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Friday, September 19, 2008

परिन्दे


परिन्दे कभी आकाश में नहीं ढूँढते
नीड़ बसेरा
असुविधाओं पर
गुस्साते नहीं दिल में
हावी होते हवा पर
और पुचकार लेते गगन को

गुजारिश नहीं करते कभी आँधी से
सह लेते सूरज की लू
जो कि करा देती उष्ण-स्नान
जला देती पर के संग पेट की भूख को
तो वे लांछन नहीं लगाते

सो जाते कहीं अंधेरे में
वृत्तियों को सहेजे हुये
सुबकती व्यथाओं को अपने में समेटे
नाप लेते गमों के पहाड़;
वे सपने में नहीं देखते
मालिक होने के गुमान और अरमान
युद्ध और शान्ति के फतवे
नहीं सहेजते
आत्मदाह के साथ
दुनिया नष्ट करने की साजिश
अपने ’पक्षीपने’ से
नहीं करते उजागर दबी पशुता और वह मनुष्यपना

बस सलिके से
सी लेते वेदना को
बेतरतीब कोलाहल में भी
बतियाते रहते चीं चीं
हड़बड़ाना उन्हें नही आया

- हरिहर झा

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16 कविताप्रेमियों का कहना है :

manvinder bhimber का कहना है कि -

परिन्दे कभी आकाश में नहीं ढ़ुंढते
नीड़ बसेरा
असुविधाओं पर
गुस्साते नहीं दिल में
हावी होते हवा पर
और पुचकार लेते गगन को
bahut sunder

seema gupta का कहना है कि -

इससे तो अच्छा है कि हम अपने अंदर भगवान के प्रति भक्ति का भाव रखते हुए केवल उसी कार्य को करें जो आवश्यक हो।

"behtreen"

Regards

SURINDER RATTI का कहना है कि -

हरिहर जी - नमस्ते,
बहुत सुंदर कविता लिखी है ... परिंदे शिकायत नहीं करते ... इंसान भी सहन करना सीख ले तो .. धरती स्वर्ग हो जाए ...
बस सलिके से
सी लेते वेदना को
बेतरतीब कोलाहल में भी
बतियाते रहते चीं चीं
हड़बड़ाना उन्हें नही आया
- सुरिन्दर रत्ती

rachana का कहना है कि -

बेहतरीन कविता है बहुत अच्छे भावःहैं
सादर
रचना

Advocate Rashmi saurana का कहना है कि -

kya rachana ki hai aapne. ati uttam. jari rhe.

vinay k joshi का कहना है कि -

सी लेते वेदना को
बेतरतीब कोलाहल में भी
बतियाते रहते चीं चीं
हड़बड़ाना उन्हें नही आया
.
इसीलिए तो धरा पर रहते हुए भी धरा से ऊपर है
काश इन्सान यह छोटी सी बात समझ पाता |
बहुत सुंदर कविता सहज बात मन को छु गई |
सादर,
विनय

शोभा का कहना है कि -

हरिहर जी,
बहुत अच्छा लिखा है। बधाई।

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

ढ़ुंढते- ढूँढ़ते
आंधि- आँधी
नही- नहीं
दुनियां- ('दुनिया' अधिक उपयुक्त शब्द माना जाता है)
मनुष्यपना- की जगह मनुष्यता ज्यादा सुंदर लगता है, इस पंक्ति में। अब यदि शाब्दिक सौष्ठव की दृष्टिकोण से जानबूझकर इस्तेमाल किया गया हो तो अलग बात है।
सलिके- सलीके

sahil का कहना है कि -

सुंदर कविता
आलोक सिंह "साहिल"

आलोक शंकर का कहना है कि -

kavita aur achchi ho sakti thi.

devendra का कहना है कि -

इन पंरिदों में कबूतर भी होते हैं जैसे दो पायों में --मध्यम वर्गीय आम आदमी। बाज भी रहते हैं जैसे --- ।
संगीत कार भी हैं-कवि भी । लगता हैं इस कविता में कवि ने केवल उन पंछियों से ही नाता जोड़ा जो उनके मन की बातें करते हैं।
-देवेन्द्र पाण्डेय।

तपन शर्मा का कहना है कि -

बहुत सुंदर..
"बस सलिके से
सी लेते वेदना को
बेतरतीब कोलाहल में भी
बतियाते रहते चीं चीं
हड़बड़ाना उन्हें नही आया"...

Harihar का कहना है कि -

शैलेश जी
वर्तनी के लिये धन्यवाद
’मनुष्यपने’ का कारण आपने सही पकड़ा है।
व्यंग्य में प्रयुक्त किया है।

पक्षी का सहज स्वभाव एक तरफ़
’दबी पशुता और वह मनुष्यपना’ दूसरी तरफ़ ।

shyam का कहना है कि -

सुविधाओं परगुस्साते नहीं दिल में
हावी होते हवा पर
और पुचकार लेते गगन को
बहुत अभिनव अभिव्यक्ति हेतु साधुवाद -खुदा करे जोरे -कलम और भी ज्यादा -श्यामसखा `श्याम'

"SURE" का कहना है कि -

पक्षीपने’ और मनुष्यपना
अच्छे शब्द लगे .कविता का विषय बहुत ही अच्छा लगा
......
.....
बतियाते रहते चीं चीं
हड़बड़ाना उन्हें नही आया

आशुतोष नारायण त्रिपाठी का कहना है कि -

बहुत ख़ुब....

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