परिन्दे कभी आकाश में नहीं ढूँढते
नीड़ बसेरा
असुविधाओं पर
गुस्साते नहीं दिल में
हावी होते हवा पर
और पुचकार लेते गगन को
गुजारिश नहीं करते कभी आँधी से
सह लेते सूरज की लू
जो कि करा देती उष्ण-स्नान
जला देती पर के संग पेट की भूख को
तो वे लांछन नहीं लगाते
सो जाते कहीं अंधेरे में
वृत्तियों को सहेजे हुये
सुबकती व्यथाओं को अपने में समेटे
नाप लेते गमों के पहाड़;
वे सपने में नहीं देखते
मालिक होने के गुमान और अरमान
युद्ध और शान्ति के फतवे
नहीं सहेजते
आत्मदाह के साथ
दुनिया नष्ट करने की साजिश
अपने ’पक्षीपने’ से
नहीं करते उजागर दबी पशुता और वह मनुष्यपना
बस सलिके से
सी लेते वेदना को
बेतरतीब कोलाहल में भी
बतियाते रहते चीं चीं
हड़बड़ाना उन्हें नही आया
- हरिहर झा






