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Tuesday, May 27, 2008

बीच सड़क पर दहाड़ें मार-मारकर रोने की प्यारी इच्छा के लिए


अम्मा कहती रहती थी
कि सो जा नासपीटे
बत्तियाँ बुझाकर
और मैं
कस्बाई बल्बों की उन रातों में भी
जाने कैसे देख लेता था सपने
जब फैशन नहीं था
सपने देखने का।

मैं सूरज के लाल होने तक
करता रहा था तुम्हारी प्रतीक्षा,
वे कहते हैं कि
लाल की है ज्यादा तरंगदैर्ध्य.
दूर से दिखता है लाल
जैसे बलूचिस्तान से दिखता है
लालकिला
जैसे इंग्लैंड में पढ़ी जाती है
लालकिताब
जैसे पिछली होली पर
मेरे कंधों पर लटककर
तुम करती रही थी मुझे गुलाल
और आजकल बालों के समुद्र में
सूखी नदी खोदकर
बोए रखती हो तुम
दूर की लाल मिट्टी।
मैं लाल सूरज के
चाँद होने तक
पुकारता रहा था तुम्हें
ग्रहण के दिन।

चैट पर
तुम लिखती हो ‘हाय’,
हाय तुम लिखती हो
उन्हीं इम्पोर्टेड सी दिखने वाली
ख़ूबसूरत उंगलियों से
और खो जाती हो फिर।
टूट जाती हैं क्या
इंटरनेट की साँसें,
जैसे मेरी?
या दरवाज़े पर धोबी माँगता है
मैले कपड़े
और तुम सोचने लगती हो
पटियाले वाली मामी के दिए सूट का रंग
उतार तो नहीं लाएगा धोबी?
या तुम पागलों की तरह
ढूंढ़ने लगती हो
ड्रैसिंग टेबल, लिपस्टिक, लश्कारे के बीच
बटाले वाले शिव की
कविताओं की किताब
जो माँगी थी मैंने
और अगली बार दी थी तुमने
अगली बार, जो नहीं आया कभी...

कितने महीनों से तुम लिखती हो
सिर्फ़ ‘हाय’
जैसे कोस रही हो ख़ुद को
या बददुआएँ दे रही हो मुझे
या कुछ छिपाए हुए हो
जिसे नहीं कहा जा सकता
हाय से बेहतर किसी शब्द से।

माँ ने लगवा दी हैं
घर में ट्यूबलाइट,
शिव खेड़ा ने लिखी है
’जीत आपकी’,
भारत सीख रहा है सपने देखना
और मैं रात रात भर जागकर
फ़ारसी शब्दकोषों में
खोजा करता हूँ कोई नया शब्द
जिसमें तुम रो सको,
मैं रो सकूं,
बीच सड़क पर
दहाड़ें मार-मारकर।

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11 कविताप्रेमियों का कहना है :

निखिल आनन्द गिरि का कहना है कि -

भटकते-भटकते कविता सही जगह ख़त्म हुई है....मुझे अपनी एक पुरानी कविता याद आ गई...("शोकगीत")..
इस बार आप बहुत दिन बाद नई उपमाएं लेकर आए हैं...गौरव सोलंकी फ़िर से शबाब पर हैं शायद...धन्य हो ऐसी "हाय" का.....

Harihar का कहना है कि -

वे कहते हैं कि
लाल की है ज्यादा तरंगदैर्ध्य.
दूर से दिखता है लाल
जैसे बलूचिस्तान से दिखता है
लालकिला
जैसे इंग्लैंड में पढ़ी जाती है
लालकिताब
जैसे पिछली होली पर
मेरे कंधों पर लटककर
तुम करती रही थी मुझे गुलाल
और आजकल बालों के समुद्र में
...
बिम्ब बहुत अच्छे ! लेखन बहुत सुन्दर!

pooja anil का कहना है कि -

गौरव जी ,

आपकी लेखनी कहाँ कहाँ से इतने सारे उदाहरण लेकर आती है ? एक ही कविता में पुरी दुनिया की बातें समेट लाये हैं आप ....!!!!

