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Tuesday, July 22, 2008

क्यों कोई हो


केशव बन कलियुग का
क्यों कोई
इतिहास दोहराता नहीं

फिर तर्क को अस्त्र बना
क्यों कोई
गीता यहाँ रच पाता नहीं

विजेताओं की साख पर
लिखी जाती पांडूलिपियाँ यहाँ
क्यों कोई
सत्य पर मर मिटने वालों को
सर काँधों पर बिठलाता नहीं

राजनेता भोज और महफ़िलों में
दल डूबे हुए हैं दलदलों में
बोली बोलो कि बिक रही कुर्सियां
क्यों हर कोई
बंधित हो इस कोप को है ढो रहा
क्यों कोई
अर्जुन बन इस लक्ष्य को नहीं भेदता
और इस शाप से मुक्ति दिलाता नहीं

रोज सजते धर्म गुरुओं के सिंहासन
भीड़ जुटती है श्रद्धालुओं की अपार
इक तरफ़ धर्म से, इक तरफ़ राज से
दोहरा हो रहा मुनाफ़े का व्यापार
क्या नया है जो एक बुद्धिजीवी जानता नहीं
भीड़ का हिस्सा बना, आत्मा की मानता नहीं
क्यों हर कोई
बस देखा देखी है भेड़ चाल चल रहा
अधिकारों की है बात करता
कर्तव्यों से है कर छल रहा

क्यों कोई हो
क्यों न हम सब हों
और लक्ष्य जनहित का भला हो
धर्म को रखें घरों तक और
सबके लिये दिल प्यार से भरा हो
तेरे मेरे सब के दर्द की सांझी दवा हो
बेखौफ़ जिसमे साँस ले सब, ऐसी हवा हो

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13 कविताप्रेमियों का कहना है :

देवेन्द्र कुमार मिश्रा का कहना है कि -

धर्म को रखें घरों तक और
सबके लिये दिल प्यार से भरा हो
तेरे मेरे सब के दर्द की सांझी दवा हो
waah

राष्ट्रप्रेमी का कहना है कि -

विजेताओं की साख पर
लिखी जाती पांडूलिपियाँ यहाँ
क्यों कोई
सत्य पर मर मिटने वालों को
सर काँधों पर बिठलाता नहीं
bahut uttam! sadhuvad!

RC का कहना है कि -

Achchi koshish. Vahi purana vishay hai magar achchi tarah se sambhala hai.

Smart Indian का कहना है कि -

"क्यों कोई
इतिहास दोहराता नहीं"

बहुत अच्छे!
बात से मुकरने वाले,
मौत से डरने वाले
और
पैसे पे मरने वाले
क्या इतिहास लिखेंगे और
क्या इतिहास दोहराएँगे?

बच्चन जी के शब्दों में आपके सवाल का जवाब दें तो कहना होगा:
"लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।"

श्रीकान्त मिश्र 'कान्त' का कहना है कि -

बंधुवर मोहिंदर जी !

यही तो बिडम्बना है ..सबको इंतजार ही है बस पर क्यों स्वयम आगे कोई आता नहीं
रचना के माध्यम से ध्यानाकर्षण के लिए साधुवाद

BRAHMA NATH TRIPATHI का कहना है कि -

क्या नया है जो एक बुद्धिजीवी जानता नहीं
भीड़ का हिस्सा बना, आत्मा की मानता नहीं
क्यों हर कोई
बस देखा देखी है भेड़ चाल चल रहा
अधिकारों की है बात करता
कर्तव्यों से है कर छल रहा

बहुत अच्छा मोहिंदर जी इन लाइनों में बहुत बड़ी बात कही आपने
सच में यहाँ सब भेडचाल ही चल रहे है आगे आकर कोई नही चल रहा

राष्ट्रप्रेमी का कहना है कि -

क्यों कोई हो
क्यों न हम सब हों
और लक्ष्य जनहित का भला हो
धर्म को रखें घरों तक और
सबके लिये दिल प्यार से भरा हो
तेरे मेरे सब के दर्द की सांझी दवा हो
बेखौफ़ जिसमे साँस ले सब, ऐसी हवा हो
उत्तम विचार, अनुकरण करें हम सबके आचार
भारत से मिटे भ्रष्टाचार, कदाचार, फ़ैले सदाचार!

शोभा का कहना है कि -

क्यों कोई हो
क्यों न हम सब हों
और लक्ष्य जनहित का भला हो
धर्म को रखें घरों तक और
सबके लिये दिल प्यार से भरा हो
बहुत सुन्दर लिखा है। बधाई स्वीकारें।

रेनू जैन का कहना है कि -

क्यों कोई हो
क्यों न हम सब हों
और लक्ष्य जनहित का भला हो
धर्म को रखें घरों तक और
सबके लिये दिल प्यार से भरा हो

बिल्कुल सही.....

रेनू जैन का कहना है कि -

क्यों कोई हो
क्यों न हम सब हों
और लक्ष्य जनहित का भला हो
धर्म को रखें घरों तक और
सबके लिये दिल प्यार से भरा हो

बिल्कुल सही.....

sahil का कहना है कि -

बहुत ही अच्छा लिखा सर जी,दिल को भा गया
आलोक सिंह "साहिल"

करण समस्तीपुरी का कहना है कि -

अच्छा है ! किंतु कुछ चमत्कारिक या नया नही !

Shailesh Jamloki का कहना है कि -

मोहिंदर जी,
आपकी रचना बहुत सुन्दर लगी.. और पढ़ कर अच्छा लगा

आपकी कविता की प्रस्तुति थोडी अच्छी होती तो.. शायद पाठक का ध्यान जरूर आकर्षित कर सकती थी..

PS:- ये मेरी व्यक्तिगत राय है

सादर
शैलेश

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