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Tuesday, July 29, 2008

गुठली


आँखों की गुठली से
आँसू के बिरवे
निकल आते हैं
हरदम हीं।

बदजात, बदगुमान, बदमिजाज
नक्षत्रों के
फूटे मटकों से
जमती है बहुत
अश्कों के शाखों पे
औंधे पड़े
मोतियों की,
झांकते हैं जो
खोलकर आसमानी पलकों को।

उनकी
जड़ों से जकड़े
गीली मिट्टी के सपने
पड़े होते हैं
हर चार कदम पर-
महँगे इतवारों के
इंद्रधनुषी झांसों की तरह...
छुपाते रहते हैं
गंदले दागों को
कोढ के खाज के मानिंद।

इन सब के बीच
"मैं"-रूपी
कोई बरगद
या फिर मही
या शायद आसमान
देखता होता है
अपने भविष्य की दुर्गति
बेरूखी बारिश कीआगोश में..

काश
कभी किसी ने
गुठली फोड़ दी होती
और कर दिया होता
शंखनाद युद्ध का......
फिर
ना होता बाँस, न बजती बाँसुरी।

काश!!!!!!!

-विश्व दीपक ’तन्हा’

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12 कविताप्रेमियों का कहना है :

Avanish Gautam का कहना है कि -

महँगे इतवारों के
इंद्रधनुषी झांसों की तरह...

तन्हा जी यहाँ एक और बढिया कविता छुपी हुई मालूम होती है. आपके लिये मुश्किल नहीं होगा उसे बाहर निकालना.


बधाइयाँ!!

श्रीकान्त मिश्र 'कान्त' का कहना है कि -

"मैं"-रूपी
कोई बरगद
या फिर मही
या शायद आसमान
देखता होता है
अपने भविष्य की दुर्गति
बेरूखी बारिश कीआगोश में..

काश
कभी किसी ने
गुठली फोड़ दी होती
और कर दिया होता
शंखनाद युद्ध का......

बहुत सुंदर विश्वदीपक जी शुभकामना

devendra का कहना है कि -

पहले और दूसरे पैरा में अदभुत चिंतन, कल्पना की सुदरता
तीसरे पैरा में जीवन के झंझावात
पांचवे पैरा में भयानक निराशा-आक्रोश का भाव
तथा
चौथे पैरा में
--इन सब के बीच मैं रूपी कोई बरगद
या फिर मही
या शायद आसमान
देखता होता है अपने भविष्य की दुर्गति
बेरूखी बारिश की आगोश में--
जीवन की सच्चाई को बताता है।
-अच्छी, बहुत अच्छी कविता।
बधाई।
--देवेन्द्र पाण्डेय।

RAVI KANT का कहना है कि -

तन्हा जी,
बेहद सशक्त रचना है।

आँखों की गुठली से
आँसू के बिरवे
निकल आते हैं
हरदम हीं।

सुन्दर प्रयोग। कम शब्दों में इतना गहरा कह जाना पाठक को मुग्ध कर देता है।

BRAHMA NATH TRIPATHI का कहना है कि -

एक सुंदर और अच्छी कविता के लिए बधाई तनहा जी
बहुत अच्छा

Harihar का कहना है कि -

काश
कभी किसी ने
गुठली फोड़ दी होती
और कर दिया होता
शंखनाद युद्ध का......
फिर
ना होता बाँस, न बजती बाँसुरी।

बहुत सुन्दर तन्हा जी !
कविता आध्यात्मिक क्षेत्र में उतर गई है !

Pramod का कहना है कि -

बहुत सुन्दर,
बधाइयाँ!!

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

तन्हा जी,

इतने सुंदर बिम्ब शायद आपने १-२ बार ही लिखा है। बहुत ही बढ़िया लेखन। बात में दम है-

हर चार कदम पर-
महँगे इतवारों के
इंद्रधनुषी झांसों की तरह...

Smart Indian का कहना है कि -

अच्छा प्रयास है - व्याकरण को थोड़ी तवज्जो चाहिए.

tanha kavi का कहना है कि -

smart indian ji,
main jab bhi likhta hoon poori koshish karta hoon ki vyakaran mein hi rahoon. Agar is rachna mein vyakaran ki kami hai to kripya aap mujhe awagat karayein ki is kamiyaan kahaan hain taaki main unhein sudhaarane ki koshish kar sakoon.

swasth alochana wahi hoti hai, jisme alochak bas yahi nahi batata ki kami hai, yeh bhi batata hai ki kamiyaan kahaan hain.Yeh main apni kavita ke liye hi nahi kah raha hoon. Har kavita par yeh baat lagoo hoti hai.

-Vishwa Deepak 'tanha'

सजीव सारथी का कहना है कि -

वाह तनहा भाई बहुत दिनों बाद आप कविता में लौटे हैं...और कमाल कर गए....excellent

GIL BERT का कहना है कि -

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