फटाफट (25 नई पोस्ट):

Tuesday, March 11, 2008

सच का आइना





प्यार कितना भी हो
लाश कौन ढोता है
कौन किस के लिये
ज़िन्दगी भर रोता है
फूल खिलती शाखों को
सींचते हैं पानी से
सूख कर ठूंठ तो
आग ही में जलता है
ख़्वाब कितने भी हों दिलक़श
गमलों तक ही रहते हैं
मेज़ों और आलों पर
गुलदान ही सजता है
महे-कामिल से चेहरे भी
अंधेरों में डूब जाते हैं
हाथ में न हों लकीरें तो
हुनर भी हाथ मलता है
यूं तो इन किताबों में दबे
लाखों दर्दे-मुहब्बत के किस्से हैं
फिर भी इन नम आंखों में
हर पल इक ख़्वाब पलता है

महे-कामिल = पूरा चांद

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)

21 कविताप्रेमियों का कहना है :

EKLAVYA का कहना है कि -

आपको सोच एक रति प्रेम मे पागल विहल मानव की भावना का सम्पूर्ण प्रभाव हैं
फ़िर भी इन नम आंखों में
हर पल इक ख्वाब पलता है

seema gupta का कहना है कि -

यूं तो इन किताबों में दबे
लाखों दर्दो-मुहब्बत के किस्से हैं
फ़िर भी इन नम आंखों में
हर पल इक ख्वाब पलता है
" लाजवाब , सच का आईना एक सुंदर अभीव्य्क्ती , आकर्षक चित्र और उतनी ही भावनात्मक रचना"
Regards

anju का कहना है कि -

बहुत अच्छे मोहिंदर जी
अच्छी रचना के लिए बधाई
हाथ में न हों लकीरें तो
हुनर भी हाथ मलता है
यूं तो इन किताबों में दबे
लाखों दर्दो-मुहब्बत के किस्से हैं
फ़िर भी इन नम आंखों में
हर पल इक ख्वाब पलता है
अच्छी रचना

seema sachdeva का कहना है कि -

महे-कामिल से चेहरे भी
अंधेरों में डूब जाते हैं
हाथ में न हों लकीरें तो
हुनर भी हाथ मलता है
यूं तो इन किताबों में दबे
लाखों दर्दे-मुहब्बत के किस्से हैं
फिर भी इन नम आंखों में
हर पल इक ख़्वाब पलता है

आपकी कविता पढ़ के बहुत अच्छा लगा ,एक अच्छी रचना के लिए बधाई ....सीमा सचदेव

जीतेश का कहना है कि -

मोहिंदर जी,
हाथ में न हों लकीरें तो
हुनर भी हाथ मलता है....
अच्छी रचना......बधाई

रंजू का कहना है कि -

महे-कामिल से चेहरे भी
अंधेरों में डूब जाते हैं
हाथ में न हों लकीरें तो
हुनर भी हाथ मलता है

एक सुंदर बात कहती हुई है यह रचना ..अच्छी लगी यह पंक्तियाँ मोहिंदर जी !!

शोभा का कहना है कि -

मोहिन्दर जी
एक दार्शनिक सोच लिए लिखी गई यह कविता जीवन की सच्चाई का बयान करती है। जीवन एक निरन्तर बहती हुई नदी है उसका प्रवाहमान होना नितान्त आवश्यक है। मोह में पड़कर पुरानी यादों को ढोना कभी भी प्रगतिशील मानव का आदर्श नहीं रहा -
फूल खिलती शाखों को
सींचते हैं पानी से
सूख कर ठूंठ तो
आग ही में जलता है
ख़्वाब कितने भी हों दिलक़श
गमलों तक ही रहते हैं
मेज़ों और आलों पर
गुलदान ही सजता है

बहुत ही सही सोच है। एक सही दृष्टि देने के लिए बधाई

mehek का कहना है कि -

यूं तो इन किताबों में दबे
लाखों दर्दो-मुहब्बत के किस्से हैं
फ़िर भी इन नम आंखों में
हर पल इक ख्वाब पलता है
सुंदर अभीव्य्क्ती ,बहुत बहुत बधाई

vipul का कहना है कि -

मोहिंदर जी.. दिल से निकली पंक्तियाँ सीधी दिल तक गयीं...
बहुत खूबसूरत लिखा है आपने ...

