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Wednesday, May 28, 2008

मोनालीसा और मैं...




जब भी देखा है दीवार पर टंगी
मोनालीसा की तस्वीर को
देख के आईने में ख़ुद को भी निहारा है
तब जाना कि ..
दिखती है उसकी मुस्कान
उसकी आंखो में
जैसे कोई गुलाब
धीरे से मुस्कराता है
चाँद की किरण को
कोई हलका सा 'टच' दे आता है
घने अंधेरे में भी चमक जाती है
उसके गुलाबी भींचे होंठो की रंगत
जैसे कोई उदासी की परत तोड़ के
मन के सब भेद दिल में ओढ़ के
झूठ को सच और
सच को झूठ बतला जाती हैं
लगता है तब मुझे..
मोनालीसा में अब भी
छिपी है वही औरत
जो मुस्कारती रहती है
दर्द पा कर भी
अपनों पर ,परायों पर
और फ़िर
किसी दूसरी तस्वीर से मिलते ही
खोल देती है अपना मन
उड़ने लगती है हवा में
और कहीं की कहीं पहुँच जाती है
अपनी ही किसी कल्पना में
आंगन से आकाश तक की
सारी हदें पार कर आती है
वरना यूं कौन मुस्कराता है
उसके भीचे हुए होंठो में छिपा
यह मुस्कराहट का राज
कौन कहाँ समझ पाता है!!

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31 कविताप्रेमियों का कहना है :

Rajesh Roshan का कहना है कि -

मोनालीसा में अब भी
छिपी है वही औरत
जो मुस्कारती रहती है
दर्द पा कर भी


बहुत ही बढ़िया कविता

masoomshayer का कहना है कि -

yah rang bhee bahut achha laga
ANil

abhishek का कहना है कि -

aap ki kavita vastav me tarifelayak hai

रेनू जैन का कहना है कि -

मोनालीसा में अब भी
छिपी है वही औरत
जो मुस्कारती रहती है
दर्द पा कर भी

यही तो कड़वी सच्चाई है रंजू जी... हर युग में औरत ने मुस्कान ओढ़ कर अपने दर्द को छुपाने की कामयाब कोशिश की है..... बहुत खूब.....

अभिषेक ओझा का कहना है कि -

जो मुस्कारती रहती है
दर्द पा कर भी.

बहुत खूब !

mamta का कहना है कि -

बिल्कुल मोनालिसा की तरह बहुत ही खूबसूरत कविता।
एक-एक शब्द बहुत सुंदर।

ATUL का कहना है कि -

kiya baat hai,
kiya gahraai ko chua hai aapne,
yeh kala har kisi ke andar nahi hoti.

pooja anil का कहना है कि -

रंजू जी ,

दिखती है उसकी मुस्कान
उसकी आंखो में
जैसे कोई गुलाब
धीरे से मुस्कराता है
चाँद की किरण को
कोई हलका सा 'टच' दे आता है

बेहद खूबसूरत पंक्तियाँ हैं , और -

मोनालीसा में अब भी
छिपी है वही औरत
जो मुस्कारती रहती है
दर्द पा कर भी

बेहद भावुक कर देने वाली कविता है . बहुत सुंदर लिखा है .बधाई

^^पूजा अनिल

मोहिन्दर कुमार का कहना है कि -

रजंना जी,

भाव भरी रचना के लिये बधाई.. मुस्कराना जमाने मे सबसे मुशकिल काम है...
फ़िर भी मुस्कराते रहिये

आदत पड गई हो जिसे दर्द में मुस्काराने की
भला जरूरत क्या है उसे फ़िर किसी बहाने की

kavi kulwant का कहना है कि -

रंजू जी..बहुत खूबसूरत..

Avanish Gautam का कहना है कि -

अच्छी कविता रंजू जी.

Sanju का कहना है कि -

Hello, Ranju Ji....wow so nice poem write by you..very beautiful..aap ne kis tarah se womens ke internal beauty ko aur hansi ko world famous painting painting Monalisa ki hansi se bhav bhivor kar diya hai...I just say for your peom summary: Women is

Mother...

Women is

sister...

Women is

Gran maa...

women is

Friend....



Women is

Family...

Women is

Nation...

Women is

World....

Women is

Power of univers...

Univers Also

Power of women...

Women is not only

Women...

A women is

Homeable gods...

A women is

Loveable goodes...

With goodness...

Thanx for availabe so nice poem..god bless u...
Sanju
Lucknow
9838828439

शोभा का कहना है कि -

रंजू जी
आपने एक नए अर्थ को ढ़ूँढ़ा है-
अपनी ही किसी कल्पना में
आंगन से आकाश तक की
सारी हदें पार कर आती है
वरना यूं कौन मुस्कराता है
उसके भीचे हुए होंठो में छिपा
अच्छी कल्पना।

Seema Sachdev का कहना है कि -

अपनी ही किसी कल्पना में
आंगन से आकाश तक की
सारी हदें पार कर आती है
वरना यूं कौन मुस्कराता है
उसके भीचे हुए होंठो में छिपा
यह मुस्कराहट का राज
कौन कहाँ समझ पाता है!!
बहुत खूबसूरत रंजू जी

shivani का कहना है कि -

वर्ना यूं कौन मुस्कराता है
उसके भीचे हुए होठों में छिपा
यह मुस्कराहट का राज़
कौन यहाँ समझ पाता है !
बहुत खूब रंजना जी .....आपकी कविता बहुत अच्छी है अन्तिम चार पंक्तियाँ मुझे बहुत ही पसंद आई !उसके होठों की मुस्कराहट का राज़ तो आज भी रहस्य बना हुआ है आप ऐसे ही लिखती रहिये ....धन्यवाद

JAANWAR / AAWARA का कहना है कि -

मेडम जी
बहुत सुन्दर कविता लिखी है आपने,
मेरे पास तो इसकी प्रशंसा हेतु शब्द तो नहीं है.
एक-एक शब्द इतना सजीव सा जान प़डता है.
बहुत-बहुत शुभकामनायें.

