागार खचाखच इसलिए भी भरा था कि इस कार्यक्रम की मुख्य अतिथि थी यू.के की प्रधान मंत्री मारग्रेट थैचर। मंच की शोभा भले ही उसी की सुंदर आकृति से बढ़ रही हो, और मंच पर पी.वी. नरसिम्हा राव जैसे विद्वान् भी उपस्थित हों। पर मेरी आँखें उस इतने विशाल मंच पर खोज रही थी महादेवी जी को। वो रहीं। थैचर और नरसिम्हा राव के बीचोंबीच। सरलता की जीती जागती तस्वीर सी। आँखों पर मोटा चश्मा। सफ़ेद साड़ी, नीला बॉर्डर. जैसे मैं किसी साक्षात देवी के दर्शन करने घर से चला था और वह देवी मेरे सौभाग्य से सामने, मंच पर ही बैठीं है। मैंने दो-तीन बार तो अपनी जगह बदली। पीछे की पंक्तियों से मौका पा कर आगे-आगे आता रहा. एक बार तो सब से पहली पंक्ति के सामने पैदल चलता गया पर वहां महत्वपूर्ण लोग बैठे थे। आख़िर तीसरी पंक्ति में बिल्कुल कार्नर वाली एक सीट से कोई उठा तो लपक कर मैं वहीं पहुँच गया। हाँ, यहाँ से वे ठीक नज़र आ रही हैं। पर मैं उनके पाँव कब स्पर्श करूंगा? वे तो अंत में मंच से ही विलीन हो जाएँगी न? क्या मुझे अभी, दौड़ कर मंच पर चढ़ जाना चाहिए और उनके पाँव स्पर्श करने चाहियें? पर तभी ज्ञानपीठ की तरफ़ से किसी मधुर से आवाज़ में घोषणाएं शुरू हो गई और सब का स्वागत होने लगा। सोचा मेरा ख्याल भी कैसा बचकाना था। भला विदेश से आयी हुई किसी प्रधानमन्त्री के होते कोई मुझे मंच पर अकारण चढ़ने देता? बहरहाल। धीरे-धीरे भाषण शुरू हुए। नरसिम्हा राव ने अंग्रेज़ी में बहुत धुँआधार भाषण किया। वे दस भाषाओँ के विद्वान् थे। संस्कृत के कई श्लोकों को बता कर अंग्रेज़ी में उनके अर्थ भी स्पष्ट कर गए ताकि प्रधान मंत्री थैचर भी जान लें, कि वे किस देश में आयी हैं। स्वयं थैचर ने अपने भाषण में, जो बेहद सुंदर था, उच्चारण मन को मोह लेने वाले थे, भारत के संस्कृत विद्वानों की व आधुनिक युग के सशक्त साहित्यकारों की प्रशंसा की। महात्मा गाँधी का सन्दर्भ दिया। वेदों-शास्त्रों का उल्लेख किया और महादेवी को बधाई दी। पुरस्कार मिलने का अद्भुत क्षण उस से पहले हो गया और थैचर के कर-कमलों से महादेवी जी ने पुरस्कार ग्रहण किया। पूरा कार्यक्रम बेहद आनंदमय था। लेखक मन शायद ऐसे अवसरों पर कुछ अधिक उल्लसित होता है। जिन महान विभूतियों के होते समाज को समुचित मार्गदर्शन मिलता रहता है, उन महान विभूतियों को आंखों के सम्मुख देख मन में एक अद्भुत सी खुशी की लहर उमड़ रही होती है। मैं केवल कल्पनाओं में खो गया कि फर्रुखाबाद में जन्मी यह महान कवयित्री स्कूल में कैसा महसूस करती होंगी, असंख्य अन्य विद्यार्थियों के बीच जो पढ़-लिख कर साधारण जीवन बिताते हैं, उन के बीच ऐसी असाधारण व विलक्षण सी प्रतिभा किस प्रकार चलती फिरती होगी। कहीं पढ़ा था कि वे स्वभाव से बहुत अंतर्मुखी थी और जो नाम उन्हें दिया गया, यानी मीरा, वही मीरा उन्हें भी विद्यार्थी जीवन से बेहद प्रभावित करती थी। आख़िर कार्यक्रम का अंत हुआ। मैं कुछ-कुछ निराश सा भी होने लगा। पर देखा कि धन्यवाद के साथ-साथ आसपास लाल-लाल खूबसूरत कालीनों से ढँकी सीढ़ियों पर देखते-देखते कई सुरक्षा कर्मी भी आ गए हैं। मैं उत्तेजित तब हुआ जब मंच पर उपस्थित सभी लोग मंच की सीढ़ियां उतर कर इधर सभागार की कुर्सियों के बीच के रास्ते की तरफ़ ही बढ़ने लगे। मैं बहुत उत्तेजित हो गया। महादेवी जी यहीं, मेरे सामने से ही गुजरेंगी न। कुर्सियों पर बैठे सभी लोगों को सुरक्षा अधिकारीयों ने इशारे से ही अपनी जगह खड़े रहने को कह दिया, जब तक कि वह पूरा काफिला जिस में थैचर भी थी, नरसिम्हा राव भी और अन्य कई लोग, बीच के रास्ते से चल कर सभागार के बाहर न निकल जाए। मेरी धुकधुकी बढ़ रही थी। ये रहे सब। आगे-आगे यूनीफोर्म में दो बड़े-बड़े सुरक्षा अधिकारी जो लंबे-तगडे भी थे और सशक्त भी। उनके पीछे-पीछे थैचर के एक तरफ़ महादेवी व दूसरी, यानी मेरी तरफ़ नरसिम्हा राव. पीछे ज्ञानपीठ के कई वरिष्ठ अधिकारी और वे सुंदर लड़कियां जिन्होंने घोषणाएं की थी। जब तक मेरी कुर्सी के एकदम सामने आए सब, तब तक वहां अन्य कुछ लोगों ने भी भीड़ बना ली। महादेवी तो थैचर के भी उस तरफ़ थी। मैंने अचानक क्या किया कि कोई चीज़ मानो गिर गई हो, उसे उठाने के लिए नीचे झुक कर थोड़ा आगे खिसक गया, वे हैं महादेवी जी के चरण, बहुत सधे हुए क़दमों से एक एक सीढ़ी ऊपर चढ़ रही हैं, ये मेरा दाहिना हाथ है और ये... अचानक एक सुरक्षा अधिकारी का ठुड्डा मेरे गाल पर लगा। उसने शायद ताड़ लिया था, कोई नीचे झुका है। चेहरा थोड़ा ज़ख्मी सा भी लगा। नरसिम्हा राव सही स्थिति को शायद पहचान गए। अचानक एक कदम पीछे हो गए। मुझे जिस आत्मीयता से उन्होंने कन्धों का सहारा दे कर कुछ ऊपर उठाया और मुस्कराए, वह क्षण कभी नहीं भूलेगा। मैं अब की बार जिस तरीके से झुका, नरसिम्हा राव समझ गए, कि यह निश्छल व्यक्ति महादेवी के चरण स्पर्श करना चाहता है। इस बीच थैचर भी किसी रुकावाट का सा आभास पा कर थम गई थीं। केवल हक्का -बक्का था तो वह सुरक्षा अधिकारी। मैं अब पूरे आत्मविश्वास से आगे बढ़ा था और महादेवी जी के चरणों में गिर गया था। उन्होंने मेरे सर पर हाथ रख कर आशीर्वाद दिया, यह शायद मेरे जीवन का सब से अनमोल क्षण था। किसी को समय नहीं होता। सब लोग पल भर में अदृश्य भी हो गए। चेहरे पर लगी चोट भी उस समय फिर उभर आयी। कुछ दर्द सा भी होने लगा। पीछे लोगों का एक हुजूम सा हल्की सी धक्कामुकी करने लगा था। पर उस दर्द भरे क्षण में भी मन की गहराइयों के लिए मैं कितनी अपार खुशी कमा चुका था, यह केवल मैं ही जानता था। महादेवी जी का वह आशीर्वाद भरा हाथ....