हालांकि मुझे इस कविता में तीसरे और चौथे पैराग्राफ की जरूरत नहीं लगी , परन्तु कविता की रोचकता अंत तक बनी होने से कविता अच्छी लगी . बधाई

^^पूजा अनिल

Avanish Gautam का कहना है कि -

कविता बढिया है. लगभग सारे लोग वही शब्द ढूढते है जहाँ रुलाई का बिल्क़ुल ठीक ठीक अर्थ लिखा हो और रुलाई का ही क्यों हँसी का भी. और जब ठीक अर्थ नहीं मिलता तो कुछ लोग कविताएँ लिख लेते हैं इसी तरह चीजो को मायने मिलते जाते हैं. खैर...
तुम्हारी कविता पसन्द आई! बस इस लाईन (तुम करती रही थी मुझे गुलाल)में गुलाल शब्द एक गलत नोट की तरह खटकता है. बाकी बढिया!

kavi kulwant का कहना है कि -

बहुत खूब

shatrughan का कहना है कि -

"कस्बाई बल्बों की उन रातों में भी
जाने कैसे देख लेता था सपने
जब फैशन नहीं था
सपने देखने का।"
sirf sapne hi to hote hai aur aaj tak kabhi bhi sapna dekha fashion nahi bana...

"माँ ने लगवा दी हैं
घर में ट्यूबलाइट,
शिव खेड़ा ने लिखी है
’जीत आपकी’,
भारत सीख रहा है सपने देखना
और मैं रात रात भर जागकर
फ़ारसी शब्दकोषों में
खोजा करता हूँ कोई नया शब्द
जिसमें तुम रो सको,
मैं रो सकूं,
बीच सड़क पर
दहाड़ें मार-मारकर।"

Ye lins kuch immature lag rehi hai..lagta hai ki Gauravji ne bina feel kiye audience ko bahut kuch feel karva chahate hai...

anyway good effort tha lekin kavita me randomness thi...

Seema Sachdev का कहना है कि -

खोजा करता हूँ कोई नया शब्द
जिसमें तुम रो सको,
मैं रो सकूं,
बीच सड़क पर
दहाड़ें मार-मारकर।
गौरव जी आप मन की गहराई को कितने अच्छे तरीके से माप लेते है

devendra का कहना है कि -

भटकती---
सर पटकती-----
दहाड़ें मार कर रोती--
इंटरनेट पर मिली-----
हाय---
इक नई कविता।
---देवेन्द्र पाण्डेय।

तपन शर्मा का कहना है कि -

गौरव जी,
मुझे कविता बहुत पसंद आई। हमेशा की ही तरह। पूजा जी ने सही कहा-कहाँ से लाते हैं इतने उदाहरण?
मेरे पास अब शब्द खत्म होते जा रहे हैं। अगर कभी मेरी टिप्पणी न आये तो ये नहीं समझियेगा कि पढ़ा नहीं गया कविता को, बल्कि ये समझना कि कुछ सूझा ही नहीं लिखने को।
धन्यवाद।

शैलेश भारतवासी का कहना है कि -

कविता में बाँधने की शक्ति होनी चाहिए और चौकाने की भी। यह दोनों मुझे इस कविता में दिखे, इसलिए बहुत पसंद आई।

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

जब फैशन नहीं था
सपने देखने का।

सूखी नदी खोदकर
बोए रखती हो तुम
दूर की लाल मिट्टी।
मैं लाल सूरज के
चाँद होने तक
पुकारता रहा था तुम्हें
ग्रहण के दिन।

उन्हीं इम्पोर्टेड सी दिखने वाली
ख़ूबसूरत उंगलियों से

जिसे नहीं कहा जा सकता
हाय से बेहतर किसी शब्द से।

फ़ारसी शब्दकोषों में
खोजा करता हूँ कोई नया शब्द
जिसमें तुम रो सको,
मैं रो सकूं,
बीच सड़क पर
दहाड़ें मार-मारकर।

वाह!! तुम्हारी कविता सुन्दरता से उठी है बीच में थोडा कमजोर भी पडी है किंतु अंत बेहद सशक्त..उपरोक्त बिम्ब और भाव तुम्हारी रचना को विशिष्ट बनाते हैं..

***राजीव रंजन प्रसाद

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