एक जानकारी है, जो शायद आपको भी पता होगी, यह चित्र तत्कालीन फ़्रांस के राजा के स्नानाघर की शोभा बढ़ाती थी.

DR.ANURAG ARYA का कहना है कि -

जैसे कोई उदासी की परत तोड़ के
मन के सब भेद दिल में ओढ़ के
झूठ को सच और
सच को झूठ बतला जाती हैं
लगता है तब मुझे..
मोनालीसा में अब भी
छिपी है वही औरत
जो मुस्कारती रहती है

ये तो बहुतो की कहानी कह दी आपने.......

sahil का कहना है कि -

रंजू जी,मोनालिसा को लक्ष्य कर जिन एहसासों को आपने उकेरा है,वो कमाल हैं,एक बेहतरीन कही जा सकने वाली रचना.आपने ख़ुद के अंदर मोनालिसा को पा लिया,अब क्या कहूँ?
आलोक सिंह "साहिल"

sahil का कहना है कि -

रंजू जी,मोनालिसा को लक्ष्य कर जिन एहसासों को आपने उकेरा है,वो कमाल हैं,एक बेहतरीन कही जा सकने वाली रचना.आपने ख़ुद के अंदर मोनालिसा को पा लिया,अब क्या कहूँ?
आलोक सिंह "साहिल"

Anonymous का कहना है कि -

रंजना जी,
मोनालिसा में मैं को बेहद सुंदर तरीके से कविता में पिरोया है.बेहद सुंदर कविता.
अभिनव झा

devendra का कहना है कि -

मोनालिसा के माध्यम से आपने नारी की पीड़ा-उसके भीतर छुपी दर्द सहने की शक्ती और जीवन जीने की कला को बखूबी तराशा है।--------
-----------------------
मोनालिसा में अब भी
छिपी है वही औरत
जो मुस्कुराती रहती है
दर्द पा कर भी
अपनों पर, परायों पर
और फिर किसी दूसरी तस्वीर से मिलते ही
खोल देती है अपना मन
उड़ने लगती है हवा में
और कहीं की कहीं पहुंच जाती है
अपने ही किसी कल्पना में----------
--ये पंक्तियाँ मोनालिसा की मुस्कान को परिभाषित करतीं हैं।
--देवेन्द्र पाण्डेय।

राकेश खंडेलवाल का कहना है कि -

अच्छा लगा तस्वीर का दूसरा पहलू

Mrs. Asha Joglekar का कहना है कि -

बहुत सुंदर । मोनालिसा की मुसकुराहट की बडी अच्छी मीमांसा की है आपने ।

vandana का कहना है कि -

सभी मोनालिसा की मुस्कराहट की तरफ़ देखते हैं आपने उसके पीछे छुपे दर्द को भी महसूस किया..बहुत अच्छी लिखी है रंजना जी..!!

KAMLABHANDARI का कहना है कि -

bahut khubsurat kavita hai bilkul monalisha jaisi hi .uska dard baya karna bhi kaabiletaarif hai.

Bhupendra Raghav का कहना है कि -

मोन(आलीसा)(न),
सच में एक आलीशान मुस्कान लिये,
भले ही दिल में दर्द की खान लिये
कविता को मोनालिसा का रूप कहूँ
या मोनालिसा में कविता का भान लिये
तस्वीर ही अलग है मोनालिसा की
और कविता आपकी, इसकी पहिचान लिये

बहुत सुन्दर रंजना जी.. आपने मोनालिसा
का राज जाना और हमने आपका..

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

आपकी लेखनी परिपक्वता की ओर बढ़ रही है।

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

वरना यूं कौन मुस्कराता है
उसके भीचे हुए होंठो में छिपा
यह मुस्कराहट का राज
कौन कहाँ समझ पाता है!!

रंजना जी, कविता बेहद गहरी है...

***राजीव रंजन प्रसाद

mehek का कहना है कि -

बहुत बढ़िया .....बधाई

Dr. RAMJI GIRI का कहना है कि -

उसके गुलाबी भींचे होंठो की रंगत
जैसे कोई उदासी की परत तोड़ के
मन के सब भेद दिल में ओढ़ के


बहुत ही गूढ़ और मार्मिक अंदाज़ है आपका ..

rakesh pandey का कहना है कि -

मोनालीसा में अब भी
छिपी है वही औरत
जो मुस्कारती रहती है
दर्द पा कर भी
अपनों पर ,परायों पर
फ़िर ...
man ki gahraiyon me sama jane wali samvedna ko kavita me ubharne ke liye sukria.

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