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7 कविताप्रेमियों का कहना है :

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

आपकी शैली मुझे बेहद पसंद है प्रेमचंद जी, क्योंकि वो पाठक-मन को बाँधे रखती है। महादेवी को यूँ याद करना भी सुखद रहा।

तपन शर्मा का कहना है कि -

तुझको पीड़ा में ढूंढ़ूगी
तुझमें ढूंढ़ूगी पीड़ा!

प्रेमचंद जी, मैंने इन महान रचनाकारों की कवितायें न के बराबर ही पढ़ी हैं.. पर पहली दो लाइनें पढ़कर लगा कि जीवन में बहुत कुछ छूट सा गया है..
आपको महादेवी का आशीर्वाद मिल ही गया... सच पूछें तो मुझे यकीन नहीं हो रहा कि इतनी सुरक्षा के बीच आप किस प्रकार इतनी बड़ी हस्ती तक पहुँच गये.. आप सच में खुशनसीब हैं..
और हम भी कि आपके माध्यम से महादेवी के बारे में जानकारी प्राप्त हुई...

सजीव सारथी का कहना है कि -

कुछ लोग वाकई पुरस्कारों की सीमाओं से उपर होते हैं, महादेवी को मेरा नमन

Seema Sachdev का कहना है कि -

प्रेमचंद जी आपको मेरा नमन ,जो ऐसी महान आत्मा के चरण स्पर्श कराने का सुअवसर आपको मिला | यह पढ़ते-पढ़ते मेरी तो आँखों से आंसू छलक आए | बहुत खुशनसीब है आप | महादेवी जी का तो नाम अपने आप में अपनी परिभाषा समेटे हुए है की वो एक महान देवी थी और साहित्य के माध्यम से सदैव हमारे बीच रहेगी | पहली पंक्ति है :-
तुमको पीडा में ढूंढा
तुममे ढूढून्गी पीडा

शोभा का कहना है कि -

प्रेमचन्द जी
आपने बहुत ही सशक्त शैली में महादेवी जी से मिलवाया। उनका साहित्य पढ़ा और सराहा तो था किन्तु उनको इतना करीब से जानने का अवसर आपका यह लेख पढ़कर ही मिला। आपका अध्ययन और अनुभव हम सभी के लिए प्रेरणा है। साहित्य पर आपकी पकड़ बहुत गहरी है। हिन्द युग्म पर आपको पढ़ना एक सुखद अनुभव है। सस्नेह

neelam का कहना है कि -

क्या अमरों का लोक मिलेगा तेरी करुना का उपहार
रहने दो हे देव अरे यह मेरा मिटने का अधिकार |
मै नीर भरी दुःख की बदली ,उमड़ी कल थी मिट आज चली |
महादेवी जी ने जो भोगा,वही लिखा बेहद संवेदन शील रचनाकार थी ,जो अमर हो ही गई अंततः |
लेख अच्छा लगा ,

Unknown का कहना है कि -

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