ख़्वाब कितने भी हों दिलक़श
गमलों तक ही रहते हैं
मेज़ों और आलों पर
गुलदान ही सजता है
महे-कामिल से चेहरे भी
अंधेरों में डूब जाते हैं
हाथ में न हों लकीरें तो
हुनर भी हाथ मलता है

RAVI KANT का कहना है कि -

हाथ में न हों लकीरें तो
हुनर भी हाथ मलता है

मोहिन्दर जी,यह भाग्यवाद भी लाश ही है। क्या ढोना इसे??

अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -

हाथ में न हों लकीरें तो
हुनर भी हाथ मलता है
-- बहुत सुंदर पंक्तियाँ हैं |

अवनीश तिवारी

तपन शर्मा का कहना है कि -

फूल खिलती शाखों को
सींचते हैं पानी से
सूख कर ठूंठ तो
आग ही में जलता है

बिल्कुल सही कहा है मोहिन्दर जी। जबर्दस्त रचना।

सजीव सारथी का कहना है कि -

ख़्वाब कितने भी हों दिलक़श
गमलों तक ही रहते हैं
मेज़ों और आलों पर
गुलदान ही सजता है

सरल अंदाज़ में गहरा दर्शन.....

राजीव रंजन प्रसाद का कहना है कि -

लाश कौन ढोता है
कौन किस के लिये
ज़िन्दगी भर रोता है

सींचते हैं पानी से
सूख कर ठूंठ तो
आग ही में जलता है

मेज़ों और आलों पर
गुलदान ही सजता है

फिर भी इन नम आंखों में
हर पल इक ख़्वाब पलता है

वाह!! वाह!!!

*** राजीव रंजन प्रसाद

अजय यादव का कहना है कि -

सुंदर और सहज रचना है. परंतु इतने सरल शब्दों के बीच यकायक महे-क़ामिल जैसे शब्द का प्रयोग समझ नहीं आता.

श्रीकान्त मिश्र 'कान्त' का कहना है कि -

फूल खिलती शाखों को
सींचते हैं पानी से
सूख कर ठूंठ तो
आग ही में जलता है
....... शुभकामनाएं

बरबाद देहलवी का कहना है कि -

मोहिंदर जी,
बहुत ही मर्मस्पर्शी रचना है

यूं तो इन किताबों में दबे
लाखों दर्दो-मुहब्बत के किस्से हैं
फ़िर भी इन नम आंखों में
हर पल इक ख्वाब पलता है

बरबाद देहलवी का कहना है कि -

मोहिंदर जी,
बहुत ही मर्मस्पर्शी रचना है

यूं तो इन किताबों में दबे
लाखों दर्दो-मुहब्बत के किस्से हैं
फ़िर भी इन नम आंखों में
हर पल इक ख्वाब पलता है

बरबाद देहलवी का कहना है कि -

मोहिंदर जी,
बहुत ही मर्मस्पर्शी रचना है

यूं तो इन किताबों में दबे
लाखों दर्दो-मुहब्बत के किस्से हैं
फ़िर भी इन नम आंखों में
हर पल इक ख्वाब पलता है

tanha kavi का कहना है कि -

मोहिन्दर जी,
सच का आईना पसंद आया। कुछ बातें समझ नहीं आईं मसलन
ख़्वाब कितने भी हों दिलक़श
गमलों तक ही रहते हैं
मेज़ों और आलों पर
गुलदान ही सजता है

गमला और गुलदान में कोई फर्क होता है क्या?

overall रचना अच्छी है।

बधाई स्वीकारें।

-विश्व दीपक ’तन्हा’

मोहिन्दर कुमार का कहना है कि -

तन्हा जी,

गुलदान = गुलदस्ता . छोटा सा जो मेज और रखा जाता है... गमले अकसर मिट्टी के होते है.. थोडे बडे और ज्यादातर बाहर ही रखे जाते हैं..
दूसरी बात यह कहने की थी कि (गमले मतलव.. Raw stage).. हर सपना हकीकत नहीं होता... हर पेड पर फ़ूल नहीं लगते.. आदि आदि... और गुलदान में तो फ़ूल तोड कर सजाये जाते हैं जबकि गमलों मे लगाये जाते हैं

रचना पसन्द करने के लिये धन्यवाद

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)